सॉफ़्टवेयर कोडिंग को ‘श्रद्धांजलि’! क्या सच में?
पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से....

सॉफ़्टवेयर कोडिंग को ‘श्रद्धांजलि’! क्या सच में?

         एक वक़्त था जब सॉफ़्टवेयर कोडिंग लिखने का मतलब होता था घंटों बैठकर हर लाइन को बड़े एहतियात से टाइप करना और एक-एक बग को ठीक करते जाना। आज डिजिटल की जो दुनिया हमारे सामने है और जिसके हम फ़ायदे उठा रहे हैं, वह उसी धैर्य के साथ रचे गये कोड्स का नतीजा है। और आज का सबसे चर्चित इनोवेशन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) कहां से आया? वह भी उन्हीं कोडिंग्स का परिणाम है। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के सफ़र की शुरूआत भी पारंपरिक कोडिंग से हुई थी और फिर मशीन लर्निंग, न्यूरल नेटवर्क्स और डीप लर्निंग तक होते-होते इस मुक़ाम तक पहुंची है। लेकिन यह अजीब विडंबना है कि इन्हीं कोडर्स/प्रोग्रामर्स के लिए अब मर्सिया पढ़ा जा रहा है!

जब गत 17 मार्च को ओपन-एआई के सीईओ और चैटजीपीटी के संस्थापक सैम आल्टमैन ने इसी भाव के साथ अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर एक बयान पोस्ट किया तो टेक जगत में वबाल कट गया। उनके शब्द थे: ‘मैं उन लोगों के प्रति कृतज्ञ हूं, जिन्होंने एक-एक कैरेक्टर को जोड़कर बेहद जटिल सॉफ़्टवेयर तैयार किये। अब तो इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती कि इस काम में वाक़ई कितनी मेहनत लगती होगी। हमें इस मुक़ाम तक पहुंचाने के लिए बहुत धन्यवाद।’ 

आल्टमैन की बयानी को सॉफ़्टवेयर की दुनिया के बुनियादी अंग यानी कोडर्स के लिए विनीत शब्दों में लिखी एक ‘श्रद्धांजलि’ के रूप में देखा गया। कई लोगों ने इसे ‘शुगरकोटेड’ यानी शक्कर का मुलम्मा चढ़ी ‘कड़वी गोली’ करार दिया।

‘मज़ेदार’ टिप्पणियों में छिपा दर्द…

जैसा कि लाज़िमी था, सॉफ़्टवेयर कोडर्स की तरफ़ से इस पर काफ़ी तीखी प्रतिक्रियाएं आयीं। कुछ ने आल्टमैन पर कटु कटाक्ष भी किये। जैसे एक यूज़र ने लिखा, ‘यह तारीफ़ सुनना ऐसा है, मानो कोई कसाई किसी मुर्ग़े को शुक्रिया कह रहा हो।’ एक टिप्पणी में आल्टमैन को ‘सुपरविलेन’ बताया गया तो Walker Boh नामक यूज़र ने उन्हें ‘पाइरेट’ (जलदस्यु) की उपाधि दे डाली। सबसे तीखा कमेंट Nick Greenawalt ने किया, ‘प्रिय डेवलपर्स, अब आपका काम हमेशा के लिए छिनने जा रहा है और आप कोयला ख़दानों में काम करने के लिए तैयार रहें। लेकिन आप कम से कम इस सुकून के साथ मर सकते हैं कि दुनिया के सबसे अमीर टेक-जायंट सैम आल्टमैन ने आपके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है।’

BlackRoomSec नामक यूज़र ने पूछा, ‘बहुत बढ़िया सैम, मगर सीईओ की छंटनी कब शुरू होगी?’ इसे दिल्ली में इसी साल फरवरी के दूसरे पखवाड़े में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में आल्टमैन के उस बयान की प्रतिक्रिया में लिखा गया माना जा सकता है, जहां उन्होंने कहा था आर्टिफ़िशियल सुपरइंटेलिजेंस बस कुछ क़दम ही दूर है और यह किसी कंपनी के सीईओ से भी ज़्यादा बेहतर तरीक़े से काम कर पाएगी।

इन तमाम कटाक्षों और टिप्पणियों का लुब्ब-ए-लुबाब यही निकलता है कि जिस समय पूरी दुनिया में कर्मचारी अपनी नौकरियां गंवाने को लेकर डरे हुए हैं और हज़ारों लोग निकाले जा चुके हैं, उस समय यह कहना कि ‘शुक्रिया, आपने बहुत मेहनत की’, एक तरह से जले पर नमक छिड़कने जैसा है। यह वैसा ही है, जैसे कोई अमीर आदमी भूख से बिलबिलाते किसी इंसान से कहे, ‘मुझे बहुत ख़ुशी है कि तुमने मेरे लिए इतना ज़ायक़ेदार खाना पकाया। अब तुम जा सकते हो।’

मगर, शुरूआत सैम की पोस्ट से नहीं हुई

भले ही गालियां आल्टमैन को पड़ी हैं, मगर इसकी शुरूआत तो पिछले साल (3 फरवरी 2025) को ओपन-एआई के को-फ़ाउंडर आंद्रेज़ करपैथी की एक्स पर डली उस पोस्ट से हो गयी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कोडिंग करना अब बोलने जितना ही आसान हो गया है। यानी आप एक भी कैरेक्टर लिखे बग़ैर ही एआई से सिर्फ़ बात करके या उसे कुछ प्रॉम्प्ट देकर मिनटों में कोडिंग तैयार करवा सकते हैं। करपैथी ने इसे ‘वाइब कोडिंग’ (Vibe Coding) नाम दिया था। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कोडिंग को ‘कोमा’ में डालने की शुरूआत तो वहीं से हो गयी थी, जिस पर आल्टमैन ने अब ‘श्रद्धासुमन’ अर्पित किये हैं।

ओपन-एआई के इन दोनों सह-संस्थापकों के अलावा एंथ्रोपिक के को-फ़ाउंडर जैरेड कपलान ने भी कहा था कि “अगले 2 से 3 वर्षों में बाज़ार में कोडिंग की वैसी मांग नहीं रहेगी, जैसी आज है।’ लेकिन उनके अंदाज़ में थोड़ी संवेदनाएं नज़र आती हैं। उनका कहना है कि भविष्य के सॉफ़्टवेयर इंजीनियरों को कोड लिखने के बजाय ‘कोड रिव्यू’ और ‘सिस्टम डिज़ाइन’ पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि लिखने का काम तो एंथ्रोपिक के एआई मॉडल (Claude Sonnet 3.5/4) इंसानों से बेहतर तरीक़े से कर रहे हैं। यानी कपलान ने काम के तरीक़ों में बदलाव की बात की, काम के ख़ात्मे की नहीं।

भविष्य को लेकर चेतावनी?

सैम आल्टमैन के इस बयान को टेकरडार (Techradar.com) के सीनियर एआई एडिटर ग्राहम बारलो एक चेतावनी के रूप में देखते हैं और उनकी नज़र में यह केवल डेवलपर्स के लिए ही ख़तरे की घंटी नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि अब अगला कौन? बक़ौल बारलो, अपनी ‘एजेंटिक कैपेसिटी’ (स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता) के कारण एआई अब वेब डिज़ाइनर्स से लेकर बुकिंग असिस्टेंट्स तक और लगभग हर उस काम को चुनौती दे रही है, जिसमें निर्णय लेने की भूमिका होती है।

अलबत्ता, आल्टमैन की एक्स पर पोस्टिंग की टाइमिंग ने इसे ज़्यादा विवादास्पद बना दिया। पिछले महीने ही ब्लॉक इंक (Block Inc.) ने कहा था कि चूंकि अब ज़्यादातर काम ऑटोमेटेड होता जा रहा है, इसलिए वह अपने 40 फ़ीसदी कर्मचारियों को निकालने जा रही है। ब्लॉक इंक दुनिया की बड़ी और प्रभावशाली फ़िनटेक कंपनियों में से एक है, जिसकी स्थापना ट्विटर के को-फ़ाउंडर रह चुके जैक डॉर्सी ने की थी। 24 अरब डॉलर के रेवेन्यू वाली इस कंपनी ने अपने 10 हज़ार में से 4 हज़ार कर्मचारियों को हटाने का ऐलान किया है। यह कोई छोटी छंटनी नहीं है। इससे पहले इसी हफ़्ते की शुरूआत में सॉफ़्टवेयर कंपनी अटलासियन (Atlassian) ने भी अपने 10 फ़ीसदी कर्मचारियों की छंटनी की संभावना जतायी थी। पिछले साल दिग्गज कंपनी ऑरेकल ने तो 20 से 30 हज़ार कर्मचारियों की छंटनी करने की बात कही थी, ताकि ओपन-एआई के साथ 300 अरब डॉलर की पाटर्नरशिप के लिए वह पैसे जुटा सके। इसी माहौल में आल्टमैन की पोस्ट ने आग में घी डालने का काम कर दिया।

किंतु अब भी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ!

‘हर कोडिंग अब मशीन कर लेगी’, यह कहना जितना आसान है, हक़ीक़त उतनी सरल भी नहीं है। जैसे आज कई लोग अनुवाद के पेशे का भी मर्सिया पढ़ने लगे हैं, लेकिन एक अनुवादक होने के नाते मेरा मानना है कि एआई केवल उसी की मदद कर सकती है, जिसे अनुवाद के बुनियादी सिद्धांतों की समझ हो। सिर्फ़ मशीन अच्छा अनुवाद नहीं कर सकती, लेकिन एक अच्छे अनुवादक की क्षमता को कई गुना बढ़ा सकती है। असल में, बेहतरीन अनुवाद के लिए मशीनी और मानवीय बुद्धि, दोनों का संतुलित तालमेल ज़रूरी है। यही बात कोडिंग पर भी लागू होती है।

‘वाइब कोडिंग’ को लेकर जोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बू की राय इसी ओर इशारा करती है। उनके अनुसार, यह जटिल काम को भले ही आसान दिखाये, लेकिन केवल इसके भरोसे बेहतर नतीजे हासिल नहीं किये जा सकते। अगर आपके पास कोडिंग के बेसिक्स नहीं हैं, तो आप सिर्फ़ एआई के ज़रिये अच्छा नहीं कर सकते। उन्होंने एक्स पर लिखा, ‘मैं वाइब-कोडिंग की जगह ‘एआई-असिस्टेड कोड इंजीनियरिंग’ (ACE) शब्द के इस्तेमाल का सुझाव देता हूं।’ उनके मुताबिक़, ACE शब्द सॉफ़्टवेयर इंजीनियरों की ज़रूरत को ख़त्म नहीं करता, बल्कि यह अनुभवी इंजीनियरों को और अधिक प्रोडक्टिव बनने में मदद करता है।
और यह तर्क केवल कोडिंग या अनुवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि लगभग हर क्षेत्र पर लागू होता है; कम से कम तब तक, जब तक कि आर्टिफ़िशियल सुपरइंटेलिजेंस, यानी एक ‘सुपर ब्रेन’ वास्तविकता नहीं बन जाता।

आल्टमैन की मानें तो यह सुपर ब्रेन कंपनियों के सीईओ से भी बेहतर काम कर सकेगा। लेकिन यही दावा एक गहरे विरोधाभास को जन्म देता है। आख़िर, कौन-सा सीईओ ख़ुद को बेरोज़गार या अप्रासंगिक होते देखना चाहेगा? कोई नहीं चाहेगा कि वही तकनीक उसकी अपनी कंपनी के लिए ‘भस्मासुर’ बन जाये।

इसलिए संभव है कि आने वाले समय में कंपनियों का एक बड़ा खेमा ही इस तथाकथित सुपर ब्रेन के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाये। तब असली संघर्ष आर्टिफ़िशियल सुपरइंटेलिजेंस को विकसित करने का नहीं, बल्कि उसे सीमित या नियंत्रित करने का होगा। यह ऐसी जंग होगी, जिसमें तकनीक से ज़्यादा दांव पर अपने-अपने अस्तित्व होंगे।

ए. जयजीत

ए. जयजीत

27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!