ahmad faraz, vineet aashna, saleem sarmad, bhavesh dilshad
रदीफ़ के तौर पर 'चराग़' लफ़्ज़ को बरतने वाली चार ग़ज़लों का गुलदस्ता। मुमकिन है चार शायरों की इन चार ग़ज़लों में मुख़्तलिफ़ रंग पाठकों को नज़र आएं। दीवाली के मौक़े पर आब-ओ-हवा की इस ख़ास पेशकश पर आप अपनी राय हमें ज़रूर दें...

'चराग़' के विषय पर चार शायरों की ग़ज़लें

अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल

तेरे होते हुए महफ़िल में जलाते हैं चराग़
लोग क्या सादा हैं सूरज को दिखाते हैं चराग़

अपनी महरूमी के एहसास से शर्मिंदा हैं
ख़ुद नहीं रखते तो औरों के बुझाते हैं चराग़

बस्तियाँ दूर हुई जाती हैं रफ़्ता-रफ़्ता
दम-ब-दम आँखों से छुपते चले जाते हैं चराग़

क्या ख़बर उनको कि दामन भी भड़क उठते हैं
जो ज़माने की हवाओं से बचाते हैं चराग़

गो सियह-बख़्त हैं हम लोग प’ रौशन है ज़मीर
ख़ुद अँधेरे में हैं दुनिया को दिखाते हैं चराग़

बस्तियाँ चाँद सितारों की बसाने वालो
कुर्रा-ए-अर्ज़ पे बुझते चले जाते हैं चराग़

ऐसे बेदर्द हुए हम भी कि अब गुलशन पर
बर्क़ गिरती है तो ज़िंदाँ में जलाते हैं चराग़

ऐसी तारीकियाँ आँखों में बसी हैं कि ‘फ़राज़’
रात तो रात है हम दिन को जलाते हैं चराग़

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विनीत आशना की ग़ज़ल

जबसे हवा ने की है हिमायत चराग़ की
कुछ और बढ़ गयी है मुसीबत चराग़ की

लाज़िम है कीजिएगा हिफ़ाज़त चराग़ की
कुछ लोग कर रहे हैं सियासत चराग़ की

तारीकियाँ कुछ इन दिनों ऐसी हैं मुल्क में
दिन में ही लगने लगती है नौबत चराग़ की

मज़हब सिखा रहे थे अंधेरों की बन्दगी
हमने क़ुबूल कर ली इमामत चराग़ की

मौला दिलों से नफ़रतों के बीज ख़त्म कर
कुछ और हो बुलंद तमाज़त चराग़ की

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सलीम सरमद की ग़ज़ल

सारे आलम में हैं ख़ुदा के चिराग़
हमने देखे जला-जला के चिराग़

क्यों अंधेरा यहाँ सलामत है
कौन ख़ुश है यहाँ बुझा के चिराग़

तेज़ चलती रही हवा ग़म की
और जलते रहे दुआ के चिराग़

लाख तूफ़ान थे मगर फिर भी
हमने दिखला दिये जला के चिराग़

ये तमाशा ‘सलीम’ देखो तुम
जिसके तूफ़ां उसी ख़ुदा के चिराग़

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भवेश दिलशाद की ग़ज़ल

कोना-कोना कौन पहुंचा है? चराग़
दावा सूरज का है वादा है चराग़

जो अंधेरा है तले जड़ है वहीं
रोशनी का पेड़ होता है चराग़

जलते जाने की दुआ मिलने लगे
आदमी तब लगने लगता है चराग़

खोया रहता हूं तेरी यादों में और
कोई आता है बुझाता है चराग़

हो जहां उम्मीद मुश्किल वक्त में
हम वहीं कहते हैं और क्या है चराग़

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