
- December 31, 2025
- आब-ओ-हवा
- 2
पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
यीशू की कीलें: पर्तों के नीचे दबी सच्चाइयाँ
किरण सिंह का कहानी-संग्रह ‘यीशू की कीलें’ 2016 में आधार प्रकाशन से छपा और चर्चा में रहा। किरण सिंह हमारे समय की महत्वपूर्ण कथाकार हैं और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। सामाजिक न्याय और महिला अधिकारों के लिए उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। राजनीति की समझ और परख से निर्मित अंतर्दृष्टि से उन्होंने सामाजिक विद्रूपताओं और विसंगतियों को लेखन का विषय बनाया है। इसके साथ ही उनका रचना कौशल और भाषा का रचाव जो उनकी विशिष्टता है, उन्हें अपने समकालीनों से अलग करता है।
पूरे सामाजिक परिवेश पर उनकी दृष्टि जो ढके गह्वरों, बंद कपाटों के भीतर की हर हरकत को देखती है और हर धड़कन को सुनती है। चाहे वे मठ के साधु-संत हों, धूनी रमाये, भस्म चाटते नागा बाबाओं की दुनिया हो, राजनीति में नेताओं से लेकर साथ चलने वाले अलग-अलग श्रेणीबद्ध सहयोगी, कर्मचारी, चाटुकार या पोषित जन हों, उनके ड्राइंगरूम से लेकर बेडरूम के भीतर तक उठती-बैठती साँसों का, कराहों-चीत्कारों का लेखा-जोखा हो— व्यापक स्तर पर लेखिका पूरा पोथा प्रस्तुत करती हैं और पाठक मानो साँस रोककर उस यात्रा में शामिल रहता है। लगभग सभी कहानियों में सामाजिक प्रश्न, राजनीतिक परिदृश्य या धर्म के आवरण में लिपटी नैतिकता और स्त्री यौनिकता के सवाल भी विभिन्न स्तरों पर उभरकर आते हैं। किरण सिंह जिस तरह कहानियों में वातावरण रचती हैं और दायें-बायें से लेकर आकाश-पाताल तक पूरा समाज और उसके हर कोने को समाहित करती हैं वह अद्भुत है। औपन्यासिक संरचना में बुनी गयी कहानी को विस्तार तो लेना ही होता है, जो पाठक को बाँधे रहता है।
पहली कहानी ‘द्रौपदी पीक’ पर्वतारोहण की पृष्ठभूमि के साथ है। पड़ोसी देश से एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए इस बैच में एक युवा योगी और घूँघरू को अनुमति मिली है। योगी के साथ शेरपा शोमोलुंगमा और घूँघरू के साथ शेरपा दोरजी हैं। घूंघरू बी.एच.यू.में पढ़ती है, किसी अहमद से प्रेम करती है और उसका इतिहास अयोध्या के रसूलपुर के तवायफ़ परिवार से जुड़ा है। युवा योगी है नव नागा संप्रदाय का पुरुषोत्तम दास और उसका भी इतिहास है। बेहद रोमांचक यात्रा विवरण में हर दिन का लेखा-जोखा है। लगभग बारह दिन बर्फ़ीले तूफ़ान में फँसे ये लोग, आसन्न मृत्यु और योगी पुरुषोत्तम को अपने सहवास से, एक मृतप्राय याक के जमे ख़ून की बर्फ़ी खिलाकर जीवित रखने वाली शेरपा शोमा। मूर्छित अवस्था में एक दुःस्वप्न की तरह अपना जीवन सुनाता योगी, कुंभ मेलों में खोये हुए, जबरन भटकाये हुए बच्चे, प्रेम से या सामूहिक बलात्कारों से पैदा हुए, गंगा किनारे फेंके गये बच्चों से बाबाओं के मठों में होने वाली नयी भर्तियाँ। फिर उनकी दीक्षा, सेवकाई, जवान होते नव नागा, शरीर लुंचन—उसका साथी भरत असफल रहा सो उसे जल समाधि दे दी गयी।स्त्री का सान्निध्य जीवन दान देता है योगी यानी पुरुषोत्तम को।
‘ब्रह्म बाघ का नाच’ धार्मिक विश्वासों के सहारे जीने वाले समाज की कहानी है। शेरबहादुर पीढ़ियों से बाघ का नाच दिखाकर परिवार पालता है लेकिन अब लोगों में इसका आकर्षण नहीं रहा। उसका बेटा नरसिम्हा और फिर नरसिम्हा का बेटा सिंहासन—वे अब बाघ के रूप में मृत्यु देवता का रूप धारण करते हैं, जिनसे भयभीत होकर गाँव वालों की भीड़ जुटती है। कारुणिक बिन्दु पर कहानी ख़त्म होती है, जब भीड़ के बीच उसकी माँ उसे छूकर आत्महत्या कर लेती है ताकि उसका मृत्यु देवता का स्वरूप बना रहे। ऐसी ही एक मार्मिक कहानी है ‘संझा’। संझा जन्म से न स्त्री है न पुरुष। अपने कुशल वैद्य पिता के कारण वह वैद्यकी में निष्णात है। उसके माता-पिता ने उसे पूरे एहतियात से पाला और समाज के दबाव में आकर उसकी शादी कनाई से की, जो ख़ुद भी पुरुष के रूप में अक्षम है। एक बिन्दु पर जब गाँव वाले उसकी सरेआम हत्या तक करना चाहते हैं, वह पूरे समाज से लोहा लेती है और अपनी अस्मिता की रक्षा करती है।

किरण सिंह की लगभग सभी कहानियों में अलग-अलग मिज़ाज के स्त्री पात्रों के माध्यम से स्त्री यौनिकता के प्रश्न आते हैं। वे संघर्षशील हैं और खुलकर सामने आती हैं। ‘देश-देश की चुड़ैलें’ में तीन लघुकथाएँ हैं। इनमें सामाजिक अंधविश्वास हैं, स्वार्थपरता है, चुड़ैल के रूप में चिह्नित कर सामाजिक हिंसा की रवायतें हैं और हैं उनकी करुण गाथाएँ। ऐसी ही स्त्री त्रासदी की कहानी है दलित समाज की सुभावती की जिसने अपने प्रेमी के साथ पकड़े जाने पर गाँव के लोगों पर हँसिया उठा लिया था लेकिन फिर भी नहीं बच सकी। लोकभाषा और कथावाचन शैली इन सभी कहानियों को जीवंत बनाती है।
इस शैली और परिवेश से इतर दो कहानियाँ ‘कथा सावित्री सत्यवान की’ और ‘यीशू की कीलें’ अविस्मरणीय हैं, न सिर्फ़ कथानक के रचाव में बल्कि कथावस्तु के रूप में भी। ‘कथा सावित्री-सत्यवान की’ में एक नवोदित लेखिका पूरे कौशल से एक बेहद चर्चित और स्थापित लेखक तथा एक प्रकाशक को साहित्य प्रेमियों के बीच मुक़दमा चलाकर उनके लेखकीय व्यक्तित्व का असली चेहरा उजागर करती है। इसके बाद वह उससे बड़ी रक़म भी वसूलती है, जिसकी उसे ज़रूरत है अपने पति के इलाज के लिए। बेहद चर्चित कहानी ‘यीशू की कीलें’ आज की राजनीति में अरिमर्दन सिंह जैसे धुरंधर खिलाड़ी, पूरा चुनावी तंत्र, उसके भीतर की चालबाज़ियाँ और सड़ाँध तथा भीतर फैला यौन व्यापार का लेखिका खुले रूप में विस्तार से वर्णन करती हैं। लेखिका की तीक्ष्ण दृष्टि जो व्यवस्था के भीतर तक जाती है वह अद्भुत है और स्तब्ध करती है।
बेबाक, प्रभावित करने वाली भाषा और धैर्य के साथ बुना गया कथानक लेखिका के कथा-कौशल को विशिष्ट बनाता है। निश्चित रूप से यह एक पठनीय कहानी-संग्रह है।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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यीशू की कीलें—बेहतरीन और तार्किक समीक्षा! धन्यवाद!
क्या ख़ूब समीक्षा हुई।
वाक़ई, बहुत मार्मिक कहानियों को रखा आपने।