
- May 2, 2025
- आब-ओ-हवा
- 0
गीत अब
रंजना गुप्ता
द्वन्द कोलाहल जटिल संवेदना
है कदाचित यह समय
निर्मम समय
गिद्ध जैसी दृष्टि से दिन रात
सब कुछ लीलता
वंचनाओं की वही गोठिल
दुधारी छीलता
सब निरर्थक वाद हैं संवाद हैं
है अवांछित यह समय
निर्मम समय
संतरण है मृत्यु पथ का
झील के अवसाद में
वितृषणाओं की घुली महुआ
मगर अनुनाद में
घृष्ट शकुनि पार्थ विचलित पार्श्व में
है अयाचित यह समय
निर्मम समय
आज आकुल और व्याकुल
धूल खाती सिद्धियाँ
अचकचाती लड़खड़ाती मोड़
पर हैं रिद्धियाँ
अर्ध चेतन अर्ध खंडित क्षुब्ध-सा
है अनिश्चित यह समय
निर्मम समय

रंजना गुप्ता
10 अप्रैल 1960 को जन्मी रंजना गुप्ता लगभग साढ़े चार दशकों से सृजनरत हैं। आपके आधा दर्जन नवगीत संग्रहों सहित कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। अनेक प्रतिष्ठित समवेत संकलनों (ग़ज़ल,नवगीत दोहे आदि) में आपकी रचनाएं शामिल रही हैं। अनेक साहित्यिक सम्मान प्राप्त हुए। नारी निकेतन (अनाथ महिलाओं का सरकारी शरणालय) में दो वर्ष विज़िटर्स पद पर कार्य (ज़िला मजिस्ट्रेट के द्वारा नियुक्त)।
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