लद्दाख की आह और सोनम वांगचुक की आवाज़
पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

लद्दाख की आह और सोनम वांगचुक की आवाज़

           हिमालय की धवल चोटियों और लद्दाख के सर्द मरुस्थल से उठी सोनम वांगचुक की आवाज़ आज केवल एक क्षेत्रीय मांग नहीं, बल्कि विकास के नाम पर किये जा रहे खनन से कराहती हुई धरती की पुकार है। लद्दाख, जिसे भौगोलिक रूप से ‘थर्ड पोल’ या दुनिया का तीसरा ध्रुव कहा जाता है, अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और नाज़ुक पारिस्थितिकी के कारण वैश्विक जलवायु विमर्श के केंद्र में आ गया है।

दरअसल इस पूरे प्रकरण की जड़ें उस संवैधानिक सुरक्षा की मांग में छिपी हैं, जो भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में दर्ज है। इसके पीछे का असली संकट पर्यावरणीय विनाश की आहट है। सोनम वांगचुक ने जब शून्य से नीचे के तापमान में 21 दिनों का ‘सात्विक अनशन’ शुरू किया, तो उनका उद्देश्य केवल राजनीतिक अधिकार प्राप्त करना नहीं था, बल्कि उन ग्लेशियरों को बचाना था, जो उत्तर भारत की जीवनधारा कहे जाने वाले जल तंत्र के मुख्य स्रोत हैं।

लद्दाख की लगभग 97 प्रतिशत आबादी जनजातीय है, जिनमें बौद्ध और मुस्लिम समुदायों का अनूठा मिश्रण है। ये जनजातियां सदियों से प्रकृति के साथ एक संतुलित तालमेल बिठाकर जीती आयी हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में बढ़ते शहरीकरण, अनियंत्रित पर्यटन और औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं ने इस संतुलन को हिला दिया है।

पहाड़ की जलवायु बचाने का मुद्दा

वांगचुक द्वारा रेखांकित प्रमुख मुद्दा यह है कि यदि लद्दाख को विशेष संवैधानिक दर्जा नहीं मिलता, तो बाहरी उद्योगों और खनन माफ़ियाओं के लिए इस शांत और संवेदनशील क्षेत्र के द्वार खुल जाएंगे, जिससे यहां के ग्लेशियरों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की दर वैश्विक औसत से कहीं अधिक तेज़ है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं यदि वर्तमान दर से कार्बन उत्सर्जन जारी रहा, तो इस सदी के अंत तक हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के एक-तिहाई ग्लेशियर पिघल सकते हैं। लद्दाख के लिए यह स्थिति किसी प्रलय से कम नहीं होगी क्योंकि यहां वार्षिक वर्षा नगण्य होती है और पूरी कृषि व्यवस्था ग्लेशियरों से निकलने वाले पानी पर ही टिकी है। वांगचुक ने अपने प्रयोगों और ‘आइस स्तूप’ जैसे नवाचारों के माध्यम से यह दिखाया है कि कैसे स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण किया जा सकता है, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि व्यक्तिगत प्रयास तब तक निष्प्रभावी रहेंगे जब तक कि नीतिगत स्तर पर बड़े उद्योगों को इस क्षेत्र से दूर नहीं रखा जाता।

लद्दाख में सौर ऊर्जा और पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इनके अंधाधुंध विस्तार से स्थानीय संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार, लद्दाख में आने वाले पर्यटकों की संख्या वहां की स्थानीय आबादी से कई गुना अधिक पार हो चुकी है, जिसके कारण कचरा प्रबंधन और पानी की खपत की समस्या विकराल हो चली है। स्थानीय जनजातीय समुदायों की भूमिका इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि वे ही इन पहाड़ों के असली संरक्षक हैं। उनकी पारंपरिक जीवनशैली न्यूनतम संसाधनों में अधिकतम संतुष्टि पर आधारित है, जो आज के ‘कंज़्यूमर कल्चर’ के सर्वथा विपरीत है।

स्थानीयता बनाम पूंजीवादी शक्ति

वांगचुक के इस आंदोलन ने वैश्विक जलवायु न्याय के सिद्धांत को भी मज़बूती दी है। वे कहते हैं “सादा जीवन जिएं ताकि दूसरे जीवित रह सकें।” यह दर्शन उन विकसित देशों और बड़े शहरों के लिए एक चेतावनी है जिनकी विलासितापूर्ण जीवनशैली का ख़ामियाज़ा लद्दाख जैसे दूरदराज़ के इलाक़ों के लोगों को भुगतना पड़ता है। लद्दाख के लोग उस कार्बन उत्सर्जन का हिस्सा नहीं हैं, जो ग्लेशियरों को पिघला रहा है, फिर भी वे इसके पहले शिकार बन रहे हैं। वांगचुक ने इस विडंबना को बख़ूबी पकड़ा है और इसे एक जन-आंदोलन में बदल दिया है।

लद्दाख की आह और सोनम वांगचुक की आवाज़

उनका तर्क है कि यदि लद्दाख को स्वायत्तता मिलती है, तो स्थानीय परिषदें यह तय कर सकेंगी कि किस तरह का विकास उनके पर्यावरण के अनुकूल है। वे विकास के विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे ‘सतत संयत विकास’ के पक्षधर हैं, जो मिट्टी, पानी और हवा की शुद्धता को गिरवी रखकर न किया जाये।

इस संघर्ष का एक और गहरा पहलू लद्दाख की सामरिक स्थिति और वहां की भू-राजनीति है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के नाते वहां बुनियादी ढांचे का विकास आवश्यक है, लेकिन वांगचुक का कहना है यह विकास स्थानीय लोगों और प्रकृति की सहमति के बिना नहीं होना चाहिए। जनजातीय समुदायों का अपनी ज़मीन से गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव होता है, और जब बड़े औद्योगिक घराने सौर फ़ार्म या खनन परियोजनाओं के नाम पर इस ज़मीन का अधिग्रहण करते हैं, तो न केवल पर्यावरण बल्कि एक प्राचीन संस्कृति का भी लोप होने लगता है।

वांगचुक की आवाज़ निर्णायक होगी

आंकड़ों के अनुसार, लद्दाख के कई हिस्सों में ब्लैक कार्बन का स्तर बढ़ रहा है, जो बर्फ़ की सफ़ेदी को कम कर उसे सूरज की रोशनी सोखने के लिए मजबूर करता है, जिससे बर्फ़ तेज़ी से पिघलती है। यह एक दुष्चक्र है जिसे रोकने के लिए वांगचुक ने अपनी देह को कष्ट देकर गांधीवादी तरीक़े से दुनिया का ध्यान खींचने का प्रयास किया है।

यह समझना आवश्यक है कि सोनम वांगचुक का यह प्रकरण केवल लद्दाख की जीत या हार का मामला नहीं है। यह इस बात का लिटमस टेस्ट है कि क्या आधुनिक लोकतंत्र प्रकृति की पुकार को सुनने की क्षमता रखता है! यदि हम लद्दाख के ग्लेशियरों को नहीं बचा पाये, तो सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा, जिससे अंततः पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की जल एवं खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। जनजातीय लोगों का संघर्ष वास्तव में मानवता के अस्तित्व का संघर्ष है।

वांगचुक ने जो मशाल जलायी है, वह हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के पास हमारी ज़रूरतों के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन हमारे लालच के लिए नहीं। इस प्रकरण का संदेश स्पष्ट है कि अब समय केवल चर्चाओं का नहीं, बल्कि कड़े निर्णयों का है ताकि आने वाली पीढ़ियों को हम केवल रेगिस्तान और सूखी नदियां विरासत में न दें।

लद्दाख की यह गूंज आने वाले समय में वैश्विक पर्यावरण नीतियों को प्रभावित करने वाली एक निर्णायक आवाज़ साबित होगी, क्योंकि यह सीधे तौर पर हमारी जीवनशैली और हमारे पर्यावरणीय भविष्य के बीच अंतर्संबंधों को चुनौती देती है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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