
- December 15, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
कुरान के बाद सबसे ज़्यादा छपने वाली किताब
किताब “मुसद्दस हाली” पहली बार 1879 में पब्लिश हुई थी। इसमें 295 बंद थे। दूसरी बार 1886 में 162 बंद और जोड़कर पब्लिश हुई। इस तरह, इसमें कुल 457 बंद हैं और अशआर की संख्या 1371 है। इसका फॉर्मेट उर्दू शायरी का एक काव्य-रूप “मुसद्दस” है।
अगर अल्ताफ़ हुसैन हाली ने कुछ और नहीं भी लिखा होता, तो भी “मुसद्दस हाली” उनका नाम अमर रखने के लिए काफ़ी होती। यह उनका सबसे बड़ा कारनामा है। यह उर्दू दुनिया में अमर रहने वाली कविता है। यह इतनी पॉपुलर हुई कि इसने पॉपुलैरिटी के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये। यहाँ तक कहा जाता है पवित्र कुरान के बाद सबकॉन्टिनेंट में सबसे ज़्यादा पब्लिश होने वाली किताब “मुसद्दस हाली” है।
हाली ख़ुद ऐसा कहते हैं, “क़ौम के लिए अपने बे-हुनर हाथों से एक आईना बनाया है, जिसमें आकर वे ख़ुद को और अपनी असली पहचान को देख सकें कि हम कौन थे और क्या हो गये”।
दरअसल उन्होंने यह किताब सर सैयद के कहने पर लिखी थी, इसलिए सर सैयद कहते हैं-
“मुझसे इसको ज़रूर प्रेरणा मिली है और मैं इसे अपने अच्छे कामों में से एक मानता हूँ कि जब ख़ुदा पूछेगा कि मैं दुनिया से क्या लाया हूँ, तो मैं कहूँगा कि मैं हाली से “मुसद्दस हाली” लिखवा के लाया हूँ और कुछ नहीं।“
“हाली की मुसद्दस उर्दू की ऑब्जेक्टिव पोएट्री में एक मील का पत्थर है। इस लंबी कविता में, हाली ने एक नाड़ी विशेषज्ञ की तरह क़ौम की दुखती रग को पकड़ा है और उसे असरदार तरीक़े से कविता का रूप दिया है।” -अनवर सदीद
“यह कविता एक दुखते दिल की पुकार है। यह एक सच्चे मुसलमान के दिल की गहराइयों से निकली आवाज़ है। यह एक सच्चे इंसान की आँखों से निकला आँसू है। यह एक रिफॉर्मर का मैसेज है। यह एक लीडर का नारा है।” -डॉ. इबादत बरेलवी
इस किताब का पूरा नाम “मुसद्दस मद्द-ओ-जज़्र-ए-इस्लाम” है। अर्थात “इस्लाम का ज्वार भाटा/उतार-चढ़ाव”। इस्लाम के उत्थान और पतन के विषय पर यह एक लंबी कविता है, जिसे कवि, आलोचक और विचारक मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली ने लिखा है। इसमें मुस्लिम समुदाय की जागृति, इस्लामी शिक्षाओं का महत्व और आज के समाज में गिरावट को दिखाया गया है। वास्तव में, यह हाली की अपनी विचारधारा प्रकट करने की एक सोची-समझी कोशिश है। उनका मानना था कि कविता में यथार्थवाद का रंग होना चाहिए। इस शायरी को यथार्थवाद की नींव कहा जा सकता है।
मुसद्दस उर्दू शायरी की एक शैली है, जिसमें छह लाइनें होती हैं। यह एक अरबी शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ छह है। हर बंद के पहले चार मिसरे हम-क़फ़िया होते हैं। पांचवीं और छठी लाइनों में अलग क़ाफ़िये होते हैं। मिसाल के तौर पर इस शैली में “अनीस” और “दबीर” के मर्सिये (शोकगीत) और अल्लामा “इक़बाल” की ‘शिकवा’ और ‘जवाब-ए-शिकवा’ आदि लिखी गयी हैं।
इस नज़्म में “हाली” ने इस्लामी इतिहास के सुनहरे दौर, मुसलमानों के उत्थान और फिर पतन के कारणों, जैसे धर्म से दूरी, नैतिक पतन, ग़ैर-ज़रूरी रीति-रिवाज वग़ैरह का ज़िक्र किया है और इनसे बचने के उपाय बताया है और समाज में सुधार का रास्ता दिखाया है ताकि राष्ट्रीय चेतना जागे। इस कविता की भाषा सरल और असलियत पर आधारित है। यह सुधारवादी कविता का एक बेहतरीन उदाहरण है। पारंपरिक प्रेम कविता या शब्दों की बकवास से बाहर निकलकर कविता को निष्पक्षता से जोड़ने की शुरूआती कोशिश है। यह उर्दू भाषा की पहली कविता है, जिसने उर्दू कविता की दिशा बदल दी और राष्ट्रीय और देशभक्ति से भरी कविताओं की नींव रखी। यह मुसलमानों के पतन का शोकगीत भी है। भाषा में सरलता और सहजता है। लंबी-चौड़ी नसीहतों, उपमाओं और रूपकों से बचा गया है। इसमें इतनी निरंतरता है कि ऐसा लगता है कविता एक ही बैठक में लिखी गयी है। कहीं कोई असंगति नहीं है। यह राष्ट्रीय और सुधारवादी कविता की नींव है जिस पर “इक़बाल” ने अपनी कविता की ऊंची इमारत खड़ी की। प्रोफ़ेसर एहतेशाम हुसैन के अनुसार-
“ख़्वाजा अल्ताफ़ हुसैन का नाम उनकी क़ौमी शायरी की वजह से हमेशा ज़िंदा रहेगा। अगर हाली न होते, तो इक़बाल भी न होते।”
इस कविता के ज़रिये उन्होंने मुसलमानों को अतीत की महानता को पेश करके सोचने का अवसर दिया है। कविता का मक़सद, जैसा कि पहले बताया गया है, मुसलमानों को उनके अतीत की महानता और आज की हालत के बारे में बताकर उन्हें बेदार करना है ताकि उनमें जागरूकता और चेतना पैदा हो सके। इसमें इस्लाम की ऐतिहासिक घटनाओं का ज़िक्र है ताकि वे अतीत की महानता को महसूस कर सकें और उनमें आत्म-सम्मान और गर्व की भावना पैदा हो सके। अतीत की शान-ओ-शौकत, सम्मान और वैभव को समझ सकें। और आज जो मुसलमान ऐश-ओ-आराम में डूबकर लापरवा हो गये हैं, उनमें चेतना और कर्तव्य की भावना पैदा हो, गुमराह होने से बच सकें। लोग इस्लाम के उसूलों को समझ सकें और ख़ुद को समाज की बुराइयों और बेकार के रीति-रिवाजों से बचा सकें, ताकि सामान्य रूप से एक मुसलमान और विशेष रूप से एक इंसान होने का उनका स्तर ऊपर उठ सके। कई गाइडिंग उसूल दिये गये हैं, फ़िलॉसफ़ी पेश की गयी है और ग़ाफ़िल मुसलमानों को जगाने की कोशिश की गयी है।
अल्ताफ़ हुसैन हाली एक ऐसी शख़्सियत थे कि जिस भी क्षेत्र में उन्होंने क़दम रखा, चाहे वो ग़ज़ल हो, नज़्म हो, शोकगीत हो, क़सीदा हो या आलोचना, उन्होंने अपनी जगह बनायी और अमर छाप छोड़ी।
मुसद्दस हाली को पढ़कर कोई भी हाली के, इस्लाम के इतिहास पर गहरे अध्ययन को महसूस कर सकता है। उन्होंने हर काल की ऐतिहासिक घटनाओं को उदाहरण के तौर पर पेश किया है और ऐसी तस्वीर खींची है कि पूरा नक़्शा सामने खिंच जाता है। पश्चिमी देशों की गुप्त वीभत्स सच्चाई को भी इसमें पेश किया गया है और मुसलमानों को चेतावनी दी गयी है कि उनके चबाकर उगले हुए लुक़मों को चबाने से बचें.
अतीत का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि मुसलमानों ने दुनिया को व्यापार के सिद्धांतों से परिचित कराया। यात्रा और पर्यटन को बढ़ावा दिया। नये देशों की खोज की। दुनिया को गणित, दर्शन, चिकित्सा, रसायन विज्ञान, ज्यामिति, वास्तुकला, चित्रकला आदि विज्ञान और कलाओं से अवगत कराया लेकिन अब इस क़ौम के सामने जैसे गतिरोध आ गया है और उसके क़दम जम-से गये हैं। इस ठहराव को तोड़ने के लिए, उन्होंने यह कविता लिखी ताकि क़ौम अपनी लापरवाही और खरगोश के सपने से जाग जाये। हाली ने इसमें पैग़ंबर-ए-इस्लाम की ऐसी शायराना प्रशंसा की है, जिसे आज भी ख़ूब पढ़ा जाता है। यह बहुत मशहूर नातिया छंद देखिए।
वह नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला
मुरादें ग़रीबों की बर लाने वाला
मुसीबत में ग़ैरों के काम आने वाला
वह अपने परायों का ग़म खाने वाला
फ़क़ीरों का मलजा ज़ईफ़ों का मावा
यतीमों का वाली ग़ुलामों का मौला
(मलजा/मावा = आश्रय, वाली = मालिक)
नज़्म का रचनाकाल भारतीय आज़ादी के संघर्ष का काल है। इसका मक़सद भारतीय राष्ट्र और ख़ासकर मुसलमानों को आज़ादी के लिए जगाना और इस्लाम के गौरवशाली अतीत की याद को ताज़ा करना था।
मौलाना हाली : एक नज़र
हाली का जन्म 1 जनवरी, 1837 को पानीपत में हुआ था। जब वह 9 साल की उम्र में थे, तब उनके पिता ख़्वाजा इज़ो बख्श की मौत हो गयी, इसलिए पढ़ाई-लिखाई का सही इंतज़ाम नहीं हो सका। लेकिन उन्हें पढ़ने का बहुत शौक़ था। परिवार ने 17 साल की उम्र में उनकी शादी कर दी, लेकिन पढ़ने के शौक़ ने उन्हें मजबूर कर दिया और वे चुपके-से दिल्ली चले गये। यहाँ उन्होंने मौलवी नवाज़िश अली से ग्रामर, सिंटेक्स और लॉजिक की पढ़ाई की। उन्होंने ग़ालिब से फ़ारसी सीखी और ग़ज़लों पर ग़ालिब से इस्लाह ली।
उनकी रचनाओं में हयात सादी, मुक़दमा-ए-शेर-ओ-शायरी, यादगार-ए-ग़ालिब, हयात-ए- जावेद के अलावा धर्म, नैतिकता, बायोग्राफ़ी, भाषा, लॉजिक वग़ैरह पर किताबें भी बहुत मशहूर हैं। वे मॉडर्न कविता के पायनियर हैं और उर्दू कविता में ओरिजिनैलिटी, जोश और सादगी को फॉलो करते हैं। उन्हें उर्दू लिटरेचर में क्रिटिसिज़्म और मॉडर्न कविता/जदीद शायरी के फाउंडर्स में से एक माना जाता है। उन्हें 1904 में “शम्स-उल-उलेमा” का ख़िताब दिया गया था। मौलाना का इंतिक़ाल 31 दिसंबर 1914 को हुआ।

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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