
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
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150 सालों में भारत की आत्मा में रच-बस गये राष्ट्रगीत की धुनें बनने, उसे गाये जाने के इतिहास पर कोई एक जिल्द हाथ नहीं लगती, फिर भी अनेक स्रोतों से जुटाये गये ब्यौरे कहीं रोचक हैं, कहीं चौंकाते हैं और यों एक समृद्ध परंपरा की मिसाल प्रस्तुत करते हैं। आब-ओ-हवा की प्रस्तुति...
वन्दे मातरम: सुरों के सफ़र की महान दास्तान
महान गीत रचना वंदे मातरम के 150 साल के मौक़े पर यह जानना रोचक है कि इसे सबसे पहली बार गाये जाने के 140 साल पूरे हो रहे हैं। 1886 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के द्वितीय वर्ष में ही कोलकाता अधिवेशन के मंच से कविवर हेमचन्द्र द्वारा वन्दे मातरम के कुछ अंश मंच से गाये गये थे। ‘वन्दे मातरम्’ गीत 1896 में पहली बार कलकत्ता कांग्रेस में कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सार्वजनिक रूप से गाया। इसकी स्वर रचना उनकी अपनी थी।
सन् 1901 में कलकत्ता में हुए एक अन्य अधिवेशन में श्री चरणदास ने यह गीत पुनः गाया। 1901 के बाद से कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में वन्दे मातरम् गया जाने लगा। सन् 1905 के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरला देवी चौधरानी ने स्वर दिया। 6 अगस्त 1905 को बंग भंग के विरोध में टाउन हॉल की सभा में करीब 30 हज़ार भारतीयों ने इस गीत को एक साथ गाया। यहाँ तक कि बंग भंग के बाद ‘वन्दे मातरम संप्रदाय’ की स्थापना भी हो गयी थी।
राजनीतिक नारे के तौर पर वंदे मातरम का सबसे पहले इस्तेमाल 7 अगस्त 1905 को हुआ था, जब सभी समुदाय के हजारों छात्रों ने कलकता (कोलकाता) में टाउन हॉल की तरफ जुलूस निकालते हुए वंदे मातरम और दूसरे नारों से आसमान गुंजा दिया था। नवंबर 1905 में, बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के 200 छात्रों में से हर एक पर 5-5 रुपये का जुर्माना लगाया गया, क्योंकि वे वंदे मातरम गाने के दोषी थे। इसके बाद के सालों में वंदे मातरम के नारे और गायन को ब्रिटिश हुकूमत द्रोह मानने लगी और कई तरह के प्रतिबंध लगने लगे। प्रतिबंधों के कारण यह प्रतिरोध और अधिकार का स्वर बनता चला गया। अनेक प्रसंगों में एक महत्वपूर्ण यह है कि जून 1908 में लोकमान्य तिलक के मुक़दमे की सुनवाई के दौरान हज़ारों लोग बॉम्बे पुलिस कोर्ट के बाहर जमा हुए और वंदे मातरम का गान करते हुए एकजुटता दर्शायी।
1904-05 में देश का भारत का पहला व्यावसायिक रिकॉर्ड इसी गीत का तैयार हुआ था। हालांकि कहा जाता है कि इस गीत की पहली धुन जादूनाथ भट्टाचार्य ने बनायी थी, लेकिन इसे प्रमाणित करने के लिए पुख़्ता साक्ष्य नहीं मिलते। बाद में, 20वीं सदी के शुरूआती वर्षों में गुरुदेव रबींद्रनाथ की भतीजी प्रतिभासुंदरी द्वारा इस गीत की एक धुन बनाये जाने का उल्लेख भी मिलता है। शास्त्रीय गायक विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने 1923 के कांग्रेस अधिवेशन के लिए इसकी एक तर्ज़ बनायी। दूसरी ओर, भारत को आज़ादी मिलने तक (उसके बाद भी) कितने मौक़ों पर यह जनगीत की तरह गाया गया, इसका पूरा रिकॉर्ड मिलना नामुमकिन है। 15 अगस्त, 1947 को जब भारत स्वतन्त्र हुआ, तब प्रसिद्ध गायक पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने आकाशवाणी से ‘वंदे मातरम्’ गाया था। आकाशवाणी के लिए वंदे मातरम की जो धुन तैयार की गयी उसका संगीत संयोजन प्रख्यात संगीतज्ञ रविशंकर ने किया था।
इधर, पं० विष्णु दिगंबर द्वारा काफी राग में निबद्ध रचना को बहुत प्रसिद्धि मिली। काफी के अलावा अन्य कई रागों में यह गीत गाया गया है। झिंझोटी राग में नये ढंग से इसे बैठाकर प्रस्तुति की थी मास्टर कृष्ण राव फुलंबीकर ने।
पं० जवाहर लाल नेहरू के यह कहने पर कि ‘वन्दे मातरम्’ बैंड पर नही बज सकता, मा. कृष्ण राव ने शास्त्रीय ढंग से इस आशंका को जब निर्मूल सिद्ध कर दिया तो वन्दे मातरम् को ‘जन-मन मन’ के समकक्ष राष्ट्रगान का सम्मान मिला और मास्टर कृष्णराव तो “वन्दे मातरम् कृष्णराव” ही पुकारे जाने लगे।
अक्षयचन्द्र सरकार ने बंकिम बाबू संबंधी लेख में बताया है कि आनन्दमठ की रचना के समय क्षेत्रनाथ मुखोपाध्याय उनके सहयोगी डिप्टी कलेक्टर थे और दोनों ही आस-पास रहते थे। वे शाम को बंकिम बाबू के घर आते थे। क्षेत्रबाबू स्वरज्ञ भी थे। उन्होंने हारमोनियम पर गाकर इसे “मल्हार राग” मे बैठाया था। आनन्दमठ में गीत मल्हार राग में गाने का उल्लेख है।
काफी राग में सार्वजनिक गायन प्रथम बार पं० विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जौ ने लाहौर कांग्रेस में किया था। आजकल आकाशवाणी से प्रसारित होने वाली रचना ‘सारंग’ राग में है। कृष्णराव ‘वन्दे मातरम्’ को केवल राग में बैठाने का प्रयास नहीं कर रहे थे। एक संगीतज्ञ, स्वरशास्त्रज्ञ के नाते वे ‘वन्दे मातरम्’ को सबके गाने योग्य बनाना चाहते थे। उनकी चेष्टा थी कि आम आदमी भी इसे आसानी से गा सके। इस हेतु उन्होंने कठिन परिश्रम किया और गीत की एक रचना तैयार की। विशिष्ट स्वरों में इस ढंग से यह गीत कोई भी गा सकता है, यह उन्होंने सिद्ध कर दिया।
इसका पहला ध्वनि मुद्रण प्रभात फ़िल्म कंपनी में सन् 1938 में व्ही. शांताराम ने किया। कृष्णराव उस समय प्रभात में संगीत दिग्दर्शक थे। बैंड पर बैठाने का उद्योग भी कृष्णराव ने बड़े यशस्वी ढंग से किया। उनका प्रयास था कि इस वादन पर पुलिस बराबर मार्च कर सके।
इसी समय दिल्ली मे राष्ट्रीय गीत के बाबत चर्चा चल रही थी। कृष्णराव ने नेहरू जी को तार दिया। ‘राष्ट्रीय गीत की बाबत एक संगीतज्ञ की दृष्टि से किये विचार भी सुने जाएं’, पं. नेहरू की अनुमति मिलने पर दिल्ली जाकर उन्होंने अपनी रचना और बैंड पर निकाला वादन प्रत्यक्ष किया। साथ ही एक रिकॉर्डिंग कंपनी द्वारा तैयार की गयी ध्वनिमुद्रिका भी ले गये थे। दिल्ली में बाबू राजेन्द्र प्रसाद, महावीर त्यागी, पं. नेहरू, वल्लभ माई पटेल, दादा साहब मावलकर, सत्यनारायण सिह आदि कांग्रेस के बड़े नेताओं ने इसे सुना और सराहा। एक बंगाली नेता ने तो कहा कि मा. कृष्ण राव की धुन बंगला धुन से भी ज़्यादा अच्छी है।
इसके बाद तत्कालीन सेनापति जनरल करियप्पा ने इनके सहयोग से सैनिक बैंड पर इसे बैठाने का उपक्रम किया। इस हेतु गणपत सिंह बैंड मास्टर ने बताया कि ‘बैंड में बहुत अच्छी तरह से बैठता है’। दिल्ली से लौटने पर बंबई के पुलिस कमिश्नर भरुचा ने इनसे सहयोग किया और बैंड इंस्ट्रक्टर व कंडक्टर सी.आर. गार्डनर ने आठ दिन परिश्रम करके गीत को बैंड मे बैठा दिया। इसी समय गार्डनर इंग्लैड में बजाने गये। दोनों ही स्थानों पर बैंड पर अच्छा बैठा है, इस प्रकार की संस्तुति प्राप्त हुई। स्वयं गार्डनर जैसे इंग्लैंड के प्रसिद्ध संगीत दिग्दर्शक ने माना कि ‘वन्दे मातरम्’ गीत में बहुत गहराई (डेप्थ) है।
मा० कृष्ण राव ने 1949 में पुनः दिल्ली जाकर संसद भवन में संविधान सभा के समक्ष अपनी तर्ज़ और बैंड वादन की अनुमति प्राप्त की। एक मिनिट पांच सेकेंड मे उत्तम ढंग से बैंड पर ‘वन्दे मातरम्’ बजाया जा सकता है, यह मास्टर कृष्ण राव ने सिद्ध कर दिया, प्रत्यक्ष गाकर भी दिखाया। ‘मास्टर जी आपने अच्छा काम किया’, पंडित नेहरू ने शाबाशी दी। संविधान सभा के मान्य सदस्यों ने करतल ध्वनि कर मा. कृष्णराव को गौरव प्रदान किया।
सुप्रसिद्ध गायक दिलीप कुमार राय ने भी वन्दे मातरम् गीत की एक तर्ज़ बनायी। इस बाबत उन्होंने अपनी पुस्तक ‘अमंग द ग्रेट’ में जानकारी दी है। उन्होंने समूह गायन के लिए एक सरल तर्ज़ तैयार की थी। गांधी जी की पूर्व अनुमति प्राप्त करके 21 अक्टूबर 1947 को दिल्ली में गांधीजी की प्रार्थना सभा मे उन्होंने अपनी तर्ज़ का गायन प्रस्तुत किया। इससे पूर्व सवेरे गांधी जी की राय प्राप्त करने हेतु उन्होंने यह गीत बिरला हाउस में भी गाया था।
तब प्रार्थना सभा में गांधीजी ने श्री राय की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, आज सबेरे श्री राय ने मेरे समक्ष प्रसिद्ध राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ और ‘हिन्दोस्तां हमारा’ अपनी स्वयं तैयार की हुई तर्ज़ में गाकर सुनाया। वे हमें अच्छे लगे पर इनमें पहले गीत (वन्दे मातरम्) की धुन बहुत अच्छी बनी है।’
पंडित नेहरू ने कहा- “वन्देमातरम् निःसंदेह भारत का प्रधान राष्ट्रगीत है, उसकी भव्य ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है, हमारी स्वतन्त्रता से वह सम्बद्ध है। उसका स्थान अप्रतिम है। दूसरा कोई भी गीत उसका स्थान नहीं ले सकता।”
अन्त में 24 जनवरी 1950 को रात 11 बजे संविधान सभा की बैठक में अध्यक्ष बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने उठकर घोषणा की “जन-गण-मन’ शब्दों पर तैयार गीत व संगीत भारत का राष्ट्रगीत है। इस गीत के शब्दों में आवश्यकता पड़ने पर परिवर्तन करने का सरकार को अधिकार होगा। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले ‘वन्दे मातरम्’ को ‘जन-गण-मन’ के बराबर सम्मान दिया जायगा और इसकी उतनी ही प्रतिष्ठा की जाएगी। मेरा अनुमान है कि इससे सभासदों को सन्तोष होगा।” (डिबेट्स आफ़ द कांस्टिटुएंट असेंबली खंड 12)
1952 में बंकिमचंद्र के उपन्यास ‘आनंद मठ’ पर आधारित फ़िल्म इसी नाम से बनी तो वंदे मातरम गीत के बग़ैर कैसे बनती। संगीतकार एवं गायक हेमंत कुमार ने इस गीत के लिए एक धुन बनायी और लता मंगेशकर ने स्वर दिया। इसके बाद से यह धुन भी ख़ासी लोकप्रिय हुई। बाद में भी कुछ फ़िल्मों में इस गीत के सांगीतिक स्वरूप के संदर्भ मिलते हैं।
इधर, देश के प्रतिष्ठित संगीतज्ञ/गायक पं. भीमसेन जोशी, एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी, पं. जसराज आदि शास्त्रीय राग-रागिनियों में इस गीत को स्वर देते रहे। फिर एक बड़ी घटना 1997 में हुई, जब ए.आर. रहमान ने वंदे मातरम को संगीत एवं स्वरबद्ध किया। हालांकि इसमें एक अलग शब्द रचना के बीच में केवल ‘वंदे मातरम’ शब्द का ही इस्तेमाल हुआ, लेकिन यह लोकप्रिय रहा। 2020 में रिकी केज के आधुनिक आर्केस्ट्रा की प्रस्तुति भी इस गीत के सांगीतिक इतिहास में जुड़ जाती है।
चूंकि यह भारत की आत्मा का गीत और स्वर रहा है इसलिए इस पूरे ब्यौरे के अलावा अनेक बिंदु और नोट्स संभव है कि दर्ज न हो पाएं। यह भी मुमकिन है कि एक पूरी किताब भी शायद इस गीत के सांगीतिक इतिहास को समग्रता से दर्ज करने का दावा न कर सके।
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सराहनीय वंदनीय सामग्री वंदे मातरम् के पूर्ण इतिहास पर