भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad
भवेश दिलशाद की कलम से....

आज़ादी के मायने बचाने का वक़्त

             15 अगस्त आता है तो बंटवारे की त्रासदी उभरने लगती ही है। वही ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें अब नयी रं​गीनियों में दिखायी देती हैं। सिर्फ़ धर्म/संप्रदाय/मज़हब ही नहीं बहुत छोटे-छोटे ख़ेमों में पूरा परिवेश बंटता हुआ दिखता है। हमारे चरित्र की न्यूनताएं ही सत्ताओं को मौक़ा देती हैं कि वो आसानी से फ़ायदा उठाकर निरंकुशताओं की तरफ़ बढ़ें। जनता ही सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिपक्ष हो, यही लोकतंत्र की चेतना है। जो जनता विपक्ष को ख़ारिज करने का मंत्र जपती है, दरअसल वह अपनी क़ब्र ख़ुद खोद रही होती है।

एक समय आता है, जब सत्ता निरंकुश होती है और प्रतिपक्ष प्रासंगिक होने लगता है। जनता के समर्थन से सत्ता परिवर्तन होता है। राज्य या देश एक नया अध्याय खोलता है। एक समय यूं आता है, जब सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। तब जनता आंदोलित होती है और नये सिरे से अपने नेतृत्व के लिए राह बनाती है। यह राज्य या देश के ऐतिहासिक क्षण हुआ करते हैं। यहां से नये मोड़ बनते हैं। यह सब इतिहास में है। अब चिंताजनक यह कि ऐसा समय भी संभव है, जब सत्ता, प्रतिपक्ष और आम अवाम सभी अप्रासंगिक होते चले जाएं! जब-जब ये होता है, तो नतीजा बताने की ज़रूरत नहीं।

न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में

सियासी त्योहारों को शायर इसी तरह मनाया करते हैं। कोई भवानी प्रसाद गाता है, “बहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे काले”, कोई सर्वेश्वर समझाता है, “देश काग़ज़ पर बना नक़्शा नहीं होता” और कोई साहिर यहां तक कह देता है, “ये जश्न जश्ने मसर्रत नहीं तमाशा है/नये लिबास में निकला है रहज़नी का जुलूस”… अस्ल में हम शायरों का तो एक ही त्योहार है मुहब्बत या इश्क़ या इंसानियत… और ऐसे शायराना त्योहारों से ज़्यादा आज़ादी का मतलब कोई समझा भी नहीं सकता। इश्क़/मोहब्बत/इंसानियत का जो सिस्टम है, उसमें न बहुमत का कोई मतलब है और न वोट का (वैसे लोकतंत्र में भी ये चीज़े मुग़ालता ही हैं)।

किसी ज़हीन शख़्स ने कहा था, अगर वोट में सचमुच ताक़त होती, वोट इतना ताक़तवर वाक़ई होता कि उससे ताक़तें, सत्ताएं बनतीं/बिगड़तीं तो यक़ीन मानो सियासतदानों ने जनता को यह ताक़त दी ही नहीं होती। बात गहरी है, अटपटी किसे लगेगी! जनता को भ्रम में उलझाये रखना ज़रूरी है। लेकिन जनता के लिए ज़रूरी यह है कि कई तरह की अफ़ीमों से दामन छुड़ाये…

दिलशाद मियां का क्या साहिब यूं ही नसीहत करते हैं
मत मानो तुम अच्छे-अच्छों की भी किसने मानी थी

दो आवाज़ें हैं- पहली शायराना। कमाल की बात यह है कि कोई जनता वोट देकर अपना शायर नहीं चुनती। बल्कि अक्सर तो ठुकराती ही है। अपने इस इश्क़/इंसानियत में बर्बाद हो जाता है पर सच्चा शायर लाख ठुकराये जाने के बाद भी जनता के ही हक़ में खड़ा रहता है। और दूसरी है, सियासत। ये वो है जो आपको लूटती है, आपको बर्बाद करती है और आप वोट देकर चुनते हैं कि आपको कौन तबाह करे। अब आपका चुनाव जो हो, हम तो शायराना आवाज़ के साथ हैं।

एक शायराना आवाज़ के साथ यह दुख मुल्तवी करता हूं। बरसों पहले की है लेकिन शायराना आवाज़ें कभी पुरानी नहीं पड़तीं। जनरल ज़िया उल हक़ को निशाने पर लेती पाकिस्तान में अवामी शायर हबीब जालिब ने बड़ी ज़बरदस्त नज़्म कही थी। मैंने यहां इसमें सिर्फ़ दो लफ़्ज़ बदल दिये हैं, दस की जगह सौ और चीन की जगह अमरीका रख दिया है- सिर्फ़ इसी से वह ध्वनि पैदा हो जाती है, जो इसे देश-काल-परिस्थितियों के लिहाज़ से विचारणीय है। जालिब असल में उस आज़ादलबी का नाम रहा है, जिसका उसूल था ‘हम बोलेंगे’। अब शायराना हम जैसों की तरफ़ से पढ़िए ये नज़्म (अंश) और आज़ादी के मायने खोजिए…

मैंने उससे ये कहा
मैंने उससे ये कहा
ये जो सौ करोड़ हैं
जहल* का निचोड़ हैं
उनकी फ़िक्र सो गयी
हर उमीद की किरन
ज़ुल्मतों में खो गयी
ये ख़बर दुरुस्त है
उनकी मौत हो गयी
बे-शुऊर लोग हैं
ज़िंदगी का रोग हैं
और तेरे पास है
उनके दर्द की दवा
मैंने उससे ये कहा

तू ख़ुदा का नूर है
अक़्ल है शुऊर है
क़ौम तेरे साथ है
तेरे ही वजूद से
मुल्क की नजात है
तू है मह्र-ए-सुब्ह-ए-नौ*
तेरे बाद रात है
बोलते जो चंद हैं
सब ये शर-पसंद हैं
उनकी खींच ले ज़बाँ
उनका घोंट दे गला
मैंने उससे ये कहा

जिनको था ज़बाँ पे नाज़
चुप हैं वो ज़बाँ-दराज़
चैन है समाज में
बे-मिसाल फ़र्क़ है
कल में और आज में
अपने ख़र्च पर हैं क़ैद
लोग तेरे राज में

…अमरीका अपना यार है
उसपे जाँ-निसार है
पर वहाँ है जो निज़ाम
उस तरफ़ न जाइयो
उसको दूर से सलाम
सौ करोड़ ये गधे
जिनका नाम है अवाम
क्या बनेंगे हुक्मराँ?
तू ‘यक़ीं’ है ये ‘गुमाँ’
अपनी तो दुआ है ये
सद्र* तू रहे सदा
मैंने उससे ये कहा

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*मूर्खत्व, *नयी सुबह का सूरज, *राष्ट्रप्रमुख

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

2 comments on “आज़ादी के मायने बचाने का वक़्त

  1. हमेशा की तरह शानदार आलेख। यदि वोट में ताकत होती…। आम जनता अपना शायर सरकार चुनती है जैसी खरी बातें लेख को कीमती बनाती हैं। बहुत बहुत बधाई

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