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विवेक रंजन श्रीवास्तव नवंबर से अमेरिका प्रवास पर हैं और अन्य देशों की यात्राओं पर भी जाने वाले हैं। इस दौरान वह रोज़ाना शब्दों को समय दे रहे हैं। आब-ओ-हवा पर विशेष रूप से वैचारिकी, नोट्स, अनुभव आदि इंदराज के लिए यह कोना।
दूर देस में लेखक-2...

सड़कों पर सोते लोग, क्या प्रश्न सिर्फ़ अमेरिका का है?

            न्यूयॉर्क मतलब आधुनिकता का चरमोत्कर्ष पर यहां बेघर होना (Homelessness) आज केवल एक मानवीय संकट नहीं, बल्कि विकास की नीतिगत, आर्थिक और सामाजिक समस्या है, जो दुनिया से वैचारिक विवेचन तथा प्रगति के साथ सबके समावेशी स्थाई समाधान की आवश्यकता रेखांकित करती है।

न्यूयॉर्क राज्य में 2024 तक बेघर लोगों की आबादी 1.58 लाख से अधिक हो चुकी थी, जो पूरे अमेरिका के बेघर लोगों का लगभग पाँचवाँ हिस्सा है।

2022 से 2024 के बीच न्यूयॉर्क में बेघर लोगों की संख्या व्यावहारिक रूप से दोगुनी हो गई, जबकि केवल 2023 से 2024 के बीच यह वृद्धि दर लगभग 53% रही, जो राष्ट्रीय औसत से चार गुना अधिक है। 2024 में न्यूयॉर्क सिटी के शेल्टर सिस्टम में लगभग 89,000 से अधिक लोग रह रहे थे, जिनमें बड़ी संख्या लैटिन अमेरिका या अन्य देशों से आये आश्रय-प्रार्थियों (asylum seekers) की थी।

न्यूयॉर्क सिटी की सड़कों या पार्क, सबवे आदि में प्रत्यक्ष रूप से दिखते बेघर लोगों की संख्या शेल्टर होम में रात बिताने वालों की संख्या से तुलनात्मक रूप से कम है। मतलब वास्तव में समस्या अधिक बड़ी है।

बेघरपन को प्रायः अकेले पुरुषों की समस्या समझा जाता है, जबकि आकड़ों से पता चलता है कि न्यूयॉर्क में लगभग एक तिहाई बेघर लोग बच्चे हैं। 2022 से 2024 के बीच बेघर बच्चों की संख्या लगभग 20,000 से बढ़कर 50,000 से अधिक तक पहुँच गयी, जो बाल अधिकारों और शिक्षा दोनों की दृष्टि से गंभीर चुनौती है।

न्यूयॉर्क में बेघरपन बढ़ने के प्रमुख कारणों में मकान किराया वृद्धि, किफ़ायती आवास की कमी, निष्कासन की बढ़ी कार्यवाही और आश्रय प्रार्थियों की बड़ी आमद शामिल हैं। न्यूयॉर्क जैसे महानगर में ‘अफोर्डेबल हाउसिंग’ की परिभाषा ही विवादास्पद हो जाती है, क्योंकि बाज़ार आधारित किराया आम नागरिक की आय से लगातार आगे निकल चुका है।

परिवारों ने अपने बेघर होने के तुरन्त कारण के रूप में जिन बातों की ओर इशारा किया है, उनमें जबरन बेदख़ली, भीड़भाड़ या दोहरी-तिहरी साझेदारी वाला आवास, घरेलू हिंसा, नौकरी खो देना और असुरक्षित, ख़तरनाक आवास आदि स्थितियाँ बतायी हैं। इस प्रकार होमलेस होना केवल आवासीय समस्या नहीं, बल्कि श्रम बाज़ार, घरेलू संबंधों और शहरी नियोजन की संयुक्त सामाजिक समस्या है।

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न्यूयॉर्क सिटी की पहचान लंबे समय से इस बात से जुड़ी रही है कि यहाँ क़ानूनी रूप से ‘राइट टू शेल्टर’ यानी आश्रय पाने का अधिकार मान्यता प्राप्त है।

इस व्यवस्था के तहत सैद्धांतिक रूप से हर वह व्यक्ति जो शहर में बेघर है और शेल्टर चाहता है, उसे आश्रय उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

हाल के वर्षों में, विशेष रूप से प्रवासी आश्रय प्रार्थियों की बड़ी आमद के बाद, नगर प्रशासन ने इस अधिकार में व्यावहारिक संशोधन करने की कोशिश की है। 2024 में एक अंतरिम समझौते के तहत नये आये वयस्क आश्रय प्रार्थियों के लिए शेल्टर में रहने की अवधि 30 दिन और 23 वर्ष से कम आयु वालों के लिए 60 दिन तक सीमित करने की अनुमति दी गयी, जिसे बाद में भी बढ़ाया जा सकता है, पर यह विस्तार कठोर शर्तों के साथ जुड़ा हुआ है।

शेल्टर अवधि की सीमा तय करने के निर्णय को नागरिक संगठनों और अधिवक्ताओं ने भेदभावपूर्ण और अल्पदृष्टि वाला कहा, क्योंकि इससे ऐसे लोग बार बार अनिश्चितता और पुनः आवेदन के चक्र में फँस जाते हैं, जिनके पास किफ़ायती स्थाई आवास तक कोई वास्तविक पहुँच नहीं है।

बिना स्थाई हाउसिंग नीति के, शेल्टर सीमा केवल समस्या के ‘दिखते दबाव’ को घटाने का प्रयास बन जाती है न कि इससे समस्या का स्थाई समाधान हो सकता है।

2022 के बाद से न्यूयॉर्क सिटी ने हज़ारों की संख्या में लैटिन अमेरिका, कैरेबियन और अन्य क्षेत्रों से आये आश्रय-प्रार्थियों को अपने शेल्टर नेटवर्क में जगह दी है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय चर्चाओं में यह तथ्य उभरता है कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, नशा करने की प्रवृत्ति और संस्थागत देखभाल के विघटन ने भी बेघरपन को स्थाई रूप दिया है। इलाज तक सीमित पहुँच, महँगी दवाएँ, और नशा मुक्ति केंद्रों की सीमित क्षमता के बीच कई लोग सड़क, सबवे स्टेशनों और असुरक्षित अस्थाई ठिकानों में धकेल दिये जाते हैं। उच्च जीवन यापन लागत और धीमी हाउसिंग निर्माण गति इस समस्या को जटिल बना देती है।

इतनी बड़ी संख्या में बेघर या अस्थायी आवास में रहने वाले छात्रों का अर्थ केवल आवासीय असुरक्षा नहीं, बल्कि शिक्षा के अधिकार पर दीर्घकालिक आघात भी है।

बचपन में बेघरपन का अनुभव आगे चलकर मानसिक स्वास्थ्य, रोज़गार, आय और सामाजिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव छोड़ता है, जिससे बेघरपन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ‘स्थानांतरित’ होने का जोखिम पैदा हो जाता है।

इस दृष्टि से न्यूयॉर्क में बेघर बच्चों और छात्रों की बढ़ती संख्या केवल वर्तमान नहीं, बल्कि भविष्य के सामाजिक ताने बाने के लिए भी ठीक नहीं है।

नगर और राज्य स्तर पर सकारात्मक प्रयास भी लगातार किये जाते हैं, जैसे शेल्टर से स्थाई आवास में स्थानांतरण की दर में वृद्धि, और बेदख़ली रोकने के लिए क़ानूनी सहायता कार्यक्रमों का विस्तार किया गया है।

न्यूयॉर्क में होमलेस होने की समस्या का संकट केवल किसी एक कारण या एक वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि आवास बाज़ार, प्रवासन नीतियों, श्रम संरचना, मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षा, इन सभी क्षेत्रों की परस्पर समीकृत समस्या है।

स्पष्ट है कि अत्यधिक समृद्ध और वैश्विक महानगर भी यदि अपने सामाजिक और आवासीय ढाँचे को न्यायपूर्ण न बना पाएँ, तो आधुनिकता का वैभव सड़कों पर सोने को मजबूर मनुष्य के लिए एक नैतिक प्रश्न बन जाता है।

यह प्रश्न केवल न्यूयॉर्क का नहीं, हर देश में उस शहर का है जो विकास के साथ-साथ अपने सबसे कमज़ोर नागरिकों के लिए घर की बुनियादी ज़रूरत सुनिश्चित नहीं कर पा रहा। वह न्यूयॉर्क हो या मुंबई हो?

(चित्र परिचय: न्यूयॉर्क की सड़कों पर बने अस्थाई आशियाने और इनसेट में होमलेस सेंटर में लगे बिस्तरों का दृश्य)

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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