धुरंधर, dhurandhar, ranveer singh, akshaye khanna, sanjay dutt, madhavan
बियॉण्ड द रिव्यू भवेश दिलशाद की कलम से....

धुरंधर: पॉलिटिकल फ़िल्म या साइकी में घुसपैठ

             अगर कोई फ़िल्म बाज़ार में चल पड़ती है, तब उसकी तारीफ़ या उसके विरोध में लिखने से अधिक मुश्किल होता है, एक नपी-तुली नज़र से, एक निष्पक्ष भाव से उसके बारे में कोई विचार कर पाना। ‘धुरंधर’ को जिस तरह बाज़ार मिल रहा है, हाल यही है कि कोई इसके एकदम पक्ष में है और कोई एकदम विपक्ष में।

सिनेमा से हम हासिल क्या कर पाते हैं? मूल प्रश्न यही है। मनोरंजन ऐसा उत्तर नहीं है जिसे आप किसी बनी-बनायी परिभाषा या दायरे में समझते हैं। कोई गाली, किसी का झूठ बोलना, चलते हुए किसी का गिर जाना… ये किसी के लिए मनोरंजन हो सकता है, लेकिन यह मनोरंजन को परिभाषित करने वाली मिसालें तो नहीं बन जाएंगी।

दरअसल एक आलोचक मन होता है, जो हर कामयाब चीज़ के पीछे कोई कला, कोई गुण या कोई दृष्टि खोजने को लालायित रहता है। यहां सवाल यही होना चाहिए कि आपने उसे कामयाब किस कसौटी पर माना। धुरंधर के संदर्भ में बाज़ार कसौटी है। बात जब मूल्यों, वैचारिकता, संवेदना या कलात्मकता की हो, बाज़ार ही पैमाना कैसे हो सकता है!

बाज़ार में ज़हर भी बिक रहा है और बड़े मुनाफ़े का उत्पाद है। चलिए बाज़ार से इतर धुरंधर को ज़रा देखते हैं। कुछ विद्वानों की समीक्षाएं कह रही हैं कि यह एक पॉलिटिकल फ़िल्म है। एक नैरैटिव को पोसती है। मुझे लगता है कि यह एक पॉलिटिकल पार्टी के पक्ष में खड़ी फ़िल्म भर है। पॉलिटिकल मैं उस फ़िल्म को कह सकता हूं जो वैचारिक स्तर पर समाज को किसी दिशा में आंदोलित करे। या फिर उसे, जो सत्ता पर निशाना साधती हो। धुरंधर बहती गंगा में हाथ धोने की कवायद भर है। एक लहर जो चल रही है, उससे अपना मुनाफ़ा और कथित आक़ाओं के दरबार में अपने नंबर बनाने की नीयत भर है।

समीक्षाएं और उनके मंतव्य

गांधी दि एंड आफ़ नॉनवायलेंस किताब के लेखक मानश फ़िराक ने अपनी समीक्षा में एक नुक़्ता दिया है। मानश कहते हैं सियासत और धर्म/संप्रदाय/मज़हब मिलकर जब समाज में प्रेम और सामूहिक गरिमा के ज़रिये नहीं बनते और सिर्फ़ खोखली मर्दानगी वाली हिंसा उकसाने की संस्थाएं बनकर रह जाते हैं, तब राष्ट्रीय चरित्र और अस्मिता के लिए एक नैतिक व राजनीतिक संकट खड़ा हो जाता है। धर्म का इस्तेमाल ऐसे संकट का लक्षण है।

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एक फ़िल्म जिसमें नकारात्मक किरदारों की भरमार है, दरअसल इसे सिनेमा द्वारा समाज का एक विद्रूप ही समझा जाना चाहिए। मानश यह भी कहते हैं कि धुरंधर में यथार्थवाद के आग्रह के रूप में निर्देशक का घमंड परदे पर बेलगाम दिखता है। यह मामूली इल्ज़ाम नहीं है। यह इशारा है कि एक नैरैटिव खड़ा करने का ठेका दिया जा रहा है और कलाकार ऐसे ठेकेदारों की भूमिका में हैं। फ़िल्मकार रामगोपाल वर्मा के शब्द देखिए:

  • “आदित्य धर दृश्यों को निर्देशित नहीं कर रहे, वे चरित्रों और दर्शकों की सोच-समझ को इंजीनियर कर रहे हैं। फ़िल्म आपसे ध्यान की मांग नहीं कर रही बल्कि आपके ध्यान को नियंत्रित कर रही है… इस​ फ़िल्म में विनम्रता के लिए नकार है। लेखन ऐसा है जो इरादतन हमलावर है, दृश्यों के मंचन ख़तरनाक हैं और जो चुप्पियां हैं, वो भी तूफ़ानी साउंड इफ़ेक्ट्स की तरह हथियारबंद हैं…”

हालांकि रामू की समीक्षा कुल मिलाकर धुरंधर का क़सीदा नज़र आती है और इसे एक ऐतिहासिक फ़िल्म के तौर पर घोषित करती है। हालांकि मुझे रामू के शब्द चयन से एक अंतर्ध्वनि सुनायी देती है कि वह सिनेमा में उस आक्रामकता और उस बेहयाई के महिमामंडन की तरफ़ इशारा कर रहे हैं, जो सियासत और समाज में पसर रही है। इस समीक्षा में रामू ने भीषण शब्दावली का चयन किया है, जो सृजन या रचना के बजाय विध्वंस से पैदा होती महसूस होती है।

सृजन बनाम बाज़ार

एक होता है रचना। एक नवनिर्माण करना। कलाओं में हम इसे सामान्य रूप से रचनात्मकता शब्द के ज़रिये जानते, समझते हैं। इसके अर्थ ज़रा ग़ौर से देखना चाहिए। रचना यानी आपने कुछ नया पैदा किया। इसके लिए आप भले ही पहले से मौजूद कुछ तत्वों का सहारा लें, उनमें अपनी ऊर्जा मिलाकर कुछ नया उत्पन्न करें।

अब हम देखें तो कितनी कलाकृतियां हमें रचना मालूम होती हैं! चाहे वे कविता हो, शिल्प/चित्र हो या सिनेमा। सही अर्थों में कोई कलाकार कुछ रचता है, तो इसका अर्थ हमें यह दिखता है कि वह समाज से कुछ तत्व उठाता है और समाज को एक नया विचार, नयी संवेदना लौटाता है।

इसके उलट उपभोक्तावाद से प्रेरित कलाकार ‘रचने’ का पाखंड करता है और समाज से ही उठाये गये तत्वों को कुछ रंग रौग़न करके, कोई चमकीली पैकिंग करके बेच देता है। वह इतना चतुर है कि उसे पता होता है कि कौन सा माल मांग में है और अच्छे दामों पर बिक सकता है। वह समाज से ही उसे कभी चोरी, कभी लूट और कभी सस्ते दामों पर हासिल कर उससे मुनाफ़ा कमा रहा होता है।

मुनाफ़ा कमाना बनाम सच में कुछ रचना कलाजगत का एक लंबा विमर्श रहा है। शायद हमेशा रहे। कलाकार/कलाप्रेमी के सामने सवाल यह है कि वह कला को चुनता है या मुनाफ़े की नीयत को। और दर्शक/श्रोता/पाठक के सामने यह कि वह कला का उपभोक्ता होता है या पाखंड का। हम एक फ़िल्म से क्या चाहते हैं? एक बार फिर मानश के शब्द यहां ग़ौरतलब हैं:

  • “पॉपुलर सिनेमा क्या करता है, साइकी के जो दमित कोने हैं, उन्हें उभार देता है। जबकि एक ज़िम्मेदार फ़िल्मकार का रचनात्मक काम है कि वह भावनाओं को भड़काने वाले कोनों के बजाय साइकी के जेनुइन और ज़मीनी पहलुओं को छांटकर सामने लाये।”

कोई समीक्षा कहे कि धुरंधर तो अनुराग कश्यप की ब्लैक फ़्राइडे की नयी कॉपी है या यह असल में गैंग्स आफ़ पाकिस्तान है या पॉलिटिकल फ़िल्म है, तो ऐसे नज़रियों को सुनते/पढ़ते हुए भी एक स्पष्ट, संतुलित समझ पर ही भरोसा करने की ज़रूरत पेश आएगी।

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

2 comments on “धुरंधर: पॉलिटिकल फ़िल्म या साइकी में घुसपैठ

  1. अच्छा सही नाम दिया गैंग्स ऑफ पाकिस्तान।

    धुरंधर के माध्यम से फिल्म कला पर सार्थक चर्चा हुई है।

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