pakistan ki kahaniyaan, masroo aurat
पाक्षिक ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....

क्या कहती हैं पाकिस्तान की इन लेखकों की कहानियां?

          ‘मसरूफ़ औरत’ दो वर्ष पहले रेख़्ता पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित और तस्नीम हैदर द्वारा संपादित पुस्तक है, जिसमें उर्दू की दस महिला कहानीकारों की कहानियाँ संकलित हैं।तसनीफ़ हैदर स्वयं भी जाने-माने लेखक और शायर हैं। रेख़्ता फाउंडेशन लंबे समय से उर्दू भाषा और साहित्य की सभी विधाओं पर केंद्रित हर साल बड़े कार्यक्रमों का आयोजन करता आ रहा है। जन साधारण के बीच उर्दू भाषा और साहित्य को लोकप्रिय और जीवंत बनाये रखने का यह सिलसिला सराहनीय है।

तसनीफ़ हैदर भूमिका में केवल उर्दू फ़िक्शन पर बात करते हैं और कहते हैं कि उर्दू फ़िक्शन में मंटो, इस्मत, कृष्ण चंदर के अलावा ढेर सारे नाम हैं, जिनसे पाठक परिचित नहीं हैं। दरअसल डाॅ. रशीद जहाँ, मंटो (इन्हें हम मूलतः हिंदुस्तानी ही मानते हैं), इस्मत, कृष्ण चंदर, काज़ी अब्दुल सत्तार, सलमा सिद्दीक़ी, रज़िया सज्जाद ज़हीर आदि का साहित्य हिन्दी में उपलब्ध है और इनका पाठक वर्ग भी है। अनुवाद भाषाओं के बीच पुल का काम करता है। क़ुर्रतुल ऐन हैदर की लगभग सभी प्रमुख कृतियाँ हिन्दी में उपलब्ध हैं। लोकप्रिय लेखिका जीलानी बानो को भी हम लोग पढ़ते आये हैं। हिन्दी के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार-लेखक डाॅ.राही मासूम रज़ा, जिन्हें उर्दू शायर के रूप में भी उतनी ही मक़बूलियत हासिल है, उनका कथन याद आता है। उन्होंने कहा था, अगर उर्दू को जीवित रखना है तो उसे देवनागरी लिपि में लिखना होगा और कि भाषा केवल लिपि नहीं होती। उर्दू के शीर्ष शायर और लेखक हिन्दी में भी उतने ही लोकप्रिय हैं। हिंदुस्तान में जन्मी पाकिस्तान की प्रतिष्ठित लेखिका ख़दीजा मस्तूर का विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखा उपन्यास ‘आँगन’ हिन्दी में भी चर्चित रहा।

प्रस्तुत संग्रह में पाकिस्तान की दस महिला कथाकारों की स्त्री केंद्रित कहानियाँ हैं, जो अपने समाज के रंग-रूप, परिस्थितियों के साथ स्त्री जीवन के सुख-दुख और जद्दोजहद को प्रस्तुत करती हैं। इन कहानियों में समाज के सबसे निचले तबक़े से लेकर मध्यवर्गीय तथा आधुनिक स्त्री के जीवन की तस्वीरें हैं।

औरत की ज़िन्दगी आज भी हमारे सरोकारों और चिन्ता का विषय बनती है। धार्मिक-सामाजिक बेड़ियों में जकड़ी औरतों के बंधन मुक्त होने और सामाजिक न्याय पाने की लड़ाई आज भी किसी न किसी रूप में मौजूद है। बंद मुस्लिम समाज के भीतर इन चिन्ताओं को सामने लाने का सिलसिला रुक़य्या सखावत हुसैन, डाॅ. रशीद जहाँ से शुरू होकर इस्मत चुग़ताई, क़ुर्रतुल ऐन हैदर और आज बुकर पुरस्कार से सम्मानित बानू मुश्ताक की रचनाओं में मिलता है। तसनीफ़ हैदर पाकिस्तान की दस महिला कथाकारों का हिन्दी पाठकों से इस संग्रह के द्वारा परिचय कराते हैं।

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बहुप्रशंसित लेखिका ख़दीजा मस्तूर की ‘सुरैया’ एक किशोरी की कहानी है, जिसका परिवार पड़ोसी मुल्क के साथ युद्ध होने पर सब कुछ गँवा चुका है और भागकर लाहौर आ गया है और साफ़-सफ़ाई का काम कर पेट भरने को मजबूर है। सुरैया आज भी किसी के आगे हाथ नहीं फैला सकती और वो अतीत में ही जीती है। प्रतिष्ठित लेखिका हाजरा मसरूर भी ख़दीजा मस्तूर की तरह भारत में ही पली-बढ़ीं और विभाजन के बाद पाकिस्तान चली गयीं। ‘कमीनी’ कहानी में एक दबे-कुचले वर्ग की अनाथ लड़की छुटकी है। एक सम्मानजनक जीवन जीने की उसकी आकांक्षा और जद्दोजहद मध्यवर्गीय समाज के स्वार्थों के बीच सफल नहीं होती और अंततः वह फिर सड़क पर फेंक दी जाती है। सईदा गज़दर की ‘अज़ानों के देश में’ कहानी भी सामाजिक अन्याय और प्रताड़ना की शिकार निम्नवर्गीय स्त्री की गाथा है। सईदा गज़दर शायरी और अदब के साथ सोशल एक्टिविस्ट भी रही हैं। उन्होंने पाखंड और धार्मिकता की आड़ में समाज के अमानवीय चेहरे को अक्सर अपने लेखन का विषय बनाया है। तसनीफ़ हैदर भूमिका में सईदा गज़दर का बयान उद्धृत करते हैं, जिसमें वो बताती हैं कि नाज़िमाबाद की एक काॅलोनी में कूड़े के ढेर पर एक नवजात बच्ची मिली।क़रीबी मस्जिद के इमाम को पता चला तो उन्होंने कहा कि बच्ची के माँ-बाप ने हराम काम किया है इसलिए इस नाजायज़ बच्ची को संगसार कर देना चाहिए और मुहल्ले के लड़कों ने इस पर अमल भी कर दिया और नवजात बच्ची मारी गयी। जिन दो औरतों ने मामले की पुलिस में रिपोर्ट की, उन्हें पुलिस ने थाने में बिठाये रखा और बहुत मुश्किल से छोड़ा। ये समाज का स्त्रियों के प्रति संवेदनहीन चेहरा है, जो भौगोलिक सीमाओं से परे यहाँ-वहाँ, सभी जगह मिलता है।

अन्य कहानियों में ‘जब फूफी खोई गईं’ (रज़िया फ़सीह अहमद), मध्यवर्गीय जीवन पर आधारित ‘मसरूफ़ औरत’ (ख़ालिदा हुसैन) और ‘बीस मिनट की जन्नत’ (रशीदा रिज़विया) और श्रमजीवी समाज की दो औरतों के बीच संबंधों की कहानी ‘दर्द का मिलाप’ (शकीला रफ़ीक) हैं। नीलोफ़र इक़बाल की ‘आंटी’ एक अकेली प्रौढ़ होती आधुनिक रख-रखाव वाली स्त्री की दास्तान है, जो रिश्तों में असम्मानजनक समझौते करने को मजबूर है। ‘माँ’ (ज़किया मशहदी) स्त्री-पुरुष संबंधों को नये नज़रिये से देखने वाली बेहतरीन कहानी है। एक ख़ास मनःस्थिति पर आधारित छोटी-सी कहानी ‘ख़ारिश’ (अज़रा अब्बास) भी है। कुल मिलाकर विभिन्न शेड्स और सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित पाकिस्तानी महिला कहानीकारों का संग्रह स्त्री समाज के विविध चित्र प्रस्तुत करता है।

नमिता सिंह

नमिता सिंह

लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।

1 comment on “क्या कहती हैं पाकिस्तान की इन लेखकों की कहानियां?

  1. औरत किस तरह सामाजिक रुढियों के दायरे में बंधी है यह सच्चाई जितनी शिद्दत
    से समकालीन उर्दू कहानी में दर्ज है हिन्दी कहानी में भी उतनी ही गहराई से दर्ज है। नमिता जी ने इस किताब के माध्यम से समकालीन उर्दू जगत की महिला कथाजकी सोच और संवेदना इस किताब को पढ़ें की ललक पैदा की है। हरियश राय

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