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डीकोडिंग पोएट्री ब्रज श्रीवास्तव की कलम से....

विनोद कुमार शुक्ल: जो चुपचाप चला गया, पर सबके पास पहुँच गया

            जिनके जाने से
            कविता भी
            शोक में होती है
            जाना ख़ुद
            रोता है
            अपनी नियति पर

            उनकी अनुपस्थिति
            कायनात से भी ज़्यादा
            जगह घेरती है…

            विनोद कुमार शुक्ल अब हमारे बीच नहीं हैं— यह वाक्य लिखते हुए भी मन उसे स्वीकार नहीं कर पाता। कुछ कवि ऐसे होते हैं जिनकी अनुपस्थिति भी उपस्थिति की तरह लगती है। विनोद कुमार शुक्ल उन्हीं में से थे। उनका जाना किसी शोर के साथ नहीं हुआ, ठीक वैसे ही जैसे वे जीवन भर किसी शोर के साथ नहीं रहे। वे चुपचाप आए, चुपचाप रहे और अब चुपचाप चले गये पर अपने पीछे ऐसी कविता छोड़ गए, जो बहुत देर तक हमारे भीतर बोलती रहेगी।

वे प्रणम्य व्यक्तित्व थे— निर्विवाद, निर्विकल्प और अपने ढंग में अकेले। वे किसी लेखक संगठन की सक्रिय राजनीति में नहीं रहे, फिर भी हर संगठन, हर पीढ़ी, हर विचारधारा ने उन्हें सहज भाव से अपना कवि माना। यह स्वीकार्यता किसी पुरस्कार, पद या वक्तव्य से नहीं, बल्कि कविता की उस सादगी से उपजी थी, जो बिना माँगे हृदय में जगह बना लेती है।

हम उन्हें ‘नौकर की कमीज़’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ से पहचानते हैं, पर सच यह है कि उनकी पहचान किसी एक कृति में सीमित नहीं रही। उनका पूरा जीवन, उनका स्वभाव, उनकी मौन उपस्थिति, सब मिलकर कविता थे।

उनका स्वभाव भी वैसा ही था जैसा उनकी कविता— समभावी, निर्विकार, आत्मप्रचार से दूर। वे कभी अतिकथन के पक्षधर नहीं रहे। चर्चित होने के लिए कोई बयान देना, किसी बहस में स्वयं को स्थापित करना— यह उनकी प्रकृति में नहीं था। रायपुर में उनसे हुई वह आधे घंटे की मुलाक़ात— साधारण बातचीत, विदिशा का ज़िक्र, रचना-प्रक्रिया पर सहज विचार—आज स्मृति में एक अमूल्य धरोहर की तरह लौट आती है। वे बड़े कवि थे, पर कभी उन्होंने बड़ा कवि होने का अभिनय नहीं किया। कथन नहीं दिये।

विनोद कुमार शुक्ल, vinod kumar shukla

विनोद कुमार शुक्ल की कविता का केंद्रीय भाव जाना था। किसी के पास जाना, किसी स्थिति तक पहुँचना, किसी दुःख में स्वयं को उपस्थित करना। यह जाना केवल भौगोलिक नहीं था— यह नैतिक और मानवीय जाना था।

जो मेरे घर
कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा

यह कविता आज उनकी समूची काव्य-यात्रा का सार लगती है। यहाँ कवि प्रतीक्षा नहीं करता, पहल करता है। नदी, पहाड़, खेत, खलिहान— जो कभी “घर” नहीं आ सकते—उनके पास जाना ही मनुष्यता का विस्तार है।

“कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा”— यह पंक्ति जीवन के जोखिम को स्वीकार करने की ईमानदार घोषणा है। और—

उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा

यहाँ मिलना भी ज़िम्मेदारी है। इसीलिए यह “अकेली आख़िरी इच्छा” नहीं, बल्कि “सबसे पहली इच्छा” बन जाती है। आज, उनके अंतिम प्रस्थान के संदर्भ में, यह कविता केंद्रीय अर्थ ग्रहण कर लेती है क्योंकि विनोद कुमार शुक्ल सचमुच उन सबके पास चले गये, जिनके पास जाना ज़रूरी था। उनकी अंतिम यात्रा को याद करते हुए उनकी यह पंक्तियाँ और अधिक मनछूती हो उठती हैं:

कहीं जाने का मन होता है
तो पक्षी की तरह
कि संध्या तक लौट आएँ
परन्तु प्राण-पखेरू?

यह कविता जीवन और मृत्यु के बीच की उस महीन रेखा को छूती है, जहाँ लौटने की संभावना समाप्त हो जाती है। “पक्षी की तरह जाने की दूरी”— यही जीवन है। पर प्राण-पखेरू की उड़ान वापसी रहित है। यहाँ न कोई विलाप है, न कोई घोषणा— बस एक शांत प्रश्न, जो हमें भीतर तक ख़ाली कर देता है। हताशा जैसी कविता में उन्होंने मनुष्य से पहले भावना की पहचान की:

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था

यह कविता बताती है कि दुनिया को बचाने के लिए पहचान नहीं, संवेदना चाहिए। “हम दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे/ साथ चलने को जानते थे”— यह पंक्ति आज भी हमारे समय की सबसे बड़ी नैतिक सीख है।

विनोद कुमार शुक्ल वक्रोक्ति के अद्वितीय कवि थे। एक ही शब्द अलग पंक्ति में बैठकर अलग अर्थ दे देता है। प्रेम, एकांत, अँधेरा— सब उनके यहाँ भय नहीं, भरोसे में बदल जाते हैं—
प्रेम के सुख में
पलक मूँद लेने का अंधकार है।
यह अँधेरा सुरक्षा का है, आत्मीयता का है।

जैसे बेगम अख़्तर ने फ़ैज़ाबाद को, बिस्मिल्ला ख़ाँ ने बनारस को, प्रेमचंद ने लमही को अमर किया—वैसे ही विनोद कुमार शुक्ल ने रायपुर को। रायपुर उनकी कविता में केवल एक शहर नहीं, हम सभी के लिए एक मनःस्थिति बन गया। हम सबके लिए भी यह शहर अब एक अलग आगार बन गया है। हालांकि उनके पहले भी यह अंचल कुछ और साहित्यकारों और रंगकर्मियों के नामों से जाना जाता है।

विनोद कुमार शुक्ल समकालीन हिंदी कविता के सितारा कवि थे, पर वे केवल चमकते नहीं थे, उजास देते थे। उनकी मित्रताएँ, उनकी सादगी, उनकी कविता— सब हमारी स्मृति में देर तक ठहरेंगी। उनकी विदाई में हम रिक्ति-भाव से भर गये हैं। पर यह रिक्ति शून्य नहीं है। यह वह ख़ली जगह है, जहाँ उनकी कविताएँ— अब पहले से अधिक हमारे साथ रहेंगी।

ब्रज श्रीवास्तव

ब्रज श्रीवास्तव

कोई संपादक समकालीन काव्य परिदृश्य में एक युवा स्वर कहता है तो कोई स्थापित कवि। ब्रज कवि होने के साथ ख़ुद एक संपादक भी हैं, 'साहित्य की बात' नामक समूह के संचालक भी और राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक आयोजनों के सूत्रधार भी। उनके आधा दर्जन कविता संग्रह आ चुके हैं और इतने ही संकलनों का संपादन भी वह कर चुके हैं। गायन, चित्र, पोस्टर आदि सृजन भी उनके कला व्यक्तित्व के आयाम हैं।

9 comments on “विनोद कुमार शुक्ल: जो चुपचाप चला गया, पर सबके पास पहुँच गया

      1. विनोद कुमार शुक्ल को नमन
        बहुत बढ़िया लेख, आकर्षण से भरपूर,पाठकों को बांधे रखने वाला शब्द चयन, सारगर्भित विचार!बहुत-बहुत बधाई

  1. विनोद कुमार शुक्ल जी को नमन। बहुत सुंदर लेख है विनोद जी की स्मृति में, एक कवि के लिए सच्ची श्रद्धांजलि।

  2. विनोद कुमार शुक्ल को इस लेख में आपने अच्छे से याद किया
    सादर नमन

  3. हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष श्री विनोद कुमार शुक्ल का जाना साहित्य के लिए बहुत बड़ी हानि है,
    आदरणीय श्री बृज श्रीवास्तव द्वारा जो साहित्यिक भावनाएं व्यक्त की गई हैं वह आदरणीय श्री शुक्ल जी की पूर्णता को प्रदर्शित करती हैं ज्यादा कुछ नहीं शून्य से शुरू शून्य पर खत्म चरितार्थ करता हुआ वैभव विलास ।

  4. इससे सुंदर,भावभीनी श्रद्धांजलि और क्या होगी।

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