mass grave photo sabhar
मोहम्मद जोकोर लिखित इंडोनेशियाई कहानी का अंग्रेज़ी से अनुवाद श्रीविलास सिंह की कलम से....

मौत

              खुले मैदान के मध्य में मोड़ पर जीप रुक गयी, और उसके पीछे आते दो ट्रक भी। हम आख़िरी ट्रक से नीचे कूद पड़े, जब हम कई तरीक़ों से अपनी भावनाओं पर नियंत्रण पाना चाह रहे थे, हमारे हृदय अनियंत्रित तरीक़े से धड़क रहे थे। दोपहर के बाद की भारी वर्षा ने ज़मीन को कीचड़ से भर दिया था, लेकिन आसमान साफ़ और हवा शुष्क थी। मुस्लिम महीने शव्वाल के सातवें दिन का हंसिये के आकार का चांद बहुत पहले ही पश्चिम में डूब चुका था। यह एक बहुत शांत रात्रि थी।

हम ट्रक के पास समूहों में कमांडेंट के निर्देशों की प्रतीक्षा करते हुए खड़े थे। वह जीप के पीछे अपने मातहतों से बात करने में व्यस्त था। बीच वाला ट्रक पंद्रह मीटर दूर था और भयानक, कठोर और रहस्यमय लग रहा था। यद्यपि इसमें बीस आदमी आये थे लेकिन चालक के अतिरिक्त और कोई नीचे नहीं उतरा था। उन्हें हमारी प्रतीक्षा करनी थी। और हमें आदेशों की।

हम अठारह लोगों में से मात्र गुमान था, जो न डरा हुआ था और न ही चिंतित। उसकी लंबी, छरहरी देह गर्व से हमारी भयभीत देहों से ऊपर दिख रही थी। मालाबार, एक बहादुर और खुला हुआ व्यक्ति, चेहरे पर फैली एक झूठी मुस्कान द्वारा अपना भय छिपाने का प्रयत्न कर रहा था। अन्य, मेरी ही भांति, ठंडा गरम महसूस कर रहे थे।

“तुम कांप रहे हो, क्या नहीं?” मालाबार फुसफुसाया। उसकी आवाज़ में तनाव सा लग रहा था।

मैंने सिर हिलाया। अन्य सब सिगरेट पी रहे थे। मैं जानता था कि गुमान को छोड़कर अन्य सब मेरे ही जैसा सोच रहे थे। वे सब डरे हुए थे। निःसंदेह, कोई भी हुआ होता। हम कुछ ऐसा देखने वाले थे, जो हमने पहले कभी नहीं देखा था, और न संभवतः आगे कभी देखेंगे। मालाबार को झूठ बोलने की कोई आवश्यकता न थी। संभवतः वह इसलिए भयभीत था क्योंकि गुमान ने बिल्कुल भय का प्रदर्शन नहीं किया था। किंतु उसने महसूस किया कि उसे कुछ प्रभावशाली कहना चाहिए।

“हुंह, तुम सब बेवकूफ़ परियों के झुंड की भांति हो। हमें आभारी होना चाहिए कि हम उनकी जगह नहीं हैं। वे असफल रहे थे। वे सफल हो सकते थे, और तब हम उनकी जगह होते जो तकलीफ़ झेलते। हो सकता है कि कुछ और भी बदतर।”

वह किसी विशेषज्ञ विश्लेषक की भांति मुस्कराया, किंतु उसकी आवाज़ के कायरों जैसे स्वर ने उसका साथ नहीं दिया। “उन्होंने गुनाह किया है। उन्होंने लोगों को मारा और उन सबसे लड़े जो उनके पक्ष में नहीं थे। उनकी शिक्षाओं ने उन्हें जंगली जानवरों के एक झुंड में बदल दिया, जो किसी भी तरीक़े से भी सत्ता प्राप्त करने को तैयार थे। और उन्होंने इसका प्रयत्न भी किया। किंतु अल्लाह कृपालु है। सत्य और न्याय सदैव सही समय पर विजयी होगा। आज की रात सही समय है।”

मैं महोगनी के एक वृक्ष का सहारा लेकर खड़ा हो गया और एक सिगरेट जला ली। मालाबार के व्याख्यान ने मुझ पर कोई प्रभाव नहीं डाला। हर कोई कठिनाई में पैदा हुआ और बड़ा हुआ है, और उसी भांति जीता और लड़ता रहा है। कम्युनिस्ट दुष्ट नहीं लगते। उन्हें भी अल्लाह ने ही बनाया है।

मुझे वहाँ आने का अफ़सोस हुआ। शहर का सैन्य कमांडेंट हमारे उप जिले में रहता था। हमारे अच्छे संबंध थे; उसने आग्रह किया कि मैं भी साथ चलूं। “यह एक अच्छा अनुभव होगा, दोस्त।”

मैं तब भी इनकार कर सकता था, किंतु मेरे कई मित्र अन्य रातों को आ चुके थे और मुझे लग रहा था, जैसे मैं अलग छूट गया था। अली ने आग्रह किया था, और मैं डरा हुआ था किंतु जाना चाहता था। अब मैं पीड़ा में था। यह तब और भी बुरा हो गया जब मेरे साथियों में से एक, तुहरी ने बताया कि दूसरे ट्रक पर बैदी भी था।

*इस पंक्ति को रोको!” एक पुलिस वाले ने तीखी आवाज़ में कहा।

बैदी मेरे साथ स्कूल में मेरी कक्षा में था। वह गणित और भूगोल में हमेशा फ़ेल हो जाता था। हमने साथ साथ क्याई कमदानी का “सुरऊ” का पाठ करना सीखा था।

दुःखी होने के लिए बहुत समय नहीं था। हमें जल्दी ही आदेश दिया गया कि क़ैदियों को एक एक कर नीचे उतारें। उन्हें सड़क से लगभग पचास मीटर दूर एक ख़ास स्थान पर ले जाने को कहा गया।

“चिंतित मत हो: वे बंधे हुए हैं और उनकी आंखों पर पट्टी चिपकी हुई है,” कमांडेंट ने कहा। वह छोटे क़द का व्यक्ति था, जिसकी आवाज़ में भारीपन और अधिकारबोध था। वह अपनी बुरी सिलाई वाली वर्दी में अपेक्षाकृत स्मार्ट लग रहा था। वह हमसे दूर चला गया। हममें से कुछ ने एक दूसरे की ओर भावनात्मक आश्वासन के लिए देखा।

“इतना बुरा मत महसूस करो। कल्पना करो कि यह एक जंगली सांड है, तुम जिससे छुटकारा पा रहे हो। उन्हें खींच कर वहाँ ले चलो,” मालाबार ने कहा।

अंततः हमने वही किया जिसका हमें आदेश हुआ था। उन्हें एक एक कर के नीचे उतारा और धान के खेतों की ओर ले गये। वहाँ दो बड़े बड़े गड्ढे थे। मैने बैदी को देखना चाहा किंतु अभी उसे देखने हेतु काफ़ी अंधेरा हो चुका था।

तुहरी और मैं एक लंबे व्यक्ति को ले चले, जो सारंग और पाजामा पहने हुए था। हमने उसकी बांह कसकर पकड़ी हुई थी। मैं अच्छी चीज़ें करना चाहता था और उस व्यक्ति से उसका नाम और वह कहाँ से आया था, पूछना चाहता था, किंतु मैने अपने विचारों को तत्काल दबा लिया। जवाब मुझे भावनात्मक बना सकता था। मुझे संदेह था कि उन्हें पता भी होगा कि आगे उनके साथ क्या होने वाला था। अचानक उसने कोमलता से पूछा: “आप मुझे कहाँ ले जा रहे हैं, सर।”

मैने तुहरी की ओर देखा और आश्चर्य करने लगा कि क्या करना चाहिए। एक क्षण को तुहरी चुप रहा। फिर उसने कहा: “हम एक दूसरी जेल में ले जा रहे हैं, चाचा।”

“ज़मीन में इतनी कीचड़ क्यों है?”

कुछ नहीं था जो हम कह सकते। हमने उसके प्रति दुःख अनुभव किया।

अंततः वे सब तैयार थे। हर गड्ढा डेढ़ मीटर गहरा था। हमने हर गड्ढे के सामने दस आदमियों को खड़ा किया और उन्हें घुटनों के बल बैठने को कहा। हरे रंग की सैन्य जैकेट पहने सैनिकों का एक दस्ता और पांच पुलिस वाले उनके लगभग बारह क़दम पीछे खड़े थे।

“रेडी,” कमांडेंट अपनी पिस्तौल निकालकर आसमान की ओर उठाता हुआ चिल्लाया।

मैं कांप गया। हवा मेरी देह के ऊपर से बहती हुई लगी। मृत्यु की यह अनुभूति बहुत वास्तविक थी। हमने अपनी मुट्ठियां भींच लीं और सांसें रोक लीं: हर कोई गर्मी महसूस कर रहा था। मैं अब भी बैदी को तलाश रहा था। पिस्तौल की आवाज़ के साथ ही गोलियों की तेज़ आवाज़ आयी और साथ ही राइफ़ल्स चलने की चमकीली रोशनी हुई। बीस मनुष्य चीखे और गड्ढों में गिर गये। यह बहुत भयानक था। मैं एक बार फिर कांप उठा, इस बात से अवगत कि यदि मैंने स्वयं को नियंत्रित नहीं किया तो मैं बेहोश हो जाऊंगा। मैंने कभी पहले मनुष्यों को इस तरह एक दूसरे को मार डालते हुए नहीं देखा था, न ही कभी एक साथ इतने सारे मृतकों को।

मैंने होश में रहने हेतु स्वयं को केंद्रित किया। मेरे कई साथी इस तरह खड़े थे जैसे किसी काले जादू के प्रभाव में हों।

गोलियों की एक और बौछार ने शीघ्र ही दोनों गड्ढों में से आती दर्दनाक चीखों और कराहों को रोक दिया। अब हर चीज़ बहुत शांत थी।

मैं नीचे ढह गया और नारियल के एक वृक्ष के नीचे बैठ गया। जो कुछ मैंने अभी अभी देखा था, अकस्मात किसी नाटक अथवा फ़िल्म का दृश्य सा लगने लगा, न कि सामूहिक हत्या का वास्तविक दृश्य।

अन्य सब इकट्ठे होकर गड्ढों को भरने हेतु फावड़ों की प्रतीक्षा करने लगे, किंतु मैं जहां था वहीं बना रहा। वे सब कितनी आसानी से मर गये, कितनी व्यर्थ, कितनी उद्देश्यहीन मौत, और पशुओं की भांति दफ़ना दिये गये।

बाद में जब घर लौटा, मैं सो नहीं सका।

श्रीविलास सिंह

श्रीविलास सिंह

अनेक वर्षों से लेखन। दो कविता संग्रह, तीन संग्रह अनूदित कविताओं के, एक कहानी संग्रह, तीन संग्रह अनूदित कहानियों के, कविताएँ, कहानियाँ और देशी विदेशी साहित्य के अनुवाद और लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित, साहित्य और संस्कृति की पत्रिका “परिंदे” का अवैतनिक संपादन।

1 comment on “मौत

  1. जिन्हें गोली नही लगी वे भी मरे हुए से हो गए ।
    मार्मिक ..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *