गिजुभाई बधेका, gijubhai badheka
याद बाक़ी - प्रमोद दीक्षित मलय की कलम से....

विद्यालयों को आनंदघर बनाने की ज़रूरत

              समाज एवं शिक्षकों के समक्ष विद्यालयों को ‘आनंदघर’ बनाने का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करने वाले ‘बाल देवो भव:’ आत्मीय भाव के अनन्य उपासक शिक्षाविद् गिरिजाशंकर भगवानजी बधेका, जो शिक्षा जगत् में ‘गिजुभाई बधेका’ उपनाम से जाने जाते हैं, का जन्मदिवस 15 नवम्बर शिक्षकों के लिए प्रेरणा का दिन होता है। उन्होंने पारम्परिक शिक्षा में व्याप्त जड़ता, उपदेशात्मक, तोता-रटंत एवं अध्यापक केंद्रित शिक्षण पद्धति से जूझकर लोकतांत्रिक, बालकेंद्रित एवं समझ आधारित आनंदमय शिक्षण पद्धति प्रचलित करते हुए विद्यालयों को आनंदघर के रूप में विकसित करने, रूपांतरित करने का न केवल विचार प्रस्तुत किया बल्कि पहल करते हुए उस विचार को साकार कर उदाहरण भी उपस्थित किया। पाठकों के मन में अब यह सवाल उभरना स्वाभाविक है कि ‘आनंदघर’ विद्यालय क्या है, किस विद्यालय को ‘आनंदघर’ का दर्जा दिया जाये।

आनंदघर विद्यालय के बारे में विचार रखने के पहले मुझे लगता है कि विद्यालयों एवं शिक्षकों को लेकर अभिभावकों एवं समुदाय में बनी छवि को पकड़ने की कोशिश की जाये।सामान्य तौर पर बच्चे उमंग, उल्लास एवं उत्साह से भरे रहते हैं। उनके अंदर रचनात्मक ऊर्जा का प्रवाह सतत गतिमान होता है। वे हमेशा कुछ न कुछ नया रचते-गुनते-बुनते रहते हैं। अपनी कल्पना को साकार रूप देने के लिए अवसर और जगह तलाशते रहते हैं और जहां भी उनको उचित मौक़े मिलते हैं, वे अपनी सर्जना आरम्भ करने लग जाते हैं। हमारे परिवारों एवं पड़ोस में कम उम्र के ऐसे बच्चे होते हैं, जो विद्यालय नहीं जा रहे होते हैं। वे घर-पड़ोस में ही पूरा दिन गुज़ारते हैं। गहराई से देखें कि वे बच्चे अपनी रचनात्मकता का प्रकटीकरण कैसे करते हैं। अनुभव से गुज़रे कुछ उदाहरण साझा करता हूं।

पड़ोस के एक घर में चार साल के एक बच्चे अक्षांश ने एक दिन मेज़ पर पड़ा पेन उठाया और पांचवीं में अध्ययनरत अपनी दीदी संस्कृति के विभिन्न विषयों की कॉपियां बस्ते से निकाल-निकाल चेक कर दीं (किसी को ऐसा करते हुए देखा होगा), ख़ाली पृष्ठों पर आड़ी-तिरछी, खड़ी-पड़ी रेखाओं से चित्र बना दिये, जिसे केवल वही समझ सकता था। बच्चे का यह चित्रांकन देख उसकी मम्मी गुस्सा हुईं और कहा कि कल ही स्कूल में नाम लिखवाती हूं तो सब कलाकारी निकल जाएगी। जबकि बच्चे ने एक चित्र को दिखाकर कहा कि यह मम्मी-पापा हैं, यह संस्कृति दीदी है, ये बिल्ली और कुत्ता हैं, हाथी है, घर, टीवी, कुर्सी-मेज़, फूल, आम, केला आदि बनाये हैं, जबकि बड़ों को सिवाय टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं के कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। पर वह ख़ुश था।

गिजुभाई बधेका, gijubhai badheka

एक अन्य उदाहरण, मेरे घर पर एक किरायेदार थे। उनकी चार साल की बेटी गुनगुन थी। एक दिन घर में एक पड़ोसन अपने तीन साल के बच्चे सिमोनी के साथ आयीं। वह पत्नी के साथ बातचीत में व्यस्त हो गयीं। इधर गुनगुन, सिमोनी को लेकर ऊपर अपने कमरे गयी और मम्मी की ड्रेसिंग टेबल से लिपिस्टिक निकालकर पूरे चेहरे पर ख़ूब लगाया। फिर काजल लगाया और अंत में सिंदूर पोत लिया। जब वह पड़ोसन चलने को हुईं तो सिमोनी की खोज हुई। देखा कि दोनों बच्चों का पूरा मुंह, हाथ-पैर लाल। सहसा लगा कि कहीं गम्भीर चोट लग गयी है और ढेर सारा ख़ून बह गया है। पड़ोसन चिल्लायीं कि क्या हुआ, कैसे हुआ। बच्चों ने मासूम-सा उत्तर दिया, “आंटी, हम मंकी-मंकी खेल रहे थे।” दोनों बच्चों की मम्मियों का एक साथ स्वर गूंजा, “स्कूल में नाम लिखा देते हैं तो सब शैतानी निकल जाएगी।”

एक अंतिम उदाहरण और, एक गांव में जहां मैं पदस्थ हूं। एक दिन दो व्यक्ति अपने 5-6 साल के दो बच्चों को लेकर आये और बोले कि ये दिन भर आवारागर्दी, शैतानी और मटरगश्ती करते हैं। मेरे पूछने पर वह बोले कि दिन भर पड़ोस के घर-खेतों में घूमना, अमरूद के पेड़ों पर चढ़ना-झूलना, चिड़ियों के पंख बीनना, बस यही काम हैं इनके। स्कूल इसीलिए लाये हैं कि सुधर जाएं। बच्चे रुआंसे थे, मेरी किसी भी बात का उत्तर नहीं दे रहे थे। एक दिन जब मैं उन बच्चों और अभिभावकों से मिलने जा रहा था तो उनमें से एक के पिता की आवाज़ कानों से टकरायी कि स्कूल में जब दिन भर बंद रहोगे, तभी आदमी बनोगे।

इन तीन उदाहारणों में घटनाएं अलग हैं, पर उनसे निकला संदर्भ एक है कि स्कूल एक बाड़ा है, क़ैद है, जहां बच्चे 6-7 घंटे के लिए बंद हैं, जहां उन्हें अपने मन की करने की आज़ादी नहीं है और जहां कोई अन्य व्यक्ति अर्थात् शिक्षक उनको निर्देशित-नियंत्रित करेगा। कहना नहीं होगा कि समाज द्वारा स्कूल की छवि एक क़ैदख़ाने या सर्कस की और शिक्षक की जेलर या रिंग मास्टर के रूप में गढ़ दी गयी है। इसीलिए जब अभिभावक बच्चों का दाख़िला कराने स्कूल लाते हैं तो वे रोते हैं, स्कूल नहीं आना चाहते हैं। यह दृश्य शहरी एवं ग्रामीण स्कूलों में सभी जगह समान रूप से दिखायी देता है। कारण की पड़ताल करें तो यह स्पष्ट होता है कि बच्चों के मन में परिवार एवं समाज द्वारा स्कूलों के प्रति एक नकारात्मक छवि निर्मित कर दी गयी है, जहां तमाम बंधन हैं, ग़ुलामी है, किसी का निर्देश एवं नियंत्रण है। जबकि होना यह चाहिए था कि बच्चों के स्कूल जाने के पूर्व की स्वस्थ सकारात्मक तैयारी होती। स्कूल को लेकर यह बताया जाता कि वहां तुम्हें अपने मन का काम करने और अपने जैसे तमाम बच्चों के साथ खेलने-कूदने, रचने-बुनने के असीम और स्वतंत्र अवसर मिलेंगे जैसे कि घर और पड़ोस में। नानी के घर जैसी ख़ुशी मिलेगी। गीत, कहानी, खेल और नाटक होंगे। जहां नित नये अनुभवों से गुज़रकर सहज सीखना सम्भव हो सकेगा। पर ऐसा हुआ नहीं। रही सही कसर विद्यालयों की नीरसता, जड़ता और शिक्षकों के निष्ठुर व्यवहार ने पूरी कर दी। फलत: बच्चों को विद्यालय अपनी सपनीली जगह नहीं लगी, वे उसे क़ैद समझने लगे। इसीलिए विद्यालय आते समय बच्चों में उत्साह नहीं दिखता लेकिन छुट्टी के समय बच्चों के चेहरों पर तैरती ख़ुशी, हृदय में उत्ताल उमंग देखी जा सकती है मानो वे मुक्ति का उत्सव मनाने की राह पर निकले हों। लेकिन विद्यालय ‘आनंदघर’ बन गये होते तो विद्यालय आने की ललक, सीखने की ख़ुशी, अधिक ठहरने का उल्लास विद्यालय परिसर में सिंधु ज्वार-सा उमड़ता दृष्टिगोचर होता।

लेकिन परिदृश्य केवल नैराश्य से भरा नहीं अपितु आशा का संचार करने वाले उदाहरणों से सुस्मित-सुवासित भी है। बहुत-से शिक्षक-शिक्षकाएं और शिक्षक समूह इस दिशा में सार्थक प्रयत्न कर रहे हैं।‌ डॉ. दामोदर जैन (भोपाल) के नेतृत्व में शिक्षक संदर्भ समूह मध्यप्रदेश में तथा दुर्गेश्वर राय (गोरखपुर, उ.प्र.) के संयोजन में ‘शैक्षिक संवाद मंच’ विद्यालयों को आनंदघर के रूप में रूपांतरण हेतु अभियान चला रहे हैं। इसके पहले कि लेख समाप्त करूं, आनंदघर विद्यालय को समझते हैं। मुझे लगता है कि जिन विद्यालयों में उमंग, उत्साह एवं सर्जना का ऐसा रचनात्मक वातावरण तैयार हो, जहां अभिव्यक्ति के अनुकूल और बेहतर अवसर प्राप्त कर बिना डर, भय एवं तनाव के लोकतांत्रिक परिवेश में बच्चों का सीखना निर्बाध संभव हो सके। जहां दण्ड-पुरस्कार भाव से परे बचपन खिले-महके। जहां बच्चों की इच्छा-आकांक्षा और कोमल कल्पनाओं को सुनहरे पंख मिल सकें। जहां उन्हें प्यार-दुलार, सम्मान और मानवोचित गरिमापूर्ण व्यवहार मिले। छात्र-शिक्षक संबंध बाल मैत्रीपूर्ण हों और विद्यालय वह रचनास्थल बने, जहां बच्चे परस्पर मिलकर ज्ञान का निर्माण कर सकें। बच्चों की हर नवल सर्जना की स्वीकृति हो, स्थान एवं महत्व हो। शिक्षक पाठ नहीं बच्चों को पढ़ें-पढ़ाएं। शिक्षक आनंदित मन हों जो बच्चों को स्वयं कल्पना करने, सोचने, खोज-बीन करने एवं संवाद के अवसर उपलब्ध कराएं। जहां उनकी अपनी भाषा-बोली और समझ को महत्व मिले और उनके निर्णयों को भी महत्व दिया जाये। घंटी हो नहीं और यदि हो तो बच्चों के लिए विद्यालय की घंटी में शोर नहीं बल्कि संगीत के मधुर स्वर गूंजें, ऐसे विद्यालय को आनंदघर विद्यालय कहा जाएगा।

आज विद्यालयों को आनंदघर बनाने की ज़रूरत है। सरकार, समाज और शिक्षक संगठनों को मिलकर इसे साकार करने का संकल्प लेना होगा। विद्यालयों को आनंदघर बनाने की यह यात्रा ऐसे ही गतिमान रहेगी। नये समर्पित साथी जुड़कर इस प्रवाह को समृद्ध करेंगे। हमारे विद्यालय आनंदघर बनकर बच्चों का स्नेह सिंचन करें, गिजुभाई को श्रद्धांजलिस्वरूप यही कामना है।

प्रमोद दीक्षित मलय

प्रमोद दीक्षित मलय

प्रमोद दीक्षित मलय की दो किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं जबकि वह क़रीब एक दर्जन पुस्तकों का संपादन कर चुके हैं। इनमें प्रमुख रूप से अनुभूति के स्वर, पहला दिन, महकते गीत, हाशिए पर धूप, कोरोना काल में कविता, विद्यालय में एक दिन, यात्री हुए हम आदि शामिल हैं। कविता, गीत, कहानी, लेख, संस्मरण, समीक्षा और यात्रावृत्त लिखते रहे मलय ने रचनाधर्मी शिक्षकों के स्वैच्छिक मैत्री समूह 'शैक्षिक संवाद मंच' स्थापना भी 2012 में की।

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