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पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....

ज़रूरी सामाजिक प्रश्न उठाते हैं अवधेश प्रीत

            ‘नृशंस’ हमारे समय के प्रतिष्ठित और वरिष्ठ पत्रकार अवधेश प्रीत का महत्वपूर्ण कहानी संग्रह है। उनकी कहानियों ने हमेशा प्रभावित किया है। प्रतीकात्मकता अक्सर उनकी कहानियों में मिलती है और वो महत्वपूर्ण सामाजिक स्थितियों को भी प्रतीकों के माध्यम से कथानक को विस्तार देने में सफल होते हैं और कहानी की रोचकता प्रवहमान रहती है।

अवधेश प्रीत की कहानियां इसलिए भी प्रभावित करती हैं कि उनमें दलित, पीड़ित और शोषित समाज की उपस्थिति और उनकी जद्दोजहद के साथ राजनीतिक चेतना के स्वर भी मुखर होते हैं। आज जब पूरा सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य तेज़ी से बदल रहा है और सामाजिक संघर्ष हाशिये पर है तब व्यवस्था-जनित अन्याय और शोषण से लड़ते हुए पात्र भी कथा-साहित्य से ओझल होते जा रहे हैं।

रूस की अक्तूबर क्रांति के बाद दुनिया में समाजवादी विचारधारा ने शोषित-पीड़ित समाजों में नयी चेतना और आशा का संचार किया और दुनिया का बड़ा हिस्सा देखते ही देखते वर्चस्ववादी-अधिनायकवादी व्यवस्था का जुआ उतारकर समाजवादी राज्य व्यवस्था के रूप में स्थापित हुआ। लगभग सात-आठ दशकों बाद वैश्विक घटनाक्रम और सत्ता-व्यवस्था में परिवर्तन के साथ जो घटित हुआ, वह अलग से एक लंबी बहस का विषय है, लेकिन हिंदुस्तान में भी साम्यवादी विचारधारा और दर्शन ने बड़े बौद्धिक वर्ग को प्रभावित किया और सामाजिक न्याय, बराबरी के क्रांतिकारी दर्शन ने राजनीति में भी निर्णायक भूमिका निभायी।

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संसदीय लोकतंत्र की सीमाएं होती हैं। वैचारिक प्रतिबद्धता और संघर्ष के रास्ते अलग होते हैं। हिंदुस्तान में यह वैचारिक-सामाजिक संघर्ष इसलिए भी गति नहीं पकड़ सका क्योंकि यहां केंद्रस्थ जाति का प्रश्न ज्यों का त्यों बना रहा। जातिगत मानसिकता और वर्चस्ववाद यहां ख़ून में रचा-बसा है। आंबेडकर के बाद महत्वपूर्ण संघर्ष की अ​हमियत वोट की राजनीति के आगे समाप्त हो गयी। गांवों का माहौल सामंती मानसिकता से कभी मुक्त नहीं हो पाया। शासन-प्रशासन के अलावा बौद्धिक समाज ने भी इस ओर तवज्जो नहीं दी और न ठोस प्रयास किये। आज जब धर्म-जाति के आधार पर राजनीति का बोलबाला है तो पिछड़ेपन की सोच और प्रवृत्तियां समाज और राजनीति की मुख्यधारा में क़ाबिज़ हैं। ऐसे सामाजिक परिदृश्य में इस संग्रह की कहानियां विशेष रूप से ‘ग्रासरूट’ और ‘नृशंस’ अधिक उल्लेखनीय हैं।

पिछली सदी में बिहार बड़े भूस्वामियों और दलित-कामगार समाज के बीच हुए अनेक नृशंस और ख़ूनी संघर्षों के लिए चर्चा में रहा। ऐसे प्रकरण कमोबेश अन्य राज्यों से भी कभी-कभी सुनायी दिये। ऊंची जाति के ग्राम प्रधान, उनका समुदाय, कामगार लोगों की वाजिब मजूरी की मांग, हड़ताल। ‘ग्रासरूट’ कहानी में इसके बीच सबक़ सिखाने के लिए चमरटोले के रमेसरा की पिटाई और सरेआम पत्नी रजुली का शीलभंग। यहां चमरटोले को संघर्ष का पाठ पढ़ाने वाले कामरेड रामराज, वरिष्ठ कामरेड मधुसूदन, उनके पीछे चलने वाले रघुपति तथा उस जैसे ढेर सारे लोग भी हैं। रघुपति और साथियों ने रमेसरा और रजुली का बदला ग्राम प्रधान राघव राय की हत्या से लिया और नतीजा— पुलिस-प्रशासन का कहर चमरटोले पर। जहां घर जला दिये गये और गिरफ़्तारियां हुईं। रघुपति राजधानी पटना जाकर नेता रामराज से मदद मांगता है लेकिन क्रांतिकारी रामराज विधायक बनकर अब शासन-व्यवस्था का अंग है… ‘ग्रासरूट’ संघर्षरत क्रांतिकारी राजनीति के मोहभंग की, शोषण व्यवस्था के जस के तस बने रहने की और सामाजिक न्याय हेतु हिंसात्मक राजनीति के पतन की स्थितियों की कहानी है। कहना न होगा यह अपने समय के ऐतिहासिक कालखंड की प्रतिनिधि कहानी है, जो क्रांतिकारी आंदोलन के क्षरण के कारणों की पहचान करने का प्रयास करती है। ऐसी ही एक अन्य कहानी ‘नृशंस’ भी अपने समय और समाज को प्रतिबिंबित करती है, जहां सभ्य-सुसंस्कृत, पढ़ा-लिखा, मध्यवर्गीय समाज है। सरकारी अस्पताल में एक नक्सल लीडर विजय मित्र है, जो अचेतावस्था में है। अस्पताल के बाहर उसके समर्थक भी मौजूद हैं। ड्यूटी इंचार्ज डॉ. चौधरी उपलब्ध नहीं होते। अस्पताल परिसर में रहने वाले डॉ. सी.के. भगत की ड्यूटी नहीं है, फिर भी जूनियर डॉक्टर सुजाता राय के बहुत आग्रह करने पर वो विजय मित्र के उपचार के लिए आते हैं। अस्पताल की स्थिति ऐसी कि मरीज़ का ब्लड टेस्ट नहीं होता क्योंकि लैब बंद है और वहां ताला पड़ा है। आई.सी.यू. में, जहां मरीज़ है, बिजली चली जाती है और बहुत देर तक जनरेटर चालू नहीं होता। अंतत: विजय मित्र की मृत्यु हो जाती है। बाहर उसके साथियों की भीड़ शोर कर रही है। अत: डॉ. सुजाता राय के कहने पर डॉ. भगत डेथ सर्टिफ़िकेट दे देते हैं। अब राजनीति शुरू होती है। इंक्वायरी कमेटी बैठती है। ड्यूटी से अनुपस्थित डॉ. चौधरी, लैब इंचार्ज, जनरेटर वाला, जूनियर डॉ. सुजाता राय सहित सभी दोषमुक्त हो जाते हैं। डॉ. भगत दोषी हैं क्योंकि वो डेथ सर्टिफ़िकेट में लिखते हैं— ड्यू टू फ़ेल्यॉर आफ़ सिस्टम (व्यवस्था के विफल होने के कारण) और अनुशासनहीनता के आरोप में वह सेवामुक्त कर दिये जाते हैं।

कथाकार एक बार फिर वर्तमान व्यवस्था का संवेदनहीन चेहरा प्रस्तुत करता है, जो पाठकों को स्तब्ध भी कर सकता है। अन्य कहानियों में अली ​मंज़िल, फलितार्थ और तालीम भी प्रभावित करती हैं। ‘तालीम’ में एक जोशीला, नौजवान अध्यापक गांव की मुसहर बस्ती के बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रेरित करता है तो शासन-प्रशासन से लेकर गांव के लोग तक सभी इसका विरोध करते हैं। वह अंत में अपनी अध्यापक की नौकरी छोड़कर अपने बलबूते उन बच्चों को पढ़ाने का संकल्प करता है। ‘वजूद’, ‘मायामहल का बक्सा’, ‘कौतुक-कथा’ में अवधेश अपनी चिर-परिचित प्रतीकात्मकता के बीच ज़रूरी सामाजिक प्रश्नों को उठाते हैं।

कथा-साहित्य हो या कविता, साहित्य में वैचारिकता लेखन की आत्मा है और सामाजिक दृष्टि के निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस रूप में संग्रह की ये कहानियां रोचकता के साथ एक पाठ के रूप में हैं। ये क​हानियां पाठक की चेतना को संवेदनशील बनाती हैं।

यह कॉलम लिखना ख़त्म ही किया कि अवधेश प्रीत जी के जाने का समाचार मिला। स्तब्ध हूं..! शब्द नहीं मिल रहे आगे कुछ कहने के लिए। नमन… और स्मरण।

नमिता सिंह

नमिता सिंह

लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।

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