मीर हसन देहलवी, meer hassan dehlvi
डॉ. आज़म की कलम से....

यह है उर्दू की ऑलटाइम बेस्टसेलर फंतासी

             यह उर्दू की सर्वाधिक लोकप्रिय मसनवियों में से एक है। इस में प्लॉट, पात्रों, भावनाओं, दृश्यों का चित्रण बहुत महारत से किया गया है। इसमें साझा संस्कृति की तस्वीर नज़र आती है। वैसे ये मसनवी 1782 मैं तैयार हो चुकी थी, मगर तब तक छापाख़ाना भारत में नहीं आया था। फ़ोर्ट विलियम कॉलेज कलकत्ता ने 1803 या 1805 में उसे छापाख़ाने से प्रकाशित किया। अक्सर आलोचक इसे उर्दू की सबसे अच्छी मसनवी मानते हैं। ‘जैसा नाम वैसा काम’ के अनुरूप है। ‘सेह्र-उल-बयान’ का अर्थ है जादू से भरा बयान। इसके अनगिनत एडीशन छप चुके हैं। इसमें तक़रीबन ढाई हज़ार अशआर हैं। अशआर बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन मक़सूर या महज़ूफ़ में हैं, यानी फ़ऊलुन, फ़ऊलुन, फ़ऊलुन, फ़अल/फ़ऊल अरकान हैं।

‘सेह्र-उल-बयान’ को “क़िस्सा बेनज़ीर-ओ-बदर मुनीर” भी कहा जाता है। यह नाम उसके केंद्रीय पात्रों के कारण है। बेनज़ीर एक शहज़ादा है, माहरुख़ एक परी है, बदर-ए-मुनीर हीरोइन है, जिसकी शख़्सियत के कई पहलू सामने आते हैं। नज्मउन्निसा शोख़ और चंचल किरदार है और सबसे प्रभावी भी। क़िस्सा परंपरागत ही है। मगर लेखन शैली ने इसको अमर बना दिया है।

क़िस्सा ये है कि किसी मुल्क में एक इंसाफ़पसंद हर दिल अज़ीज़ बादशाह था। सब कुछ उसे हासिल था सिवा औलाद के। वो इतना मायूस रहता था कि बादशाही और मोह माया त्याग देना चाहता था। वज़ीर उसे रोकते हैं और शाही ज्योतिषी भविष्यवाणी करता है कि जल्द ही चांद सा बच्चा जन्म लेने वाला है। लेकिन इसकी ज़िंदगी आशंकाओं से भरी होगी इसलिए सावधानी बरतनी पड़ेगी। उसे 12 साल की उम्र तक महल के अंदर रखा जाये और रात खुले आसमान तले सोने न दिया जाये। कुछ अर्से बाद वाक़ई बादशाह के यहां प्यारा सा लड़का पैदा होता है, इसका नाम उसकी अतिसुंदरता को देखते हुए बेनज़ीर रखा जाता है। 12 साल तक महल में ही रखा जाता है। हर तरह की शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जाता है। मगर बारहवें साल के आख़िरी दिन जब उस की उम्र बादशाह के हिसाब से पूरे बारह साल की हो गयी थी, जो दुर्भाग्यवश एक दिन कम थी, शहज़ादा रात को ज़िद करके छत पर सो जाता है। आधी रात के क़रीब माहरुख़ परी हवा के कंधे पर वहां से गुज़रती है। बेनज़ीर को सोते देखकर इस पर मोहित हो जाती है और अपहरण करके परिस्तान लेकर चली जाती है। शहज़ादे के गुम होने पर हंगामा बरपा हो जाता है। ख़ूब तलाश होती है मगर शहज़ादा कहीं नहीं मिलता। इधर परी शाहज़ादे को अपनी तरफ़ रिझाने की हज़ार कोशिशें करती है मगर शहज़ादा उदास और हैरान, परेशान रहता है। तब वो उसे दिल बहलाने के लिए उड़ने वाला एक घोड़ा देती है। शहज़ादा इस पर सैर करता हुआ बदर-ए-मुनीर शहज़ादी के बाग़ में उतरता है। दोनों एक दूसरे को देखते ही आशिक़ हो जाते हैं। एक दिन एक दीवान उनका मिलन देख लेता है और माहरुख़ को बता देता है। वो इंतिहाई ग़ुस्से में शहज़ादा को कोह-ए-क़ाफ़ के अंधे कुँवें में डलवा देती है। उधर, बदर-ए-मुनीर का अजीब हाल है। अपनी राज़दार सहेली वज़ीरज़ादी नज्मउन्निसा के साथ बेनज़ीर की तलाश में निकलती है और बड़ी मुश्किलों से जिनों के बादशाह के बेटे फ़िरोज़ शाह की मदद से इसको रिहाई दिलाती है। बेनज़ीर और बदर-ए-मुनीर की शादी हो जाती है। ख़ुद नज्मउन्निसा, फ़िरोज़ शाह के साथ शादी कर लेती है। इस तरह क़िस्सा अच्छे अंजाम को पहुंच जाता है।

मीर हसन देहलवी, meer hassan dehlvi

इसमें सुपरनैचुरल तत्व हैं, जैसे कि नजूमी की भविष्यवाणी, परी, उड़ने वाला घोड़ा, देव, जिन आदि। फंतासी की दास्तान के तौर पर अगर उसे पढ़ा जाये तो बहुत आनंद आता है।

मीर हसन देहलवी: एक नज़र

मीर हसन सन 1741 के आस-पास दिल्ली में पैदा हुए। उनके पूर्वज हरात से आकर भारत में बसे थे। उनके वालिद मीर ग़ुलाम हुसैन ज़ाहिक भी बड़े शायर थे। कमउम्र में ही शेर कहने लगे थे। अहमद शाह अबदाली और नादिर शाह दुर्रानी के हमलों से जब दिल्ली उजड़ने लगी तो वो भी हिज्रत करते हुए लखनऊ पहुंचे। लखनऊ पसंद नहीं आया और इसकी बुराई करते हुए कुछ शेर भी कह दिये और फ़ैज़ाबाद चले गये। मगर परिस्थितिवश फिर लखनऊ जाना पड़ा। नवाब आसिफ़उद्दौला, मीर की लखनऊ की नापसंदीदगी और फ़ैज़ाबाद की पसंदीदगी की बात जानते थे इसलिए उनसे निहायत नाख़ुश थे। मीर हसन ने जब ये मसनवी उनके हुज़ूर पेश की, तब कहीं जाकर उन्हें माफ़ी मिली। 12 के क़रीब मसनवियाँ उन्होंने लिखीं। मीर हसन का इंतिक़ाल 1785 में हुआ।

azam

डॉक्टर मो. आज़म

बीयूएमएस में गोल्ड मे​डलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।

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