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विवेक रंजन श्रीवास्तव विदेश यात्राओं पर हैं और युद्ध के चलते लंदन में रुके हुए हैं। इस दौरान वह नियमित रूप से शब्दों को समय दे रहे हैं। आब-ओ-हवा पर विशेष रूप से इस वैचारिकी, नोट्स, अनुभव आदि इंदराज के लिए यह कोना।
दूर देस में लेखक-14...

स्मारकों का संवाद

             गहरी काली रात धरती पर उतर आयी थी, यह वह रात थी जब मनुष्य नहीं, राष्ट्रीय प्रतीक जागे हुए थे। वे सब जो सदियों से सभ्यताओं की पहचान हैं, पत्थर, लोहे, स्टील और आकांक्षी विश्वास से बने हैं, राष्ट्रीय स्मारक बोलना चाहते थे। दुनिया सो रही थी, पर उसके स्मारक संवाद में थे।

एफ़िल टावर ने जगमगाती रोशनी के बीच हँसते हुए कहा, कभी हमने ही स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी स्थापित की थी… समुद्र के बीच से स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी ने आवाज़ उठायी।

“मैं दुनिया को मानवता, समावेश और अवसरों से ग्लोबल विलेज बनाने की वैश्विक उम्मीद के रूप में बरसों से ढेरों झंझावात झेलती खड़ी हुई हूं”, पर इंसानी फ़ितरत ने ऐसी संकुचित प्रवृति को पाला है कि “अब अब मुझसे डरते हैं। कहते हैं, मेरी लौ किसी और की सीमा तक फैल सकती है। व्यापार अब हथियार बन चुके हैं। मानवीय भावना नक्शों की पहचान में खो गयी लगती है।”

“प्रगति की रोशनी अब भी है, पर उसका रंग बदला है। अब सौदे की चकाचौंध है। मनुष्यता और प्रेम गुम हो रहा है। रणनीति बिक रही है। मेरे साये में अब वैश्विक प्रेम-पत्र नहीं लिखा जाता, अनुबंध साइन होते हैं।”

भारत की धरती पर खड़ा स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी गहरे मौन में था।

“मैं एकता का प्रतीक हूँ,” उसने गूंजती आवाज़ में कहा, “पर अब हर देश अपनी सीमाओं में संकुचित एकता की अपनी ही परिभाषा गढ़ता दिखता है। इंटरनेट ने जिस ग्लोबल विलेज की दीवार रहित सीमाएं बनायी हैं, उस सपने को वीज़ा और पासपोर्ट के काग़ज़ी घेरे की दीवारों से, मुद्राओं की ताक़त के प्रभाव से मिटाया जा रहा है। जिन आदर्शों से हम बने थे, वे अब महज़ घोषणाओं में क़ैद हैं।”

पूर्व दिशा में लम्बी ग्रेट वॉल ऑफ़ चाइना ने अपनी प्राचीन साँस छोड़ी…

“मैं हज़ार सालों से खड़ी हूँ। पहले सुरक्षा के लिए, अब प्रदर्शन के लिए। आज हर राष्ट्र अपनी-अपनी दीवार बना रहा है, विचारों की, भाषा की, भय की। दीवारों की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वे कभी नहीं समझतीं कि उसके दोनों तरफ़ बुद्ध के डी.एन.ए. वाले प्रबुद्ध इंसान ही हैं।”

तभी उत्तर से तीव्र ठंडी हवा चली, वह सीधे ग्रीनलैंड से थी, सन्नाटे में भी सत्य कहती…

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“तुम सबकी बातें बहुत गर्म हैं,” ठंडक ने कहा, “पर गर्मी ही सब पिघलाती है। मैंने देखा है कि सभ्यताएं जब बहुत गर्म हो जाती हैं, महत्वाकांक्षा और ईर्ष्या से, युद्ध से तो इंसान का संतुलन बर्फ़-सा जम जाता है। मैं श्वेत हूँ, शांत हूँ, पर दुनिया के लिए अस्तित्व की चेतावनी हूँ। प्रकृति की पुकार जब सीधे-से सुनी नहीं जाती, तो वह दुखद परिणाम लाने पर विवश होती है।”

आसमान में बादलों के ऊपर से, बुर्ज ख़लीफ़ा बोल रहा था…

“मैं बादलों में सिर रखता हूँ, पर जितना ऊपर से देखता हूँ, इन दिनों इंसानियत उतनी ही छोटी नज़र आती है। ऊँचाई ख़ूबसूरत है, पर अर्थहीन भी। मैंने देखा है, मनुष्य जितना ऊपर जा रहा है, उतना भीतर से ख़ाली होता जाता है। मैंने अपनी छाया में भीड़ देखी है, पर चेहरों के पीछे दिशाहीनता भी। ऊँचाई, अगर मानवीय दृष्टि न दे, तो वह सिर्फ़ दूरी बनाती है।”

इसी समय दक्षिणी ध्रुव के पास, धरती के भीतर से एक गूँज कराहती आवाज़ सुनायी दी, कोई मेरी भी सुन लो, मैं अर्जेंटीना से तेल का कुआँ बोल रहा हूं…

उसने कहा, “तुम सब रोशनी, ऊँचाई और ठंडक की बात करते हो, मैं अंधेरे की करना चाहता हूँ। क्योंकि अंधेरा सत्य को छिपाता नहीं, दिखाता है… ऊपर जाकर सब देख सकते हैं, नीचे उतरकर ही सब समझा जा सकता है। मैं ईंधन देता हूँ, पर अब डरता हूँ, कहीं मेरी गहराई सभ्यता को स्थापित करने की जगह नोच-खसोट की बर्बरता से धरती को ख़ाली बर्बादी न दे।”

बुर्ज ने झुककर उत्तर दिया… “मैं जितना ऊपर गया, उतना अकेला हुआ, तुम जितना नीचे उतरते हो, उतने गहरे होते हो। शायद यही आकाश और पृथ्वी का द्वंद्व है, दृष्टि और आत्मा का।”

उत्तर दिया स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी ने “द्वंद्व नहीं, आवश्यकता। ऊँचाई और गहराई दोनों का सामंजस्य ही सभ्यता की स्थिरता है। ऊर्जा तभी वरदान है, जब वह जलाने की ही विस्फोटक नहीं, परस्पर सम्मान सहमति और समझ की हो।”

इतने में रेगिस्तान से रेत की रिक्तता की गति बदली। स्फ़िंक्स ने सिर उठाया और कहा, मैं हज़ारों सालों से यही देख रहा हूँ। सभ्यताएँ अपने प्रतीक बनाती हैं, फिर उन्हीं से डरने लगती हैं। मनुष्य प्रश्न पूछना छोड़ चुका है, और स्वार्थी जवाबों को सत्य मानने लगा है। इसीलिए वह प्रतिमाओं को पूजता है, समझता नहीं।”

सन्नाटा छा गया, हवाएँ स्थिर हो गयीं, लिबर्टी धीरे-से बोली… “क्या हम सब व्यर्थ हैं? क्या अब कोई आदर्श शेष नहीं?” क्या ग्लोबल विलेज एक दुस्वप्न बनकर रह जाएगा?

स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी ने कहा, “व्यर्थ कुछ नहीं होता। पत्थर, जब मौन रहते हैं, सत्य बोलते हैं। हमारी भूमिका अब शोर में नहीं, प्रतीक्षा में है। एक दिन मानव फिर से अपनी सीमाओं से आगे देखेगा। तब उसे याद आएगा कि यह धरती किसी एक की नहीं, सबकी है।”

वसुधैव कुटुम्बकम् ही वह एक वाक्य है, जो हर सवाल का सबको उत्तर है… पृथ्वी एक क्षण को जैसे रुक गयी। सबने मिलकर दोहराया, वसुधैव कुटुंबकम्।

धरती ने हल्की साँस ली।

शायद यह वह क्षण था, जब प्रतीक नहीं आत्माएँ संवाद कर रही थीं। संदेश था, ऊँचाई अहंकार नहीं, दृष्टि होगी.. गहराई लालच नहीं, ज्ञान.. दीवारें, रोक नहीं, प्रवेश द्वार बनेंगी।

“जब प्रतीक बोलते हैं, तब सभ्यता सुनती है।”

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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