
- December 31, 2025
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग आलोक त्रिपाठी की कलम से....
भारत में भांग विरोधाभास: परंपरा, कानून, पाखंड
भारत वह देश है जहाँ प्राचीन परंपराएँ आधुनिक क़ानूनों से टकराती रहती हैं और कभी-कभी यह टकराव बेहद अजीब रूप ले लेता है। भांग (कैनाबिस) इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। सदियों से भारतीय संस्कृति में यह पौधा बुना हुआ है— अथर्ववेद में इसे पवित्र औषधि माना गया है। होली और शिवरात्रि जैसे त्योहारों में भांग की ठंडाई पीना आम बात है, सरकारी दुकानों से बिकती है, और कोई हंगामा नहीं। लेकिन उसी पौधे का फूल या रेजिन (गांजा या चरस) रखने पर सालों की जेल हो सकती है। जैसे कोई फल खाने की इजाज़त हो, लेकिन पत्तियों से चाय बनाने पर सजा! और दूसरी तरफ़ शराब— जो दुर्घटनाओं, बीमारियों और सामाजिक नुक़सान का बड़ा कारण है— वह लाइसेंस वाली, सरकारी ख़ज़ाने की मोटी कमाई का स्रोत बनी हुई है। अगर सार्वजनिक स्वास्थ्य ही असली चिंता होती, तो यह विरोधाभास समझ से बाहर होता। आंकड़ों और तथ्यों के साथ इस असंगति को समझते हैं।
पौधा एक ही है: कैनाबिस सैटाइवा। जैविक रूप से कोई फ़र्क नहीं, लेकिन क़ानून ने मनमानी लकीर खींच दी है। 1985 के एनडीपीएस एक्ट में भांग (पत्तियां और बीज) को छूट दी गयी है। यह कई राज्यों में राज्य आबकारी क़ानूनों के तहत बिकती है। उत्तर प्रदेश या राजस्थान जैसे स्थानों पर लाइसेंस वाली दुकानों से। त्योहारों में ठंडाई बनाकर पी जाती है, हज़ारों साल से। लेकिन गांजा या चरस? छोटी मात्रा रखने पर भी 10 साल तक की जेल और जुर्माना। यह वैज्ञानिक आधार पर नहीं, बल्कि 1980 के दशक में अमेरिका-प्रेरित ‘वॉर ऑन ड्रग्स’ और यूएन संधियों के दबाव में हुआ। औपनिवेशिक काल तक भारत में कैनाबिस पर ज़्यादा पाबंदी नहीं थी, टैक्सेशन ज़्यादा था।
भांग बनाम शराब
सुरक्षा की बात करें तो भांग का रिकॉर्ड चकाचक है। दुनिया भर में कैनाबिस से ओवरडोज़ से मौत का कोई दर्ज मामला नहीं, ज़ीरो। अमेरिकी ड्रग एनफ़ोर्समेंट एजेंसी भी मानती है कि मारिजुआना ओवरडोज़ से मौतें रिपोर्ट नहीं हुईं। अनुमान है कि सालाना 147 मिलियन लोग (दुनिया की 2.5% आबादी) कैनाबिस इस्तेमाल करते हैं, लेकिन मौत की दर न के बराबर।
अब शराब की बारी। भारत में यह मौतों और बीमारियों का बड़ा कारण है। 2024 में तमिलनाडु के कल्लाकुरिची में ज़हरीली शराब से 65 से ज्यादा मौतें हुईं, सैकड़ों अस्पताल में। रोड एक्सीडेंट में शराब की भूमिका बड़ी है। 2022 में नशे में ड्राइविंग से 3,268 एक्सीडेंट और 1,503 मौतें। शराब से जुड़ी बीमारियाँ जैसे लिवर सिरोसिस सालाना हज़ारों जान लेती हैं। वैश्विक स्तर पर शराब से हर साल 26 लाख मौतें होती हैं।

फिर भी शराब राज्यों के लिए कमाई का बड़ा स्रोत है। 2023-24 में उत्तर प्रदेश ने शराब से क़रीब 47,600 करोड़ रुपये कमाये, तमिलनाडु ने 45,855 करोड़ (जिसमें VAT और एक्साइज़ शामिल)। ये पैसे राज्य बजट को मज़बूत करते हैं— इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याण योजनाओं के लिए।
कल्पना कीजिए अगर भांग को भी शराब की तरह रेगुलेट किया जाये: लाइसेंस, क्वालिटी कंट्रोल, टैक्स। इससे किसान लाभान्वित हों (भारत में हेम्प की खेती के लिए अच्छा मौसम), नौकरियां बढ़ें, टैक्स आये। दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में कैनाबिस की खपत वैश्विक टॉप 10 में है। अमेरिका जैसे देशों में लीगलाइज़ेशन से अरबों का राजस्व और क़ानून प्रवर्तन पर ख़र्च बचा।
यह विरोधाभास सिर्फ़ क़ानूनी नहीं, नीतिगत विफलता है। अगर स्वास्थ्य प्राथमिकता होती, तो नुक़सान के आधार पर रेगुलेशन होता, न कि इतिहास या विदेशी दबाव से। एक सुसंगत नीति या तो भांग को शराब जैसा बनाये- लाइसेंस, नियंत्रण, टैक्स- या सभी पदार्थों पर एक समान मानक लगाये। फ़िलहाल एक पवित्र पत्ता परंपरा है, फूल अपराध और शराब की बोतल बड़ा बिज़नेस। क्या अब सोचने का वक़्त नहीं आ गया?

डॉ. आलोक त्रिपाठी
2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।
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