
- September 30, 2025
- आब-ओ-हवा
- 6
नियमित ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
इतने साहित्य उत्सव..! तमाशा मेरे आगे
साहित्य उत्सव क्या बला हैं? कुछ बरस पहले की बात है मंगलेश डबराल को जब जयपुर साहित्य उत्सव (JLF) में आमंत्रित किया गया था, तब उनके नकार के शब्द थे, ‘यह बाज़ार का तमाशा है, मैं इसके पक्ष में नहीं हूं’। आज कितने साहित्यकार हैं, जिनके पास ऐसा ‘नकार’ है? सवाल अब और सीढ़ियां चढ़ चुका है, क्या साहित्य उत्सव ख़ुद बाज़ार हो चुके हैं? पिछले एक दशक में भारत में साहित्य उत्सवों की बाढ़ क्यों आयी है? इन उत्सवों का हासिल क्या है? सवाल यह भी कि इन आयोजनों के लिए पूंजी आ कहां से रही है और ये उत्सव क्या उगाही कर रहे हैं?
भारत ही क्या अन्य देशों में भी साहित्य उत्सवों का चलन बढ़ा है। ‘द हिंदू’ की एक हेडलाइन है, Why are literary gatherings mushrooming… यानी कुकुरमुत्तों की तरह फैलने जैसी भाषा इस चलन के लिए इस्तेमाल हो रही है। यक़ीनन यह सकारात्मक ध्वनि तो नहीं है। अध्ययन बताते हैं 1949 में दुनिया का पहला साहित्य उत्सव हुआ था। हालांकि साहित्य उत्सव चलन में 1983 से आये, जब एडिनबर्ग पुस्तक मेले ने ख़ासा ध्यान खींचा। एक अध्ययन के मुताबिक़ ग्रेट ब्रिटेन में हर साल साहित्य उत्सव का आंकड़ा क़रीब 400 है। 2020 के इसी अध्ययन में था कि भारत में 200 से ज़्यादा साहित्य उत्सव होते हैं। अब ‘द वीक’ की इसी साल की रिपोर्ट है भारत के बड़े, छोटे शहरों में तक़रीबन 300 साहित्य उत्सव हो रहे हैं। इसमें छोटे यानी क्षेत्रीय स्तर के उत्सवों को भी जोड़ लिया जाये, तो यह आंकड़ा क़रीब 500 तक हो सकता है।
‘घर फूंक तमाशा देख’ वाली स्थितियां इनमें से कितनों की होंगी! न के बराबर। गूगल सर्च से पता चलता है तमाम बड़े साहित्य उत्सवों के पीछे बड़े उद्योग और व्यापारिक समूह प्रायोजक हैं। जो साहित्य उत्सव बहुत बड़े नहीं हैं, उनके पीछे सरकारी, ग़ैर सरकारी संस्थाओं/संस्थानों आदि की फ़ंडिंग/अनुदान/मदद है। कुछ साहित्य उत्सव ऐसे संस्थानों द्वारा आयोजित किये जा रहे हैं, जो मीडिया या शिक्षा जैसे धंधों से सीधे जुड़े हैं। बड़े मीडिया समूह साहित्य उत्सवों के आयोजन के मैदान में लगातार उतर रहे हैं। यानी दो बातें साफ़ हैं, एक जनता की कमाई/टैक्स का पैसा ही परोक्ष या अपरोक्ष रूप से इन उत्सवों के लिए इस्तेमाल हो रहा है। और दो, अगर इन उत्सवों से कोई नफ़ा न हो तो व्यावसायिक समूह अपनी पूंजी, समय और मशीनरी इनमें नहीं लगाएंगे। तो इनका केंद्रीय भाव है क्या! कुछ उत्सवों में सत्ता को ‘लोकतांत्रिक मूल्य विरोधी’ कहने वाले स्वर उठते हैं लेकिन बात यह है कि इसी सत्ता में साहित्य उत्सव फल-फूल रहे हैं! क्या साहित्य को बाज़ार बनाकर नक्कारख़ाने में तूती की आवाज़ बना दिया जा रहा है?

पुस्तक मेले हों या साहित्य उत्सव, विचारणीय है क्या ये लेखन/सृजन केंद्रित हैं? प्रकाशकों और विज्ञापनों का बड़ा बाज़ार इनके आगे-पीछे है। किताब के छपने का कारोबार क्या है? छोटे स्तर पर लेखक ख़ुद ही किताब छपवाते और खपाते हैं। इनका धंधा क्या है? ये इलाक़ाई या सूबाई टाइप की संस्थाओं के कुछ पुरस्कार हथिया लेते हैं। भोपाल के एक कवि के शब्द- ‘भाईसाब मैंने किताब छपवाने में 30 हज़ार ख़र्चे और साल भर में लाख-पचास हज़ार पुरस्कारों/सम्मानों से छाप लिये, किताबें भी कुछ टिका दीं…’
अब बात बड़े पैमाने की। प्रकाशक एक लेखक के साथ क़रार करता है। कुछ रक़म देकर कॉपीराइट ले लेता है या फिर रॉयल्टी आदि की शर्तें तय होती हैं। लेखक के हिस्से में यह रॉयल्टी, मुनाफ़े में कुछ ही प्रतिशत की होती है। इसका बड़ा हिस्सा प्रकाशक का ही होता है। यानी कोई प्रकाशक किसी किताब के लिए तीस लाख की रॉयल्टी लेखक को दे तो मतलब है कि उस किताब से उसे एक से तीन करोड़ तक मुनाफ़ा तो हुआ। खेल प्रकाशन का है। इस खेल के कुछ और अदृश्य खिलाड़ी बिचौलिये हैं, विज्ञापक हैं और प्रायोजक हैं। तो फिर लेखक? इस खेल को और बड़े मुनाफ़े का धंधा बनाने के लिए जो तमाशा रचा जाता है, उसमें लेखक चेहरा भर है या मोहरा भर! धंधे में जो सयाने हैं, अंग्रेज़ी में कहलवा गये हैं, ‘Any fool can write a book, it takes a genius to sell one’। लेखक अहमक ही है, जो विज्ञापन के परदे पर होने से कई वहम पाल लेता है और परदे के पीछे ‘जीनियस’ बड़ा कारोबार चुपचाप चलाते रहते हैं। यह सब भांपकर ही शायद डबराल ने मुख़ालफ़त की हो।
अब रहा सवाल, इन साहित्य उत्सवों के औचित्य का यानी इनका हासिल। इनके फ़ायदे बताने के लिए कुछ अकादमिक पत्र और लेख मिलते हैं लेकिन ये सब ऊपरी बातें सुनायी देती हैं। काम की बात यह विचारना है क्या समाज में कोई क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है? इन उत्सवों से महत्वपूर्ण चिंतन या लेखक प्रकाश में आ पा रहे हैं? हिंदी पट्टी के उत्सव तो औचित्य के और भी कई प्रश्नों के दायरे में हैं, मसलन ये दोयम दर्जे के लेखन को बढ़ावा देने वाली किटी पार्टियां या पिकनिक बनकर रह गये हैं; मीडियाई उत्सवों की तुलना तो फूहड़ कवि सम्मेलनों या बॉलीवुडिया मनोरंजन से की जाती है… मज़े की बात है इन आयोजनों के नामों में ‘उत्सव’ शब्द। कोई साहित्य का स्वघोषित ‘कुंभ’ है तो कोई ‘महाकुंभ’! यानी बस पल भर की सजधज और धूमधाम के अलावा और क्या हाथ लगता है! नंदिता हकसर तंज़ करती हैं, ‘इन आयोजनों के लिए ‘महाकुंभ’ विशेषण जंचता भी है क्योंकि बस चमक-दमक ही है, देशकाल के अहम मुद्दों पर संवाद के लिए, यथार्थ की चुनौतियों पर लेखकों के मुब्तिला होने की कोई गुंजाइश तो है नहीं’। तो क्या कुकुरमुत्तों-से फैल रहे साहित्य उत्सवों का परिदृश्य बुलबुले या हवा भरे ग़ुब्बारे की तरह ही है?
जवाब में कोई विद्वान जुमला उछालता दिखेगा, ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जोखम के रास्ते तो इन आयोजनों से खुल ही रहे हैं’… तो ऐसे विद्वानों को दूर से ही सलाम। हाल ही एक वर्ग विशेष के ऐतराज़ के चलते ‘कॉन्फ्लुएंस ऑफ़ साइन्स, लिटरेचर एंड कॉन्शियसनेस’ विषय पर गौहर रज़ा के व्याख्यान को रद्द करना पड़ा। पहले भी यह होता रहा है। मुंबई के एक साहित्य उत्सव में नो’म चॉम्स्की और विजय प्रशाद के संवाद को रद्द किया गया था। वे भाजपा जैसी पार्टियों की सरकारों और टाटा समूह जैसे उद्योगों द्वारा मानवता के लिए पैदा किये जा रहे संकटों के विषय पर बात करने वाले थे। पता क्या चला कि इस उत्सव के पीछे टाटा समूह ही मुख्य प्रायोजक बन गया था।

हालिया ख़बरें हैं साहित्य अकादमी के सचिव पर दैहिक शोषण के आरोप हैं, मामला अदालत में है और… इन मुद्दों को दरकिनार कर, अकादमी के आयोजन में अपना नंबर लगवाने के लिए नामचीन लेखक कंधे से कंधे लड़ाते दिखे। जब सरकारें या सरकारी फ़ंड, बड़े व्यावसायिक समूह सीधे या किसी न किसी तरह से ऐसे आयोजनों के पीछे हैं, तब मौक़े तो अभिव्यक्ति को कुचलने के होंगे या..! नमिता हकसर के लेख का यह तथ्य कितनों को पता चला कि JLF शोषक पूंजीवाद का पोषक है। इस उत्सव का मुख्य प्रायोजक है मारुति सुज़ुकी। 5 जनवरी 2025 को इस कंपनी के अस्थाई कामगारों ने एक यूनियन बनायी, जो 5000 परिवारों के लिए आख़िरी उम्मीद है। इस यूनियन की मांगों को सुनना तो दूर पुलिस के मार्फ़त इनका दमन किया गया। इनके अधिकारों को ताक पर रख दिया गया। लेख यह भी बताता है कैसे इस मामले के बाद सरकार ने सीमित अवधि के रोज़गार को वैधानिक बनाता क़ानून बना दिया। कैसे आम आदमी की आवाज़ घुटकर रह गयी। मारुति सुज़ुकी के साहित्य ‘महाकुंभ’ (JLF) को तो छोड़िए क्या सैकड़ों और उत्सवों में कहीं इस या ऐसे मुद्दों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठती है? क्या किसी उत्सव में अकादमियों जैसे मठों के ख़िलाफ़ हल्ला बोला जाता है? कैसे हो, सभी किसी न किसी ‘मारुति सुज़ुकी’ के मायाजाल या किसी न किसी ‘फ़ंडिंग’ के मोहपाश में फंसे ही हैं।
हाल ही चर्चा में आये हिंद युग्म साहित्य उत्सव के पीछे की फ़ंडिंग को लेकर भी जो तथ्य सामने आ रहे हैं, सोचने पर मजबूर कर देते हैं। जिन उद्योगों पर लांछन लगे हुए हैं, उनके द्वारा फ़ंड किये जा रहे उत्सवों में साहित्य की आवाज़ कितनी उठ पाएगी? कितनी सुनी जा सकेगी? हम बोलेंगे कि इन उत्सवों का हाल कुंभ मेलों के उन तमाशों-सा हो गया है, जहां भविष्य बताते तोते ब्रह्मज्ञानी कहलाते हैं और दो कौड़ी के चमत्कार दिखाते धूर्त सिद्ध साधक।
(कार्टून एक्स हैंडल से साभार और वायनाड साहित्य उत्सव के पोस्टर का चित्र इंस्टाग्राम से साभार)

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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आपका बेबाक लेखन असर पैदा करता है। कुछ देर के लिए फिक्र की दुनिया में घसीट ले जाता है जहां दिमाग में हथौड़े बजने लगते हैं, कीलें ठुकने लगती हैं… बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बहुत बढ़िया आलेख है। निश्चित रूप से ऐसे साहित्यिक उत्सवों की बाढ़ आ गई है। चूंकि अधिकांश उत्सव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रायोजकों द्वारा आयोजित हैं इसलिए उनके अपने स्वार्थ भी जुड़े होंगे।
बेहतरीन
लेख सोचने पर विवश करता है ।साहित्य की धुरी का केंद्र अंततः सामाजिक सरोकार ही होना चाहिए। पर अफसोस ,व्यावसायिक लाभों के लिए ये सब तिरोहित होता जा रहा है ।
बहुत बढ़िया विश्लेषण हुआ।