
- December 12, 2025
- आब-ओ-हवा
- 3
'याद आते रहेंगे धर्मेंद्र' सिनेमा नोट्स ब्रज श्रीवास्तव की कलम से....
क्यों बार-बार देखी जाये सत्यकाम?
सत्यकाम (1969), धर्मेंद्र इस फ़िल्म में सिर्फ़ सुंदर या स्मार्ट नहीं लगे— वह मानो उस कालखंड की नैतिक जिजीविषा का चेहरा बनकर उभरते हैं। आज यह प्रश्न और तीखा लगता है कि “एंग्री यंग मैन” का नैरेटिव अगर इन पर गढ़ा जाता, तो शायद भारतीय सिनेमा की दिशा ही कुछ और होती। पर शायद नियति ने उनके भीतर छिपे सौम्य, सत्यनिष्ठ और विचारशील नायक को ही परदे पर अमर करना चाहा।
सिनेमा में सत्य और ईमानदारी पर फ़िल्में तो अनेक हैं, पर सत्यकाम की ईमानदारी “घोषणा” नहीं, बल्कि एक “जीवन–शैली” की तरह प्रकट होती है। 1969 में आयी इस फ़िल्म में वह छोटे-छोटे प्रसंगों में सत्यप्रिय आचार्य (धर्मेंद्र) का सत्य के प्रति आग्रह किसी नारे की तरह नहीं, बल्कि बिलकुल सहज, स्वाभाविक और गहरे मानवीय अनुभव की तरह सामने आता है। बड़े संकटों में सत्य पर दृढ़ रहना तो आसान कहा जा सकता है, मगर जीवन की क्षण-क्षण की परीक्षाओं में, सामान्य स्थितियों में, रिश्तों के बीच, भय और मोह के बीच, वहाँ जो ईमानदारी फ़िल्म दिखाती है, वही इसे क्लासिक बनाती है।
शर्मिला टैगोर का अभिनय किसी स्वच्छ झरने की तरह है— निर्मल, सरल और प्रभावी। उनका किरदार नायक के भीतर के संघर्षों को न केवल समझता है बल्कि उन्हें एक मानवीय ऊष्मा भी देता है। अशोक कुमार दादाजी के रूप में साधुता और विवेक के प्रतीक हैं— फ़िल्म की शुरूआत और अंत में उनकी उपस्थिति पूरी कथा को दार्शनिक आधार देती है, मानो वही इस पूरी यात्रा के मौन साक्षी हों।
ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्मों में जीवन का यथार्थ जितना सुंदर दिखता है, उतना ही करुण भी। यहाँ भी उनका निर्देशन मानो जीवन और सिनेमा के बीच एक पुल बन जाता है— न कोई अति नाटकीयता, न कोई अनावश्यक तेज़ी, बस एक निरंतर बहता हुआ जीवन। राजेन्द्र सिंह बेदी के संवाद इतने सहज हैं, लगता है मानो वे उसी क्षण, उसी परिस्थिति में जन्म ले रहे हों। नारायण सान्याल की कहानी अपने आप में साहित्यिक गरिमा लिये हुए है—सरल लेकिन बेहद मार्मिक।
संगीत की बात करें तो लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने मिठास, चंचलता और गंभीरता का ध्यान रखते हुए धुनें बनायीं।
कैफ़ी आज़मी के गीतों में विचार भी है और भाव भी, जो कथा का विस्तार करते हैं। शुरूआती बस वाला गीत असरानी के रूप में एक चमक छोड़ जाता है— एक छोटी भूमिका लेकिन असरदार।

और संजीव कुमार! उनका नरेन का किरदार सत्यप्रिय के आदर्शवाद के सामने एक व्यावहारिक, लेकिन बेहद स्नेही प्रतिरूप है। जहाँ धर्मेंद्र का चरित्र आकाश की ओर देखता है, वहाँ संजीव कुमार धरती की धड़कन सुनते हैं। दोनों मिलकर उस नैतिक बहस को जीवित करते हैं, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
धर्मेंद्र का अभिनय शायद उनके करियर का सबसे गंभीर, सबसे आत्मीय और सबसे कठिन अभिनय है। सत्यकाम का धर्मेंद्र वही अभिनेता है जिसे देखने के बाद लगता है कि वह केवल एक रोमांटिक या एक्शन हीरो नहीं बल्कि एक गहरे संवेदनशील, विचारशील और अत्यंत सक्षम कलाकार भी थे। जिन्हें केवल शोले का वीरू याद है, उन्हें सत्यकाम का सत्यप्रिय अवश्य देखना चाहिए।
फ़िल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं, बल्कि आदर्श और यथार्थ, सिद्धांत और जीवन, प्रेम और सत्य, सबके बीच चलने वाला एक शांत, पर बहुत गहरा संवाद है। और इसीलिए सत्यकाम बार-बार लौटकर देखने योग्य फ़िल्म है।

ब्रज श्रीवास्तव
कोई संपादक समकालीन काव्य परिदृश्य में एक युवा स्वर कहता है तो कोई स्थापित कवि। ब्रज कवि होने के साथ ख़ुद एक संपादक भी हैं, 'साहित्य की बात' नामक समूह के संचालक भी और राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक आयोजनों के सूत्रधार भी। उनके आधा दर्जन कविता संग्रह आ चुके हैं और इतने ही संकलनों का संपादन भी वह कर चुके हैं। गायन, चित्र, पोस्टर आदि सृजन भी उनके कला व्यक्तित्व के आयाम हैं।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky

आदरणीय बृज भाई साहब और उनके काव्य संग्रह को पढ़कर एवं समकालीन काव्य में बाकी राष्ट्रीय स्तर की है मैं उनसे बहुत प्रभावित हूं
सच बात है,कोई भी अभिनेता किसी एक फ्रेम में नहीं देखा जाना चाहिए, सत्यकाम का धर्मेंद्र वो नहीं है जिस रूप में उन्हें कई दशक तक देखा गया।
बहुत पहले इस फिल्म को देखा था। उस समय शायद 11वी में पढ़ता था। उस फिल्म के हीरो की मुसीबतों को देखते हुए ईमानदारी से जीवन जीने के प्रति दर्शकों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा था। फिल्म भी सिनेमा घरों में ज्यादा नहीं चली थी । दर्शक फिल्म में खुशनुमा माहौल से आकर्षित हो कर शिक्षा ग्रहण करना चाहता है।