
- October 29, 2025
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हास्य-व्यंग्य आदित्य की कलम से....
नेताजी-चमचाजी पुराण: दूसरा भाग
…नेताजी की जयंती और उनके नाम से कोई दिवस न मना पाने जैसी समस्याओं के बाद चमचा इस बात से उत्साहित था कि नेताजी के लिए एक अभूतपूर्व उपाधि चिपकाने की योजना बन सकती है। इस आइडिये के लिए चमचे ने अफ़सरों को बधाई देते हुए कुछ दमदार उपाधियों का चयन करने को हरी झंडी दिखाकर विदेशी शैम्पेन मंगवायी और इस सफलता का जश्न मनाया।
अफ़सरों ने राहत की सांस ली, हिंदी की डिक्शनरी मंगवायी गयी। ग़लतियों की गुंजाइश न रहे, सो रिफ़रेंस बुक्स का अध्ययन भी हिंदी में कमज़ोर अफ़सरों के हिस्से आया। कुछ अफ़सर तो सरकार की कार्यशैली से ही हिंदी के महारथी हो चुके थे। देर रात तक अनेक नामों और अपीलिंग उपाधियों की लिस्ट तैयार थी:
1. नव राष्ट्र निर्माता
2. दीन दूत
3. ग़रीबी हंता
4. राष्ट्र साहेब
5. विश्वगुरु
6. विकास पुरोधा
7. विकास अग्रदूत
8. विकास पुरुष
9. विश्व शांति प्रवर्तक
10. नवयुग पुरुष
11. सनातन संरक्षक
12. विश्वप्रिय
13. विश्व राजदूत
14. नव प्रवर्तक
15. विश्व विधाता
16. जनापेक्षा विभूति
17. विश्वबंधु
18. भारत नरोत्तम
चमचे ने उपाधियों की लिस्ट पर नज़र डाली और संतोष व्यक्त किया। उसने सीमित समय में अपेक्षा से बेहतर कार्य करने के लिए अफ़सरों की पीठ ठोकी। होटल के मैनेजर को देर रात में पार्टी का प्रबंध करना पड़ा। दूसरे दिन सभी दोपहर तक तान के पड़े रहे। दोपहर बाद चमचे ने अफ़सरों को एक छोटा–सा प्रेज़ेंटेशन रात तक भेजने का निर्देश दिया। मीटिंग को तीन दिन का एक्सटेंशन देकर चमचा दिल्ली की ओर उड़ गया।
दिल्ली में नेताजी से मुलाकात
चमचे ने दिल्ली पहुंचकर प्रेज़ेंटेशन की तैयारी की, उपाधि की स्वीकार्यता के लिए प्रस्तावित तथ्यों की तीनों शर्तों (समर्थकों, मीडिया और जन सामान्य) पर विचार किया। इस हेतु उसने देशव्यापी अभियान की कल्पना की और एक व्यवस्थित कार्य योजना के लिए योजना आयोग सहित देश के बड़े कारपोरेट को जुटाने के पहलुओं को अपने प्रेज़ेंटेशन में डलवाया।
नेताजी विदेश दौरे से लौटे और चमचे को ज़्यादा प्रतीक्षा न करवाते हुए निवास स्थित ऑफ़िस में बुलवा भेजा। चमचे ने सिलसिलेवार शिमला, ऊंटी और माउन्ट आबू की बैठकों का ब्योरा देकर उसने गंगा को धरती पर लाने जैसे असंभव को संभव कर देने वाली शेख़ी बघारी। फिर उपाधियों का ज़ख़ीरा सामने रख उन्हें साम, दाम, दंड, भेद की परंपरागत नीति से प्राप्त करने का चिंतन भी रखा। अपने लिए इतनी सारी उपाधियाँ देखकर नेताजी फूलकर कुप्पा होने से ख़ुद को रोक न पाये। आत्ममुग्धता में खो गये नेताजी को कुछ उपाधियाँ इतनी पसंद आयीं कि उन्हें धारण करने के लिए उतावले हो उठे। उन्होंने चमचे के सामने ही मुख्य सचिव को फ़ोन मिलाया और जल्द से जल्द उच्च स्तरीय विश्वस्त अधिकारियों और प्रमुख मार्गदर्शक कारपोरेट घरानों की संयुक्त बैठक बुलाने का निर्देश दिया। पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों और मीडिया सेल प्रभारियों की बैठक का ज़िम्मा पाकर चमचे ने अपना क़द बढ़ता हुआ महसूस किया।
रणनीतिकारों की बैठक
नेताजी की अध्यक्षता में मीटिंग शुरू हुई। पार्टी की बैठक में चमचे ने उन्हीं रणनीतिकारों को आमंत्रित किया था, जिन्हें पाँच सितारा होटलों में सरकार की कृपा से पलंग तोड़ने की लत लग चुकी थी। रणनीतिकारों ने अपने फटे पुराने झोलों से पार्टी द्वारा वर्षों से प्रचारित आदर्शवादी विचारों को निकालना शुरू किया। चमचे ने तभी अपने प्रेज़ेंटेशन से मुद्दा स्पष्ट किया। रणनीतिकार घाट–घाट का पानी पिये थे। उन्होंने झट से पार्टी आदर्शों से ऊपर उठते हुए चमचे का समर्थन किया। नेताजी ने खींसे निपोरते हुए आभार जताने वाली नौटंकी की। रणनीतिकारों ने नेताजी की उपाधि को सर्वमान्य बनाने हेतु देशव्यापी मुहिम की रणनीति बनाने के लिए समय मांगा। उन्हें देश के किसी भी रमणीय स्थल पर 5 दिन और 6 रातों का पैकैज चिंतन के लिए आवंटित हुआ।
रणनीतिकारों की सिफ़ारिशों में मुख्यत: केंद्र से लेकर ब्लॉक स्तर तक की सरकारी मशीनरी को नेताजी के महान कार्यों के प्रचार में झोंक देना, संबंधित साहित्य तैयार करवाना, पान ठेलों और चाय की टपरियों तक बहस को नेताजी के पक्ष में मोड़ना और पार्टी के मीडिया सेल द्वारा सोशल मीडिया पर आम जनमानस को नेताजी की महानता का ओवरडोज़ देना, जैसे बिंदु चमक रहे थे।
उच्च स्तरीय बैठक
यह प्रबुद्ध और व्यावहारिक समूह की बैठक थी। शासन के उच्चाधिकारी और कारपोरेट घराने के चुनिंदा लोग शामिल थे। चमचे को इससे दूर रखा गया। अतः बिना लाग–लपेट किये नेताजी ने चमचे के प्रेज़ेंटेशन के बाद निम्न मुद्दों पर चर्चा की:
- सरकारी मशीनरी तथा संसाधनों के उपयोग
- कारपोरेट के नेटवर्क का उपयोग तथा इस कार्य हेतु वित्तीय सहयोग
- सरकार और कारपोरेट के बीच इस उद्देश्य के लिए सामंजस्य
अधिकारियों ने एक टास्क फोर्स गठित कर इस हेतु नीति तथा उपायों की लिस्ट बनाने की अनुशंसा की। कारपोरेट ने इसे प्रशासन के भीतर तक पैठ बनाने और माल कमाने के स्वर्णिम अवसर के रूप में देखा, इसके लिए स्ट्रेटजी बनाने और वित्तीय संसाधन जुटाने का आश्वासन दिया।
अधिकारियों की सिफ़ारिशें:
1. सरकारी स्कूलों में नेताजी पर निबंध प्रतियोगिता, ऐसे शीर्षकों के चयन और कंटेंट के साथ जिसमें उपाधियों का ज़िक्र हो
2. सरकार द्वारा नियंत्रित/पोषित मीडिया में फ़ेक डिबेट
3. सरकारी तथा ग़ैर–सरकारी कार्यक्रमों में अधिकारियों व पदाधिकारियों के लिए नेताजी के लिए प्रस्तावित उपाधियों को दोहराने की अनिवार्यता
4. नेताजी को एकमात्र सर्वमान्य नेता के चेहरे के रूप में ले जाना, अर्थात किसी गांव में सड़क के गड्ढे पर ईंट, मिट्टी भी भर दी जाये तो पार्षद से पहले नेताजी की तस्वीर श्रेय वाले विज्ञापन पर हो… संबंधित विभाग के मंत्रियों/नेताओं को हर प्रचार से दूर रखने की नीति
5. नेताजी को पोस्टर किंग बनाने के लिए हर तरह की संस्थाओं को अतिरिक्त बजट
6. देश में युद्ध, तनाव और संघर्ष की कृत्रिम परिस्थितियां बनाकर उनके समाधान में नेताजी की भूमिका का महिमामंडन
उच्च अधिकारी पढ़े–लिखे थे। हिटलर के प्रौपेगंडा मिनिस्टर गोएबल्स के कारनामों से ख़ूब परिचित थे। उन्होंने उसे ही आदर्श मानकर सर्वसाधारण में नेताजी की छवि को बढ़ा–चढ़ाकर प्रस्तुत करने के विकल्प को ही चुना।
कारपोरेट के साथ सिंगापुर बैठक
सरकार के साथ कारपोरेट की गलबहियों को मीडिया और विरोधियों से दूर रखने के लिए यह बैठक देश से बाहर रखी गयी। कारपोरेट घरानों ने अपने आला दर्जे के प्रबंधकों को इस मुहिम पर लगाया हुआ था, जिन्होंने सरकारी उच्चाधिकारियों और नेताजी के सामने लंबी–चौड़ी कार्य योजना प्रस्तुत की:
- कारपोरेट टेलिकम्युनिकेशन के माध्यम से नेताजी का एकतरफ़ा प्रचार करेगा, बदले में पहले से स्थापित कंपनियों को कमज़ोर कर समर्थक घरानों को मज़बूत करने की नीति सरकार द्वारा बनायी जाएगी।
- मीडिया के प्रचलित सभी साधनों पर वर्चस्व कायम करने और हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने में सरकार समर्थक कारपोरेट घरानों की मदद करेगी।
- देश के भीतर तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेताजी की छवि बनाने के लिए एक्सपर्ट बड़ी एजेंसियों को हायर किया जाएगा, जिसके वित्त पोषण के लिए सरकार कारपोरेट को वित्त मंत्रालय में सलाहकार रखेगी, बजट निर्माण, विदेशी व्यापार, उद्योगों के विकास, कर निर्धारण आदि वित्तीय मसलों पर सरकार कारपोरेट की सलाह से चलेगी।
वर्षों भीख माँगकर गुज़ारा करने और दूसरों की कृपा और चंदे के भरोसे राजनीति करने वाले नेताजी ख़ाली झोला उठाकर सत्ता के गलियारों में दाखिल हुए थे। उनके पास खोने के लिए झोले के अलावा कुछ न था और पाने के लिए था पूरा देश। दल और दोस्तों पर लुटाने के लिए देश की संपदा और संसाधन थे, तो कमाने के लिए आम जनता। देश को विकसित राष्ट्र बनाने के दूर के ढोल सुनाकर वर्तमान के कर्कश से किनारा करने में नेताजी सफलता पा चुके हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति पूजा की आदतन ग़ुलाम बहुसंख्यक जनता एक चमचे के दिवास्वप्न को साकार करने का उपकरण बन गयी। नेताजी की छवि राष्ट्रहित के मुद्दों से ऊपर प्रतिस्थापित कर दी गयी है, जिसका विरोध राष्ट्रद्रोह है। चमचे ने उपाधियों की लोकप्रियता में सफलता पा ली है। आप कौन–कौन–सी उपाधियों से इत्तेफ़ाक रखते हैं? यह आपका मसला है, लेकिन क़ीमत तो पूरे देश को चुकानी होगी।
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नेताजी-चमचाजी पुराण

आदित्य
प्राचीन भारतीय इतिहास में एम. फिल. की डिग्री रखने वाले आदित्य शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न एनजीओ के साथ विगत 15 वर्षों से जुड़े रहे हैं। स्वभाव से कलाप्रेमी हैं।
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