
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
- 8
पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
शायर बेदख़ल और गुम कैसे हो गया?
जीवनशैली में बदलाव की साज़िशों, मजबूरियों और हसरतों ने एक ऐसा समाज रच दिया है, जहां शायर/कवि/पोएट सिरे से ग़ायब है। यह पूरे समाज की सेहत पर किस तरह एक हमला है, हममें से कितने समझना चाह रहे हैं!
अपने एक लेख में सुमना रॉय सिनेमा में लगातार खोते चले गये उस किरदार की बात करती हैं, जो शायरी करता था। गुरुदत्त की ‘प्यासा’ से लेकर 2017 की ‘इत्तेफ़ाक़’ तक वह कुछ फ़िल्मों का ज़िक्र करती हैं और परदे पर शायर के किरदार में आये बदलाव को समझना चाहती हैं। यह लेख कोई समग्र या स्पष्ट वैचारिकी पेश करने के बजाय कुछ इशारे देता है और दो–एक ऐसे तार छेड़ देता है, जो दिमाग़ में उथल–पुथल मचाने लगते हैं: मसलन कवि बनाम लेखक, कवि बनाम प्रकाशक और कवि बनाम उद्यमी।
इन दिनों साहित्य के घेरे में कुछ जुमले दबी–छुपी नहीं साफ़ आवाज़ में गुर्रायमान हैं। जैसे फ़िक्शन लिखिए शायरी की किताबें कौन ख़रीदता है? फ़िक्शन वालों पर नॉन फ़िक्शन लिखने का दबाव कम नहीं है। उस पर सियासी नैरैटिव तय करने की अजीब शर्तें… हस्बे–हाल यह कि कवि पर लेखक हावी है, प्रकाशक भी, अफ़सरशाही भी और उद्यमी भी। बड़े–बड़े पुस्तक मेलों के केंद्र में शायर नहीं है। प्रकारान्तर से लेखक ही नहीं है। यह व्यापारियों का व्यापार मेला है। शायर और लेखक यहां कठपुतली की तरह नचैये हैं और प्रकाशक व आयोजक के हाथ में उनके धागे हैं। अब शायर के सामने चुनौती है उसे प्रकाशक और उद्यमी की तरह भी स्थापित होना है।
शायरी की दुनिया के अपने अंतर्विरोध भी कुछ कम नहीं हैं। यहां हल्के और मंचीय कवियों से वो परेशान हैं, जो अदब की ख़िदमत के क़ायल हैं। हर साल बढ़ रही पुस्तक मेलों की रौनक़ के बावजूद अदब के लिए प्रकाशकों का टोटा पहले ही की तरह है। अगर वह फ़िल्मी नहीं है, मंचीय नहीं है तो साहित्य उत्सवों में भी शायर बैकसीट पर है।
एक अंतर्विरोध यह भी कि शायर सच में हैं कितने? जैसे नेतृत्व करने वालों में नेता सच में कोई है क्या? जैसे ख़बरनवीसी के धंधे में सच में पत्रकार बचा कौन है? जैसे न्यायपालिका में न्याय… शायर जिस मिज़ाज की मिट्टी से बनता है, ऐसी बनत कितनों की है, यह सवाल किसी और से नहीं मैं ख़ुद से पूछता रहता हूं। और जो कुछ टटोलता रहता हूं उस पर बात फिर कभी, यहां शायरी के ग़ायब होते जाने की बात को आगे बढ़ाते हैं।

जब शायरी के घेरे वाली दुनिया में ही शायर मरक़ज़ में नहीं है तो सिनेमा में, किसी और कला में और समाज में कहां से होगा? या सवाल इसका उल्टा है कि बाक़ी सब दुनियाओं से शायर को बेदख़ल किया गया, तब अपने आप शायर की दुनिया ही तबाह हो गयी? एक शायर अपनी मस्ती, अपनी धुन और अपनी ज़ात में जीना चाहे तो यह किस तरह, कितना मुमकिन रह गया है!
उत्तर आधुनिकतावाद पर आमादा समाज में एक ग़लत नारे ने शायर की हस्ती को ख़त्म करने में बड़ा रोल निभाया। वह था, ‘हर व्यक्ति कवि होता है’। नहीं होता। बेशक नहीं होता। हर व्यक्ति में कवि या कविता को समझने की समझ होने की गुंजाइश ज़रूर रहती है, बस अधिकतम सटीक बात यही हो सकती है। मैं तक़रीबन पिछले दो दशक से यह महसूस कर रहा था और कोई समर्थन खोज भी रहा था। बांग्ला कवि जीबानंदा दास के ग्रंथ में मिला एक वाक्य, “शोकोलेई कबी नोय, केउ केउ कबी”।
सब कवि नहीं हैं, सबके लिए कविता लिखने का शौक़ पालना ठीक है न समाज में कविता के नाम पर लिखी बकवास फेंकना ही। इससे वो एक शायर को नहीं बल्कि पूरे समाज की शायराना चेतना के साथ खिलवाड़ करते हैं। इसे बहुत ज़ाती स्तर पर भी समझना पड़ता है। एक शायर अगर सच में शायर है और हर पल शायर है, तब तो आलम यह होगा कि वह जो कहेगा, वही बात शेर हो जाएगी, शायरी हो जाएगी। लेकिन अगर दुनियादारी में रहते हुए अगर दिन, हफ़्ते या महीने भर में आप पल दो पल को शायर हो रहे हैं, तब अपने आप पर बहुत नज़र रखिए। हो सकता है आपके भीतर का दुनियादार ही भीतर के शायर की आड़ में कुछ कहने की साज़िश करता हो।
शायर को पहले ख़ुद शायरी के सच में लौटना है। अभिव्यक्ति तलाश रहे हर शख़्स को शायरी ख़ुद कर लेने की बेवकूफ़ी का शिकार नहीं होना है, सच्चे शायरों को खोजना है। उसके बाद शुरू होगी वह जद्दोजहद, जहां प्रकाशक, उद्यमी वग़ैरह के बरअक्स शायर की स्थापना की जा सके। सिनेमा हो या समाज, बाज़ार और सियासत के कब्ज़े में जो कुछ है, वह नहीं चाहेगा कि शायर का किरदार स्थापित हो सके।
क्यों? शायराना तासीर वाले समाज में हिंसा नहीं बेची जा सकेगी, झूठ नहीं चलाया जा सकेगा, बाज़ार का बोलबाला कितना रहेगा, नफ़रत थोड़े फैलायी जा सकेगी, बंधनों को मान्यता कब मिलेगी, खोखली आस्थाएं क्यूं टिकेंगी, हथयार की ज़रूरत क्या रहेगी, साज़िशों और मजबूरियों के सिक्के कहां चल सकेंगे…
शायर गूंगे समाज की ज़रूरत हमेशा है लेकिन गूंगे समाज को बहरा और अंधा बनाये रखने की साज़िशें तेज़ रहती हैं ताकि वह अपनी आवाज़ खोज सके, न पा सके।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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प्रश्न पर बहुत गंभीरता से विचार करता है यह संपादकीय आलेख। सचमुच! एक कवि के मन में खलबली मचाने के लिए यह काफी है। शायर का हाशिए पर जाना समाज में न्याय की आवाज का भी हाशिए पर चले जाना है।
बहुत जरूरी मुद्दा उठाया आपने।
प्रश्न बहुत हैं उत्तर कम
सियासत क्या चाहेगी क्या नहीं इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है।
शायर में जिद हौसला और प्रखरता और शायरी में इतनी शक्ति हो तो वह जियेगी वह जीतेगी
सार्थक लेख
वाज़िब सवाल उठाए हैं।
Nicely written and deeply thought
An aspect of poet rarely observed and discussed. We generally avoid to see through and beyond a worldly character and hesitate to accept a sea within