अरुण अर्णव खरे, arun arnaw khare
साहित्य के कैनवास पर व्यंग्य की दमक को अब शिनाख़्त की ज़रूरत नहीं है। फिर भी प्रश्न उभरता है कि समकाल में व्यंग्य की धार पैनी क्यों महसूस नहीं हो पा रही। इस ब्लॉग में वरिष्ठ व्यंग्यकार के नज़रिये से सिलसिलेवार समझा जाएगा। व्यंग्य की भूमिका और ज़मीन की चर्चा से शुरूआत और फिर समकालीन मुद्दे...​
अरुण अर्णव खरे की कलम से....

कौन-सी विशेषता व्यंग्य को विधा बनाती है?

            साहित्य में व्यंग्य की स्वीकार्यता बढ़ने के बावजूद, व्यंग्यकार अभी भी इस यक्ष प्रश्न से निजात नहीं पा सके हैं कि व्यंग्य विधा है या नहीं। साहित्य की किसी अन्य विधा को लेकर इतना असमंजस लेखकों के मन में नहीं है जितना व्यंग्य को लेकर स्वयं व्यंग्यकारों के मन में है। व्यंग्य विधा है या शैली, इससे क्या फ़र्क पड़ता है? मेरा मानना है, पाठक को इससे कोई मतलब भी नहीं है। निर्लिप्त भाव से सोचें तो ऐसे विमर्श की ज़रूरत भी नहीं है, पर व्यंग्यकार हैं कि परेशान हैं, या कहें अमादा हैं व्यंग्य को विधा मनवाने के लिए। जैसे व्यंग्य के विधा बनते ही उनका नाम कालजयी लेखकों में शुमार होने लगेगा।

मुझे लगता है व्यंग्यकारों में यह पीड़ा संभवत: साहित्य के नामवर आलोचकों द्वारा व्यंग्य को मुख्यधारा का साहित्य न मानने के कारण उपजी है जबकि व्यंग्य-साहित्य, आज का सबसे लोकप्रिय साहित्य है। व्यंग्य को यह लोकप्रियता परोपकार में नहीं मिली है बल्कि उसने हासिल की है। साहित्य की सभी विधाएँ अपने समय की मानवीय संवेदनाओं को किसी न किसी रूप में उद्घाटित करती हैं। साहित्य की अन्य विधाओं की तरह ही व्यंग्य भी यही काम करता है बल्कि अधिक सजगता और संजीदगी के साथ करता है। व्यंग्यकार की दृष्टि समाज के मिज़ाज को परखने में अधिक स्पष्ट और दूरगामी होती है, वह कई कोणों से किसी घटना या विषय का अनुसंधान करता है। समसामयिक परिदृश्य पर व्यंग्यकार सबसे अधिक बेबाकी और प्रखरता से लेखकीय कर्म करता है। व्यंग्यकार जब व्यंजना और शब्द-बिंबों के द्वारा विसंगितयों पर कलम चलाता है, तो एक स्थायी प्रभाव पाठक की मन:स्थिति पर पड़ता है। कभी पढ़ा था, किसका कथन है, एकाएक याद नहीं आ रहा है लेकिन व्यंग्य के लिए इससे बेहतर बात नहीं कही जा सकती- “व्यंग्यकार अपने समय का सबसे ज़्यादा सीधा-सादा पर साथ ही ज़्यादा प्रामाणिक प्रवक्ता होता है।”

व्यंग्य विधा है या शैली या कुछ और, इस पर चर्चा करने से पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि व्यंग्य को लेकर साहित्य की अन्य विधाओं के मनीषियों की क्या राय है। आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं कि “व्यंग्य कथन की ऐसी शैली है जहाँ बोलने वाला अधरोष्ठों में मुस्करा रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठे।” यानी द्विवेदी जी ने व्यंग्य को विधा कहने में सावधानी बरती है और उसे कथन की एक शैली के रूप में निरूपित किया है लेकिन उनकी इसी राय में एक तथ्य अंडरकरेंट की तरह विद्यमान है। वह मानते हैं कि व्यंग्य कथन का एक ऐसा सशक्त माध्यम है जिसमें पाठक की चेतना को झकझोर कर रख देने की क्षमता है। अनेक पुराने कवियों ने आडंबरों और कुरीतियों पर प्रहार करने के लिए व्यंग्य का एक शैली के रूप में प्रयोग किया है। कबीर इसमें सबसे आगे खड़े नज़र आते हैं। आधुनिक युग के कवियों में निराला और नागार्जुन से लेकर मुक्तिबोध, धूमिल, केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और रघुवीर सहाय ने भी व्यंग्य को शैली के रूप में इस्तेमाल किया है।

कविता से इतर जैसे-जैसे गद्य व्यंग्य लेखन की स्वीकार्यता पाठक वर्ग में बढ़ने लगी, व्यंग्य विधा है या शैली जैसे विमर्श भी होने लगे।

व्यंग्य के शिखर-पुरुष हरिशंकर परसाई व्यंग्य को एक स्पिरिट मानते थे। जब उन्होंने व्यंग्य को स्पिरिट कहा तब निश्चित ही उनका मंतव्य व्यंग्य को शैली निरूपित करने की ओर नहीं रहा होगा। स्पिरिट का शाब्दिक अर्थ आत्मा, मिज़ाज अथवा प्राण तत्त्व है। व्यंग्य में वे सारी ख़ूबियाँ निहित हैं जो साहित्य की किसी भी विधा को जीवंत बना सकती हैं, उसमें प्राण फूँक सकती हैं उसके मिज़ाज को लोकहित और जनजागृति का कारक बना सकती हैं। खेलों में अक्सर टीम-स्पिरिट की बात की जाती है जिसका आशय निष्ठा-भाव से है। व्यंग्य लेखन के लिए भी जन और लोक के प्रति निष्ठा का भाव होना ज़रूरी है।

प्रसिद्ध आलोचक अमृत राय ने अपने एक आलेख में लिखा था “व्यंग्य साहित्य की ही एक विधा है। उसका भी वही प्रयोजन है जो सब साहित्य का होता है।” इसी आलेख में वह आगे लिखते हैं “व्यंग्य साहित्य की बहुत ही समर्थ और विशेष रूप से सामाजिक विधा है। दिशा-काल में जहाँ तक झूठे आडंबर और पाखंड की व्याप्ति है वहाँ तक व्यंग्य का क्षेत्र है।” एक साक्षात्कार में जब पूछा गया कि ‘आप व्यंग्य को एक स्वतंत्र विधा मानते हैं या शैली’ तब रामनारायण उपाध्याय का उत्तर था “मैं व्यंग्य को स्वतंत्र ही नहीं वरन सशक्त विधा मानता हूँ।” कथाकार मन्नू भंडारी भी व्यंग्य को वर्तमान की सबसे सार्थक विधा मानती थीं।

व्यंग्य-लेखन एक सौद्देश्यपूर्ण कार्य है। जन-सरोकार और सामाजिक प्रतिबद्धता इसके केंद्र में हैं। श्याम सुंदर घोष लिखते हैं “व्यंग्य एक परिपक्व और स्थायी मानसिकता की उपज है| यह परिपक्वता अनायास नहीं आती, यह अनुभव ऊष्मा की उपज है।” बहुत से व्यंग्यकार व्यंग्य-लेखन को एक चुनौतीपूर्ण लेखन मानते हैं। अच्छा व्यंग्य बैचैनी या मन की छटपटाहट से पैदा होता है और पढ़ने वाले को भी बेचैन कर देता है। दुष्यंत ने लिखा भी है “आग कहीं भी हो जलनी चाहिए।” व्यंग्य के बारे में जयशंकर प्रसाद के विचार भी उल्लेखनीय हैं- “हृदय में जितना यह घुसता है, उतनी कटार नहीं।” व्यंग्य नकारात्मकता से सकारात्मकता की यात्रा है। व्यंग्य दूषित मस्तिष्क को परिष्कृत करने की साधना है। हरीश नवल इस संदर्भ में एक विचारणीय बात सामने रखते हैं- “अन्य विधाकार कहीं से भी अपने विषय उठा सकते हैं, किंतु व्यंग्यकार गंदगी के मुहाने पर खड़े होकर विषय चुनता है। उसका दायित्व गुरु गंभीर है, वह बुराई को जानने और उसे समाप्त किये जाने के विचार का प्रसारक होता है।”

व्यंग्य को विधा न मानने को लेकर अक्सर तर्क दिये जाते हैं कि हर विधा का एक विधान होता है जैसा कि कविता का है, कहानी का है और उपन्यास का भी, लेकिन व्यंग्य का कोई स्वतंत्र विधान नहीं है। हास्य की तरह व्यंग्य साहित्य के रसों में भी शामिल नहीं है। यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि व्यंग्य के पास जो भाषा है वह अन्य विधाओं के पास नहीं है। अभिव्यक्ति के जितने औज़ार व्यंग्य ने विकसित किये हैं और भाषा के स्तर पर जितने प्रयोग व्यंग्य में हुए हैं उतने किसी विधा में देखने को नहीं मिलते। भाषा व्यंग्य की पहचान है और ताक़त भी। किसी निबंध को पढ़कर आप सहजता से इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि यह ललित निबंध है या व्यंग्य निबंध।

इसी प्रकार व्यंग्य कथा और सामान्य कहानी में भी अंतर कर सकते हैं। मतलब व्यंग्य के पास भाषा का जो तेवर है वह सबसे अलग है। अन्य विधाओं में भाषा परिवेश का निर्माण करते हुए कथ्य को संप्रेषित करने का काम करती है जबकि व्यंग्य-लेखन में भाषा पाठक को चेतन करती है, उसे झकझोरती है, आंदोलित करती है, उद्वेलित करती है। प्रसिद्ध विद्वान हॉकेट के मतानुसार- “एक ही भाषा में एक ही बात को सम्प्रेषित करने के तरीक़े जो संरचना में अलग होते हैं उन्हें शैली कहते हैं।” इस संदर्भ में भी देखें तो व्यंग्य की यही शैलीगत विशेषता ही उसे एक स्वतंत्र विधा के रूप में मान्य करने के लिए पुख़्ता ज़मीन प्रदान करती है। श्याम सुंदर घोष का यह कथन भी क़ाबिले-ग़ौर है कि “साहित्य के क्षेत्र में व्यंग्य की स्वायत्तता अब प्रतिष्ठित होने को है इसलिए व्यंग्य अब किसी विधा का मोहताज नहीं है।” आज व्यंग्य की जो प्रतिष्ठा है, पहुँच है, उसके पास भाषा का जो अनोखापन है उसके आधार पर व्यंग्य को विधा मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व डॉ. हृदय नारायण उपाध्याय ने वेब पत्रिका साहित्य कुंज में इसी विषय पर लिखे अपने एक आलेख का अंत इस तरह किया था- “कथन की एक शैली के रूप में जन्मा व्यंग्य आज साहित्य की सशक्त विधा बन गया है और भविष्य में साहित्य की केन्द्रीय विधा बनने की सारी संभावना इस में सन्निहित है।” मेरा भी यही मानना है कि व्यंग्य, अपनी शैलीगत और भाषाई विशेषता तथा साहित्य की हर विधा में अपनी विशिष्ट पहचान के साथ प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने की विलक्षणता के कारण, विधा होने की पात्रता रखता है।

अरुण अर्णव खरे, arun arnaw khare

अरुण अर्णव खरे

अभियांत्रिकीय क्षेत्र में वरिष्ठ पद से सेवानिवृत्त। कथा एवं व्यंग्य साहित्य में चर्चित हस्ताक्षर। बीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त। अपने माता-पिता की स्मृति में 'शांति-गया' साहित्यिक सम्मान समारोह आयोजित करते हैं। दो उपन्यास, पांच कथा संग्रह, चार व्यंग्य संग्रह और दो काव्य संग्रह के साथ ही अनेक समवेत संकलनों में शामिल तथा देश भर में पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन। खेलों से संबंधित लेखन में विशेष रुचि, इसकी भी नौ पुस्तकें आपके नाम। दो ​विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत के साथ ही मॉरिशस में 'हिंदी की सांस्कृतिक विरासत' विषय पर व्याख्यान भी।

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