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पुस्तक चर्चा शशि खरे की कलम से....

मानव कौल कृत तितली: लेखन का हैरतअंगेज़ अंदाज़

            अद्भुत बात यह है कि कोई घटना, कोई कहानी मानव कौल के उपन्यास तितली में विशेष नहीं है, परन्तु जिस अनोखी शैली में कहा गया है उस कहन ने “तितली” को अद्भुत बनाया है।

अति संवेदनशील लेखक कोपेनहेगन, डेनमार्क की प्रसिद्ध लेखिका नाय्या की संस्मरणात्मक पुस्तक को पढ़कर उसकी स्थितियों को, पात्रों की मन:स्थितियों को, जहाँ दुर्घटना घटी उस पूरे वातावरण को अपनी मौजूदा ज़िंदगी में इतनी प्रबल लगन से अनुभूत करता है कि भौगोलिक दूरियाँ मिट जाती हैं, अपने सपने में वह लेखिका को देखता है, जिसे कभी भी देखा नहीं है।

मानव कौल लेखक, नाटककार, निर्देशक और अभिनेता हैं। उनकी ताज़ा हवा-सी लेखन शैली हिन्दी पाठकों ने बहुत पसंद की है। तितली दुखद स्मृतियों और गहरी संवेदना के साथ जीवन के साथ मृत्यु को स्वीकारने के समझौते से बुना हुआ ​है.. संस्मरण, यात्रा संस्मरणनुमा एक प्रयोगधर्मा उपन्यास है।

तितली प्रतीक है ज़िंदगी की, जो इस पल है अगले पल नहीं है, जो एक पल की ख़ुशी देती है, जब हमारी हथेली पर होती है।

आत्मकथात्मक शैली में सूत्रधार अर्थात् भुक्तभोगी कथानायक ‘मैं’ कथा को दार्शनिक जैसी शैली में किन्तु सरल विवेचना करते हुए चलता है। फिर बीच में नाय्या के उपन्यास के पेज को ज्यों का त्यों लिखता है। आगे कुछ बातों, कुछ चिंतन, कुछ विवरण के बाद उस पहले पेज को दुहराया जाता है।

यह अंदाज़ लेखन का हैरान करता है। पहले लगता है ग़लती से दो बार वही पेज प्रिंट हो गया है। बाद में समझ आता है कि मानव कौल पहले उसे लिखते/सुनाते हैं, जो उन्होंने पढ़ा था; फिर उस विदेशी उपन्यास को ज्यों का त्यों उद्धृत करते हैं, कथा आगे बढ़ती जाती है और अंतराल से (आल्टरनेट) फिर नाय्या के पेज आते रहते हैं। ऐसा शायद पहली बार किया गया है, लेकिन अच्छा है रोचक है। प्रवाह टूटता नहीं तब भी, जब वे अन्य हिन्दी लेखकों की यादों को भी ताज़ा करते चलते हैं कुछ दार्शनिक रंग के छींटों के साथ।

मानव कौल ने उपन्यास का आरंभ भी रहस्यात्मक, संशयात्मक कथनों से धीरे-धीरे बढ़ाया है कि पाठकीय जिज्ञासा, शंकाओं के किनारे छू-छूकर फिर क्या हुआ जानने के लिए पाठक को आगे बढ़ाती रहती है।

विनोद कुमार शुक्ल और निर्मल वर्मा का बार-बार उल्लेख एवं रस्किन बाँड से साक्षात्कार- “सुबह हम दोनों रस्किन बाँड से मिलने उनके घर गये… मेरे दिमाग़ में उनकी बहुत-सी कहानियांँ घूम रही थीं: उनकी बिल्ली, उनकी खिड़की पर चिड़िया का आना, धूप, पेड़, पहाड़, तितली, ट्रेन, देहरादून और उनके पिता से संबंध!”

लेखक ने आरंभ में Naja कोष्ठक में लिखा और देवनागरी में नाय्या। आधे उपन्यास के बाद यह रहस्य खुलता है कि यह ग्रीक उच्चारण के अनुसार नाय्या है, लेकिन डेनिश में naja ही लिखते हैं। नाय्या यानी Naja Maria Aidt डेनमार्क की प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। उन्हें 2008 में नार्डिक काउंसिल लिटरेचर स्कैंडेनेविया का सबसे बड़ा पुरस्कार मिला। 2015 में उनके 25 वर्षीय बेटे कार्ल की मृत्यु हो गयी थी। उसी दुख से उबरने के प्रयास में किताब लिखी- “When Death Takes Something From You Give It Back” Carl’s Book।

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यह किताब मानव कौल के चेतन-अवचेतन तक को आंदोलित कर देती है। वे न केवल लेखिका नाय्या को सपने में देखते हैं वरन् उस दुर्घटना के स्थानों को और उन पलों को देखते हुए उन क्षणों को जीते हुए स्वयं को महसूस करते हैं।

और लेखिका को मेल से मैसेज भेजकर उनसे मिलने कोपेनहेगन चले जाते हैं। उन्होंने जो भी अनुभूत किया, उस पर विचार करते हुए नाय्या की किताब के पेज लगातार उद्धृत करते गये हैं। कहानी के समानांतर वही कहानी चल रही है। इस प्रयोग की प्रभविष्णुता दूरगामी है।

डेनिश लेखिका का बेटा विषाक्त मशरूम के प्रभाव में बेचैन होकर पाँचवे माले की खिड़की से कूद जाता है।

फिर एम्बुलैंस, पुलिस, रिश्तेदारों का जमावड़ा कैसी हलचल करते हैं और अनहोनी की आशंका से पसरता बर्बर सन्नाटा, माँ की हालत.. यह सब मानव कौल ने किताब पढ़कर इस तरह आत्मसात किया कि बीच में भौगोलिक दूरियाँ रहीं नहीं।

इसीलिए वह कोपेनहेगन जाकर बहुत समय बिताते हैं लेखिका के साथ, फिर-फिर उन्हीं पलों से गुज़रते हैं। यह सब कुछ इतना मर्मस्पर्शी, रोचक भी और चुंबकीय लिखा गया है कि पाठक चुपचाप पृष्ठ दर पृष्ठ आगे बढ़ता जाता है।

जैसे-जैसे समाप्ति की ओर बढ़ते हैं, लेखक ने कुछ रहस्य सायास निर्मित किये हैं और शायद कुछ स्पष्टीकरण सूझा नहीं, जैसे उनकी शायर प्रशंसिका व दोस्त छत्तीसगढ़ में जाकर क्या रहस्यमय कर रही है और फ़ोन क्यों नहीं रखती?.. दोस्त N का ज़िक्र बहुत है उसकी चर्चा भी करने से सब बचते हैं पर क्यों? एक जगह नाय्या कहती हैं “कार्ल की क़द-काठी बहुत अच्छी थी और देखो वो खिड़कियाँ कितनी छोटी हैं… जाने कैसे..!” कहते बीच वाक्य में वह चुप हो गयीं।” (पेज 160)

इस तरह की बातें जिज्ञासा को सींचती रहती हैं लेकिन सिर्फ़ संदेह पैदा कर लेखक चुपचाप किताब समाप्त कर देते हैं।

अपनी लेखन प्रक्रिया पर वे लगातार लिखते हैं- “मैं अक्सर कामू के बारे में सोचता हूँ ‌जब वह पेरिस में एक छोटे-से कमरे में बैठे हुए The Stranger लिख रहे थे। उस किताब के मूल में उस शहर का उनके प्रति परायापन ही था, जिसने एक अद्भुत कहानी को जन्म दिया था। फिर मैं निर्मल वर्मा के बारे में सोचने लगा ‘वे दिन’ कितना ख़ूबसूरत उपन्यास, प्राग शहर के सुंदर अकेलेपन से उपजा था। कभी-कभी लगता है ठीक इस वक़्त जो मैं नहीं लिख पा रहा हूँ, वही लेखन मेरा सबसे महत्वपूर्ण लेखन है।” (पेज-105)

मानव कौल ने इस बात को बड़ी बारीकी से अनुभव किया है कि लेखक अपने रचनाकर्म में कितना जूझता है… पात्रों की उलझनों से। उनके दुखों में गहराई से डूबना, अश्रुओं में सिक्त होना, पात्रों के साथ-साथ कुंठित होना, व्यग्र होना पड़ता है, यह सब ज़रूरी है। अपने पात्रों में, कथानक में एकाकार होता है, फिर भी भावनाओं को रूपांकित करने में कलम उस वेग को काग़ज़ पर उतार नहीं पाती, तब बेचैनी होती है जैसे भीतर कुछ छूट गया है।

यह लेखन प्रक्रिया की अनिवार्य-सी स्थिति है, जिसकी चर्चा इस पुस्तक में मानव कौल ने स्पष्ट बेबाकी से बार-बार की है।

Shashi khare, शशि खरे

शशि खरे

ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।

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