
- August 30, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
'हंगल साहब...' अपने ही अंदाज़ की कहानियां
हरि मृदुल का कथा संग्रह ‘हंगल साहब ज़रा हंस दीजिए’ दो साल पहले प्रकाशित हुआ। हरि मृदुल देश के अनेक राष्ट्रीय पत्रों में वरिष्ठ पद पर रहकर पत्रकारिता करने के बाद आजकल हिंदी के समाचार पत्र नवभारत टाइम्स, मुंबई में सहायक संपादक हैं। उत्तराखंड से आने वाले हरि मृदुल के चार कविता संग्रह और एक कुमाऊंनी में भी है। बाल साहित्य सृजन के अलावा वे फ़िल्मों पर भी लिखते रहे हैं। इस संग्रह में इक्कीस कहानियां हैं जिनकी पृष्ठभूमि अधिकांश में या तो मुंबई है, वहां की फ़िल्मी दुनिया या उत्तरांचल का पहाड़ी अंचल है। ये कहानियां अपने कलेवर में छोटी हैं लेकिन आधुनिक जीवन की विसंगतियों और संघर्षरत चरित्रों की सामाजिक स्थितियों को अनूठे अंदाज़ में प्रस्तुत करती हैं।
कहानी ‘कुत्ते दिन’ में ज़िक्र है कि कई नामचीन अख़बार बड़ी फ़िल्मी हस्तियों के कुत्तों के बारे में समाचार छापते हैं। अनेक न्यूज़ चैनल भी अपने विशेष कार्यक्रमों में इनको प्रस्तुत करते हैं। यह मीडिया चैनलों और अख़बारों पर बेहतरीन तंज़ है। ‘पटरी पर गाड़ी’ लगभग बीस साल पहले की मुंबई का वर्णन करती है, जब महानगर में भीषण बारिश और जलप्लावन से हज़ारों लोगों की जान चली गयी थी। इस पढ़ते हुए कथाकार स्वयं प्रकाश की कहानी ‘सूरज कब निकलेगा’ की याद आती है, जिसमें बाढ़ में डूबे गांव की स्थितियां हैं। ‘अर्जन्या’, ‘आलू’ और ‘बाघ’ भी लंबे समय तक याद रहने वाली कहानियां हैं। ‘अर्जन्या’ पहाड़ी जीवन की पृष्ठभूमि में फुंफकारते हुए जवान बछड़े को बधिया करने की कहानी है, जो अस्सी साल का बूढ़ा अर्जन्या करता है। अपनी जवानी के दिनों में वह ख़ुद भी जबरन धोखे से हुई नसबंदी का शिकार हुआ था।
‘बाघ’ कहानी के दादाजी अब अपने बेटे और पोते के साथ मुंबई में रहते हैं। अपनी जवानी के दिनों में जब वह पहाड़ में रहते थे, अपनी विशिष्ट हांक से बाघ को भगा दिया करते थे। बाघ और उनकी हांक मानो उनके भीतर समा गयी थी। वही बाघ और दादाजी की हांक जाने अनजाने में अब प्रौढ़ हो रहे पोते के भीतर समा गयी है। ‘आलू’ आज के कॉर्पोरेट जगत के द्वारा फैलाये गये व्यापार जाल की कहानी है। अपने आसपास की छोटी नामालूम सी चीज़ों को लेकर हरि मृदुल एक विचार के साथ कहानी गढ़ देते हैं। ऐसी ही छोटी छोटी कहानियां हैं ‘पानी में पानी’ और ‘पीतल के गिलास’, जिनमें संदेश देते उद्गार हैं, जैसे— ‘गिलास की तरह आदमी को भी पैंदे वाला होना चाहिए। जो पैंदे वाला होता है, ढपकता नहीं।’
एक और कहानी है ‘कन्हैया’, जिसमें एक नौजवान मुस्लिम बांसुरी वादक है। वह मुस्लिम है और कृष्ण भक्त भी है। यह आज के माहौल की कहानी है, जहां समाज दो हिस्सों में बंटता दिखायी दे रहा है। बांसुरी बजाने वाला आरिफ़ नमाज़ पढ़ता है और गीता भी पढ़ता है— लेकिन पुलिस वालों से डरता है। क्यों? यह अपने आप में सवाल है।
अपनी छोटी छोटी कहानियों में वे प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। ‘बिल्ली’ कहानी में बिल्ली के साथ अकेली, युवा महिला का किरदार है। महिला की, सुना है हाल फ़िलहाल में शादी हुई है। यह भी सुना है कि रात में उसका पति नशे में चूर होकर लौटता है। लेखक सोते सोते किसी के रोने की आवाज़ से उठ जाता है— यह भ्रम की स्थिति है कि बिल्ली रो रही है या कोई औरत! ‘घोंघा’ कहानी में भी लेखक धीमे रेंगते और आहट होते ही खोल के अंदर सिमट जाते इस जीव को मध्यवर्गीय समाज की मानसिकता के साथ जोड़ता है।
हरि मृदुल ऐसे सामान्य प्रतीकों के माध्यम से ढेर सारी छोटी कहानियों को अर्थवान बनाते हैं। इसी प्रकार अनेक सुपरिचित फ़िल्मी हस्तियों को केंद्र में रखकर छोटी कहानियों से जीवन और समाज को एक अलग नज़रिये से देखने की कोशिश करते हैं। ‘पृथ्वी में शशि’ (शशि कपूर) में बीमार शशि कपूर को उनकी अधेड़ प्रशंसक जब पहली बार देखती है तो उसकी संवेदनहीन और उपेक्षापूर्ण प्रतिक्रिया सामने आती है। ‘लता मंगेशकर की चोटी’ में लेखक के लिए लता के गाने और उनके उच्च पदस्थ व्यक्तित्व में चोटी प्रतीक बन जाती है, उनके भीतर छिपी एक छोटी बच्ची की भावनाओं की। ‘कपिल शर्मा की हंसी’ में जब स्टेज पर कपिल शर्मा की हंसी ग़ायब हो जाती है… वो हंस नहीं पाते तब उनके बूढ़े मेकअप मैन द्वारा यह कहना कि ‘कभी (अपने व्यस्त व्यावसायिक जीवन से) समय निकालकर अपनी चार महीने की बिटिया की हंसी देखी है?’ महत्वपूर्ण है।
अब बात संग्रह की शीर्षक कहानी की। इसमें भी भारतीय सिनेमा के सुपरिचित बेहतरीन कलाकार ए.के. हंगल को केंद्र में रखकर व्यावसायिकता के निर्मम और संवेदनहीन चरित्र को प्रस्तुत किया गया है। हंगल साहब नब्बे पार हैं, बीमार हैं, व्हीलचेयर पर हैं और आर्थिक कष्टों से जूझ रहे हैं। दवाओं के लिए भी उनके पास पैसे नहीं। एक फ़ैशन शो के आयोजन में, रैंप पर आने के एवज़ उन्हें पचास हज़ार का चेक मिलेगा। पैसे की ख़ातिर उन्होंने यह आफ़र स्वीकार कर लिया। अब हाउसफ़ुल के इंतज़ार में संयोजक ने उन्हें लंबे समय तक इंतज़ार कराया। फिर सामने लाये। उनसे डायलॉग बुलवाये जा रहे हैं… (शोले फ़िल्म का उनका मशहूर डायलॉग) कांपती आवाज़, बोलने में असमर्थ हंगल साहब से हंसने को कहा जा रहा है… अपने आप में बेहद मार्मिक और चैरिटी के पीछे छिपी घोर व्यावसायिकता का चेहरा उजागर करती है यह कहानी।
हां! जब ‘वर्तमान साहित्य’ पत्रिका अलीगढ़ से संपादित और प्रकाशित होती थी, तब इस कहानी को ‘वर्तमान साहित्य: कमलेश्वर कहानी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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