
- December 31, 2025
- आब-ओ-हवा
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2025 की प्रमुख साहित्यिक हलचलों में एक रही मूलत: कन्नड़ लेखक बानू मुश्ताक़ का बुकर पुरस्कार जीतना। इस साल के जाते-जाते पढ़िए उनकी विजेता पुस्तक 'हार्ट लैम्प' की चर्चित शीर्षक कहानी...
अंग्रेज़ी अनुवाद: दीपा भास्थि | हिंदी अनुवाद: श्रीविलास सिंह
हृदय दीप
मेहरू ने आधे बंद दरवाजे को बस अपना पांव अंदर रखते हुए मुश्किल से धकेला ही था, कि उसके पिता जो बैठक में दीवान पर लेटे हुए थे, और उसके बड़े भाई, जो उनके साथ किसी विषय पर धीमी आवाज़ में चर्चा कर रहे थे, दोनों ने बात करनी बंद कर दी और उसकी ओर देखने लगे। तभी उसकी भतीजी राबिया ने भीतर से दौड़ते हुए आकर घोषणा की, “मेहरू फुफ्फू आ गई – मेहरू फुफ्फू आ गई।” अमान, उसका दूसरा बड़ा भाई और राबिया का पिता, अपने कमरे से बाहर आ गया, साबुन का झाग उसकी दाढ़ी पर लगा हुआ था, और ब्रश अभी भी उसके हाथ में था, वह बैठक में खड़ा होकर उसको इस तरह देखने लगा मानों वह अपनी आंखों पर विश्वास न कर पा रहा हो। उसकी सबसे बड़ी भाभी, जो बच्चों को गाती हुई आवाज़ में कुरान पढ़ा रही थी, बिना अपनी सेगारु (साड़ी) का ध्यान दिए जो उसके सिर से खिसक रही थी, बाहर बैठक में आ गई और उसे ताकने लगी। उसकी मां अपनी चमकते मानकों की माला अपने दुबले हाथ में लिये, स्तंभित खड़ी थी, मानो पूछ रही हों, “क्या यह ठीक है? क्या यह सही है?” उसकी छोटी बहनें, रेहाना और सबीहा, बैठक खाने के दरवाज़े के पीछे से झांक रही थी, इस बात की परवाह किये बिना कि जो चपातियां वे रसोई में बना रही थी वे तवे पर कोयला हो रही थीं। सौभाग्य से उसका छोटा भाई आतिफ घर पर नहीं था।
सारा घर कुछ क्षणों के लिए स्थिर खड़ा रहा। यह उसके लिए अपरिचित लग रहा था। मां, जिसने उसे नौ महीने अपनी कोख में रखा था और उसको पाल पोस कर बड़ा किया था, ने इतना तक नहीं कहा, “ओह, तुम हो। आओ, मेरी प्यारी,” और उसके पिता, जो उस छोटी बच्ची के अपने सीने पर कूदने से आनंदित हुआ करते थे, के चेहरे पर स्वागत की एक मुस्कराहट तक नहीं आई; न ही उसके सबसे बड़े भाई, जो गर्व से उसे “मेरी परी, मेरी फरिश्ता,” कहते थे, न ही अमान ने, जिसने जिद की थी कि उसे कॉलेज भेजा जाए, उसका अभिवादन किया। उनकी पत्नियां उसे इस प्रकार घूर रही थी मानो वह किसी और ग्रह से आई हो।
मेहरु का दिल टूट गया। जब नवजात बच्ची ने उसकी बाँहों में से तेज चीख मारी तभी जा कर हर कोई इस जड़ता से बाहर आया। उसके सबसे बड़े भाई ने पूछा, “इनायत कहाँ है?”
उसने अपना सिर झुका लिया मानो उसने कोई अपराध किया हो और उत्तर दिया, “वह शहर में नहीं हैं.”
“फिर तुम किसके साथ आयीं?”
“मैं अकेली आयी हूँ। “
“अकेली?” उसके चारो ओर एक सामूहिक शोर सा उठा जबकि वह अभी तक चौखट पर ही रुकी हुई थी।
“फारूक, उसे अंदर ले जाओ।” एक बार जब उसके सबसे बड़े भाई का आदेश हो गया, मेहरु भारी और अस्थिर कदमों से भीतर आयी। यह किसी अदालत के कमरे जैसा महसूस हुआ। उसकी बच्ची ने चीखना शुरू कर दिया और बिना बुरका हटाए उसने अपना नकाब ऊपर किया, थोड़ा तिरछे हो कर अपने पिता के बिस्तर पर बैठ गयी और अपनी छाती को अपनी बच्ची के मुंह में दे दिया। उसने अपना चेहरा नहीं धोया था। बच्चे के दूध पीने के साथ ही उसकी अंतड़ियों में जलन होने लगी। पिछली रात से उसने कुछ नहीं खाया था। उसकी माँ के अतिरिक्त अन्य कोई स्त्री इस मुलाकात के दौरान उपस्थित नहीं रह सकती थी।
“मेहर, क्या तुमने आने के पहले घर में किसी को सूचित किया था ?”
“नहीं।”
“क्यों, तुमने वहाँ से चलने के पूर्व उन्हें सूचित क्यों नहीं किया ? ऐसा लगता हैं कि तुमने हमारी बेइज्जती कराने का ही मन बना लिया है।”
“मैं किसे सूचित करती? वहाँ कौन है? इस बात को एक हप्ता हुआ जब वह आखिरी बार घर आया था- उसने मुझे यह तक नहीं बताया कि वह कहाँ जा रहा था। मैंने आप को सारी बातें लिखी थी, लेकिन आपने कोई जवाब नहीं दिया, इस बात की परवाह तक नहीं की कि मैं जीती हूँ या मर गयी।”
“तुमने लिखा था कि तुम्हारा शौहर किसी नर्स के साथ चला गया है। और तुम चाहती हो कि हम इस बात पर विश्वास कर लें ?”
“यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं था तो आप को आ कर पता करना चाहिए था। बहुत से लोग हैं जिन्होंने उन्हें साथ देखा था।”
“और हमें आ कर उसे देखने के बाद क्या करना चाहिए था? कहो, कि हम उसे पकड़ लाते और उससे इस बारे में पूछते, और वह कहता कि हाँ, यह सही है – फिर हम क्या करते?” क्या हमें मस्जिद में अर्जी लगानी चाहिए? वह कहेगा, मैंने एक गलती की है, मैं उसे मुस्लिम बना लूंगा और उससे निक़ाह कर लूंगा। तब वह तुम्हारी सौत हो जाएगी। हम क्या करते यदि वह कहता कि मैं इस मेहरु नाम की औरत को नहीं चाहता, मैं इसे तलाक़ दूँगा?”
इस समय तक मेहरु अनियंत्रित रोये जा रही थी। अपने बच्चे को दूसरे स्तन से लगा उसे दूध पिलाना जारी रखते हुए, उसने अपने बुर्के के नीचे से अपनी सेगारु (साड़ी) खींची और अपनी ऑंखें और नाक पोंछी। एक क्षण को ख़ामोशी रही।
“इसका मतलब है आप सब कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं, ठीक ? कोई कुछ नहीं बोला। उसने कहना जारी रखा, “मैं आप के पाँव पड़ी थी, यह कहते हुए कि मैं शादी नहीं करना चाहती। क्या आपने सुना? मैंने कहा, कि मैं बुरका पहन कर कालेज जाऊंगी। मैंने आपसे मेरी पढाई बंद न कराने की भीख मांगी थी। लेकिन आप में से किसी ने नहीं सुना। मेरी क्लास की बहुत सी लड़कियों की अभी शादी नहीं हुई है, और मैं एक बूढ़ी औरत हो चुकी हूँ। मेरे पर पांच बच्चों की जिम्मेदारी है। उनका बाप यहाँ वहाँ घूम रहा है, और मेरी कोई जिंदगी नहीं है। क्या कोई पुरुष इस तरह की हराम बात करता है? और आप में से कोई नहीं पूछ पाता कि वह ऐसा क्यों कर रहा है?”
“बस मेहरु बस।” उसकी माँ ने अपनी आँखें बंद की और अपना सिर हिलाया।

“हाँ, अम्मा, मेरा भी बस हो गया। पहले लोगों ने कानाफूसी शुरू की, फिर जिन लोगों ने उन्हें एक साथ थियेटर में और साथ साथ होटल जाते देखा आ कर मुझसे सीधे कहने लगे। और फिर वह बिना किसी डर के उसके घर जाने लगा। और जब उसे हर किसी ने डाँटा तो वह बेंगलुरु चला गया, हजारों रुपये खर्च किये और उसका स्थानांतरण करवा लिया। अब वह पिछले आठ दिन से उसी के साथ रह रहा है। मुझे इस बात को और कितने दिन बरदाश्त करना चाहिए ? मैं कैसे जिन्दा रहूंगी ?”
“धीरज रखो मेरी बेटी। तुम्हें उसे प्यार से सीधे रस्ते पर लाने की कोशिश करनी चाहिए।”
“अम्मा, मेरा तो कोई दिल है नहीं? न ही मेरे कोई एहसास हैं ? मैं अपने शौहर की तरह उसकी इज्जत नहीं कर सकती यदि वह इस तरह दूर चला गया है। जब मैं उसे देखती हूँ मेरी देह नफ़रत से भर जाती है। उसे प्यार करना तो बहुत दूर की बात है। जहाँ तक बात उसके मुझे तलाक़ देने की है – मैं यह उससे अवश्य लूंगी। मैं उस घर में वापस नहीं जाऊंगी।”
“मेहर, तुम क्या कह रही हो ? यह सब बहुत ज्यादा है। वह एक पुरुष है, और उसने गन्दगी में पैर रख दिया है, लेकिन वह इसे साफ कर लेगा, जब कहीं पानी मिलेगा और फिर वापस आ जायेगा। उस पर कोई धब्बा नहीं लगेगा।”
इसके पूर्व कि वह जवाब दे पाती, अमान ने बीच में ही बात काटी। “देखो, यह हम लोगों के सामने कैसा व्यवहार कर रही है। इसने इसी तरह की बात उसके सामने भी की होगी। और इसी कारण वह नाराज हो कर चला गया होगा।” वह रुका और उसने अपना स्वर मुलायम किया। “यदि इस घर की बहुएँ इस तरह की बातें सीख जाएँ तो क्या ही बात होगी, क्या नहीं। मेहरु की उदासी तेजी से गुस्से में बदल गयी और फिर निराशा में।
“तुमने बहुत अच्छी बात कही अन्ना। ख़ुदा तुम्हें बेहतर रखें। यह सच है: मैं बुरी औरत हूँ। मैंने वैसा ही सीखा है जैसा मेरा बुरा स्वभाव है। मैं बिना बुर्क़े के बाहर नहीं जाती। उसने मुझे इसे छोड़ देने को और साड़ी नाभि से नीचे पहनने को कहा और इधर उधर उसका हाथ पकड़ कर टहलने को कहा। लेकिन आप ने मुझे बुर्क़े में ढँक कर रखा था और मेरा पालन पोषण इस तरह किया था कि मेरी साड़ी का पल्लू भी मेरे सिर से न हटे। अब यदि मैं इसे हटाती हूँ तो मैं स्वयं को बिना कपड़ों का महसूस करती हूँ। तुम लोगों ने मेरे हृदय को अल्लाह के डर से भर दिया। मैं वह सब करने को सहमत नहीं हो पाती, जो करने को वह कहता है, इसलिए वह किसी ऐसे के संग हो गया जो उसकी धुन पर नाचती है। और अब तुम सब इस बात से डरे हुए हो कि यदि वह मुझे छोड़ देता है तो मैं तुम लोगों पर बोझ बन जाउंगी – इसीलिए तुम लोग कह रहे हो कि मैं यह सब बर्दाश्त करूँ। लेकिन अब यह संभव नहीं है। उस जिन्दा नर्क में जलते हुए रहने की बजाय मैं अपने बच्चों को ले कर कहीं मज़दूरी कर लूंगी। मैं तुम सब पर बोझ नहीं बनूँगी – बोझ नहीं बनूँगी।”
“क्या फल कभी बेल के लिए बोझ होता है, मेहर? बकवास मत करो,” उसकी माँ ने प्रतिरोध किया।
“अम्मा इसे भीतर ले जाओ और कुछ खाने को दो,” उसके सबसे बड़े भाई ने गंभीरता से कहा। “हम दस मिनट में चिकमंगलूर के लिए निकलेंगे। यदि कोई बस हुई तो हम बस पकड़ लेंगे। यदि नहीं तो हम टैक्सी से चलेंगे। हम भी उसकी धुन पर नहीं नाच सकते।”
“मैं तुम्हारे घर का एक बून्द पानी भी नहीं पियूँगी। न ही मैं चिकमंगलूर जाऊंगी। यदि तुम मुझे वहां जबरदस्ती ले गए, तो मैं वादा करती हूँ कि मैं खुद को आग लगा लूंगी।”
“बहुत हो गया, मेहर। जो मरना चाहते हैं, इधर उधर घूमकर बात नहीं करते। अगर तुम्हें इस परिवार की इज्जत का कुछ भी खयाल होता तो तुम यहाँ आने की बजाय ऐसा ही कुछ कर चुकी होती। जिस घर में तुम्हारी डोली गयी थी उसी घर से तुम्हारा डोला (जनाज़ा) निकलना चाहिए। एक इज्जतदार औरत की यही जिंदगी है। तुम्हारी हाईस्कूल में पढ़ने वाली एक बेटी है; तुम्हारी शादी लायक उम्र की दो बहनें हैं। तुम्हारा एक गलत कदम, उनके भविष्य की राह में रोड़ा बन जायेगा। तुम कह रही हो कि हम तुम्हारी बचकानी बातें सुनें और जा कर तुम्हारे शौहर से लड़ें, लेकिन हमारी भी बीवियां और बच्चे हैं। इसलिए भीतर जाओ और कुछ खा लो।” वह एक क्षण के लिए अपने भाई की ओर मुड़ा और फिर वापस उससे सम्बोधित हो गया, “अमान, जाओ एक टैक्सी ले आओ। और तुम, मेहर, यदि तुम्हारे बच्चे या पडोसी पूछें तो उनसे कहना कि अपने बच्चे को अस्पताल ले कर गयी थी या ऐसा ही कुछ। तुम यहाँ आने के लिए किस समय निकली थी ?”
वह कुछ नहीं बोली। “अभी साढ़े नौ बजे हैं,” अमान ने कहा, “वह नौ बजे आयी थी।”
“यात्रा तीन घंटे की है। यह छः बजे सुबह चली होनी चाहिए। यदि हम अभी तत्काल चलें, हम वहां साढ़े बारह बजे पहुँच सकते हैं।”
मेहरु जहाँ बैठी थी वहां से नहीं हिली। उसकी माँ और बहनों ने बारी बारी से उस से खाने की विनती की, लेकिन उसने भोजन का एक कौर या पानी का एक घूंट भी अपने मुंह में नहीं डाला। जब टैक्सी आयी, उसने किसी से कोई बात नहीं की। बाहर निकलते हुए, बच्चे को उसने सीने से लगाकर कसकर पकड़ा हुआ था। उसके बड़े भाई उसकी बगल में बैठे हुए थे, उसने किसी को अलविदा नहीं कही। मात्र तब जब वह कुछ अंतिम कदम चल चुकी, उसने पलट कर एक नजर उस मकान पर डाली जिसमें उसका जन्म और लालन पालन हुआ था। उसकी आँखें आंसुओं से भर गयीं। उसके पिता ने खांसते हुए अपनी छाती पकड़ ली। अपनी बेटी की ओर देखती, उसकी माँ सुबक रही थी फिर वे अपने शौहर की ओर मुड़ गयीं और उन पर पानी छिड़क कर पंखा झलते हुए सुलाने लगीं। वे अपने आप से कह रहीं थी, “अगर मैंने कोई पुण्य किया हो, मेरी पूरी जिंदगी में कोई अच्छाई, कोई सदाकत रही हो, तो मेरी बेटी की जिंदगी सुलझ जाये।”
अमान ने कार का दरवाजा खोला और मेहर को आँख से इशारा किया कि वह भीतर बैठे, और वह सांस लेते हुए बड़बड़ाया। वह कभी अपने बड़े भाइयों के संबंध में गर्व से डींग हाँका करती थी। जब वह अपने शौहर इनायत से नाराज होती तो कहती, “मेरे भाई बब्बर शेर की तरह खड़े हैं, एक दिन वे तुम्हें काट डालेंगे और तुम्हारे टुकड़े उड़ा देंगे, सावधान रहना!” लेकिन यह घमंड पूरी तरह मिट चुका था। उसके भाइयों के शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे: “अगर तुममें अपने खानदान की इज्जत रखने की अक्ल होती, तो तुम अपने को आग लगा कर मर गई होती। तुम यहाँ न आयी होती।”
जब वह कार में बैठी, उसने मुड़ कर अपने घर को नहीं देखा – न ही अपनी माँ को, जिसे उसने एक खिड़की से झाँकते हुए देखा था, न ही अपनी बहनों को जो पर्दे के पीछे से झाँक रही थीं, न ही भाभियों को, जो संभवतः वैसे भी भीतर कहीं अपने रोजमर्रा के कामों में लग गई थी। लेकिन उसके बुर्के के नीचे उसके आँसू निरंतर उसके चेहरे पर से गिरते रहे। वह अपने होंठ चबाते हुए भीतर से आती रुलाई को रोके बैठी थी।
कार तेज़ी से दौड़ रही थी। कोई कुछ नहीं बोला। अमान सामने की सीट पर अपने मोहल्ले के ही चालक की बगल में बैठा था। क्या कोई उसके सामने पारिवारिक बातों की चर्चा कर सकता था? उनकी यात्रा खामोशी से जारी रही। वह इनायत की लालसा और प्रेम के खेल में सोलह साल तक मुहरा बनी रही। और सोलह साल के बाद, उसने उसके स्त्रीत्व तक का अपमान कर डाला। “तुम वहाँ एक लाश की भाँति पड़ी रहती हो। तुम से मुझे क्या ख़ुशी मिलेगी?” एक बार उसने ताना दिया था। “तुम्हें मैंने क्या नहीं दिया – पहनने को, खाने को? मुझे कौन रोकने वाला है? मैं तो एक ऐसी औरत के साथ हूँ जो मुझे ख़ुशी देती है।”
उसने सड़क पर के पेड़ों अथवा सड़क के किनारे के दृश्यों की ओर ध्यान नहीं दिया। मात्र तब जब कार अचानक रुक गई और उसने बाहर की ओर बिना रुचि के देखा और फिर उस मकान को देखा जिसे वे लोग कहते थे कि उसका था। एक मुरझाये हुए चहरे वाली युवा लड़की सामने के दरवाजे से दौड़ती हुई आई और, “अम्मी !” कहती हुई कार के पास पहुँच गई। “आखिर आप वापस आ गयी। मैं कितनी परेशान थी।” उसने अपनी माँ की बाँहों से बच्चे को ले लिया, उसे अपने सीने से लगाया और वापस भीतर दौड़ गयी।
मेहरू धीमे कदमों से मकान की ओर गयी। वह उसे खाली खाली महसूस हुआ। अन्य बच्चे स्कूल जा चुके थे, और उसकी सोलह साल की बेटी सलमा, जो अपनी माँ की पीड़ा उसके साथ सहा करती थी, ही उस दिन घर में सबसे बड़ी थी। सलमा ने अपने भाइयों और बहनों को पढाई के लिए भेज दिया था और चिंता के साथ अपनी माँ के लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी। अपने मामू लोगों को अपनी माँ के साथ देख कर उसने राहत की साँस ली। वह अपने मामू लोगों को देख कर अत्यंत उत्साहित थी। वे उस दूसरी औरत को बालों से पकड़कर घसीटते हुए दूर भगा देंगे, उसने सोचा। वह किसी हिरन की भांति दौड़ती हुई उनके लिए नाश्ता ला रही थी, चाय बना रही थी।
मेहरू अपने कमरे में लेटी हुई थी। सलमा भीतर आयी, उसने अपनी माँ के चहरे से आँसू पोछे, उसे थोड़ा सा खाना खिलाया और बचे हुए खाने को लेकर वापस आ रही थी जब उसने एक परिचित सी आवाज सुनी।
वह शयन कक्ष में वापस दौड़ गयी। “अम्मी, अम्मी, अब्बा वापस आ गए। “ मेहरू ने ऐसा दिखाया मानो उसने उसकी बात न सुनी हो और जो कम्बल वह ओढ़े हुए थी उसी में और डूब गयी। उसकी शिराएं डभक रही थी। सलमा वापस बैठक की ओर चली गयी। उसके मामू लोग बाहर चले गए थे और वह उन सब को बाते करते सुन सकती थी। वे सलाम कर रहे थे, बतिया रहे थे और ठहाके लगा रहे थे।
“अरे भइया, आप लोग किस समय आये ? इनायत पूछ रहा था।
“हम बस अभी आये। तुम कैसे हो ?”
“ओह, मैं अच्छा हूँ, अल्लाह की इनायत है और आप लोगों की दुआएं।”
“अमान की आवाज आयी, “आप कहाँ थे इनायत भाई ?”
“बस यहीं पास में। कुछ इधर उधर का काम था – तुम तो जानते ही हो। आखिर हम सुबह उठने के बाद, घर में ही तो नहीं बैठे रह सकते। सलमा,” उसने पुकारा। “सलमा, अम्मी कहाँ हैं ? देखो कौन आये हैं। अम्मी को कहो बाहर आएं।”
घर के भीतर से कोई आवाज नहीं आयी। “पता नहीं वह कहाँ है,” इनायत ने कहा। “वह अंदर बच्चे के साथ होगी। रुको, मैं उसे बुलाता हूँ।” वह भीतर आया और उसने सलमा को देखा और उससे धीमी आवाज में पूछा : “ये लोग कब आये? तुम्हारी अम्मी कहाँ हैं?” उसके मन में संदेह का एक धागा खुलने लगा।
“मामू लोग बस अभी आये हैं। अम्मी अभी भी सो रही हैं।” सलमा ने समझदारी से उत्तर दिया।
इनायत ने राहत की साँस ली।
“वह अभी तक नहीं उठी? उसे क्या हो गया है ? वह शयन कक्ष के दरवाजे तक आया। मेहरू के गुड़ीमुड़ी सोने के दृश्य ने उसे वितृष्णा से भर दिया। उसके महत्त्व का एकमात्र दावा यह था कि वह उसके बच्चों की माँ थी। यद्यपि उसकी इच्छा थी किन्तु उसके पाँव उसे कमरे के भीतर नहीं ले गए। मेहरू ने कल्पना की कि वह किस प्रकार दरवाजे पर खड़ा था। उसके कपडे, सिगरेट की गंध, उसके पसीने की गंध, उसकी वृद्ध होती देह, उसकी बड़ी बड़ी आँखें। वह पुरुष जिसने उसकी नस नस पर अपने निशान छोड़े थे, उसके लिए एक अजनबी था। वह उसकी आवाज सुनते, कस कर कम्बल को लपेटे पड़ी रही।
“सलमा, यहाँ आओ। उसे कहो कि अपना नाटक बंद करे। यदि उसने अपने भाइयों को यहाँ मुझे समझाने के लिए बुलवाया है तो वह अपने ही गले में फंदा डाल रही है। एक साँस में – एक, दो, तीन बार – मैं कहूंगा और यह सब ख़त्म कर दूंगा, उससे कहो। और उससे कहो कि तलाक़ के बाद देखना कि फिर कैसे उसकी छोटी बहनों और उसकी बेटियों की शादी होती है। उससे यह बात कहो – कि वह मेहमानों के सामने परिवार की इज्जत बिगाड़ रही है। अपनी माँ से कहो। उससे कहो कि अपने भाइयों का स्वागत करे – उससे पूछो चिकन, मटन क्या चाहिए, क्योंकि अभी दोपहर हो चली है, उससे कहो कि तुरंत खाना बनाना शुरू करे,” सलमा वहां थी भी नहीं लेकिन उसने वह सब यह सोचते हुए उगल दिया कि वह कहीं आसपास ही होगी।
इनायत और उसके साले ऐसे बात कर रहे थे जैसे कोई बात हुई ही न हो। वे कॉफी के दाम के बारे में, कश्मीर में चुनाव के बारे में, पड़ोस में एक वृद्ध दम्पति के क़त्ल और उसकी जाँच के बारे में, उस मुस्लिम लड़की के बारे में जिसने हिन्दू लड़के से अदालत में शादी कर ली, इधर उधर की तमाम चीजों के बारे में बातें करते रहे। बातचीत चलती रही, प्रेशर कुकर की सीटी बजी, ब्लेंडर घरघराया और मसलों की तेज महक उड़ी, चिकन लाया गया, खाना तैयार हो गया क्योंकि मेहरू ने बनाया था। सलमा भाग भाग कर उन्हें खाना खिलाती रही। मेहरू बस एक बार किचन से बाहर आयी, बस थोड़ी देर के लिए।
भर पेट खाने के पश्चात्, उन सबके मुंह पान से भरे थे। मेहरू के भाई जाने को तैयार थे। अमान भीतर आया और किचन के दरवाजे के पास खड़ा हो रहा। “थोड़ी सी समझदारी दिखाओ और यह सब व्यवस्थित करो, “ उसने कहा। “मैं अगले हफ़्ते फिर आऊंगा। वह कुछ दिन इधर उधर भटकेगा और फिर खुद ही वापस आ जाएगा। तुम्हें जिम्मेदार होना चाहिए। औरतें क्या क्या समस्याएं नहीं झेलती – ऐसे पति जो शराब पीते हैं, सासें जो बहुओं की पिटाई करती हैं। अल्लाह का शुक्रिया, कि तुम अच्छी हालत में हो। वह थोड़ा-सा गैर-जिम्मेदार है, बस। यह तुम हो जिसे सब कुछ संतुलित रखना चाहिए।” उसके भाई चले गए और जैसे ही कार की आवाज सुनाई पड़नी बंद हुई, इनायत भी घर से बाहर उड़नछू हो गया।
सलमा अपनी माँ को देखने लौटी। उसके मामा लोगों ने न उसे सांत्वना दी थी न उसकी कोई मदद की थी। वह अपनी माँ के शोक से कांपने लगी। जब उसके अब्बा घर से बाहर गए उसकी आँखें भर आई। मकान उदासी की चादर में लिपटा हुआ था, जब उसके भाई बहन स्कूल से वापस आये, वे भी उस चादर को नहीं हटा सके। हर एक को अपने काम करने थे, सबके अपने बोझ थे।

जैसे-जैसे संध्या अपना प्रकाश खोने लगी, मकान के चारों ओर दीये जलने लगे। किन्तु मेहरू के ह्रदय का दीप बहुत पहले ही बुझ चुका था। उसे किसके लिए जीना चाहिए? ऐसे जीने का क्या मतलब था? दीवारें, प्लेटें, कटोरियाँ, चूल्हा, बिस्तर, बर्तन, सामने के अहाते में गुलाब का पौधा – इनमें से कोई भी उसके प्रश्नों के उत्तर देने में सक्षम न था। उसका ध्यान उन दो आँखों की ओर नहीं गया जो उसके चारों ओर भटक रहीं थी, उसकी पहरेदारी सी करती हुई। सलमा अपनी किताबों में डूब जाना चाहती थी; उससे उसकी SSLC की आसन्न परीक्षा की तैयारी की उम्मीद की जाती थी। लेकिन भारी दुश्चिंता, जिसका कोई नाम नहीं था, ने उसको निरंतर अपनी माँ को निगाहों में रखने को बाध्य कर दिया था।
रात के सन्नाटे में, मेहरू ने अँधेरे में देखा। वह उसके जीवन की ही भांति कलिमामय थी। बच्चे सो गए थे। केवल सलमा अभी भी बैठक में पढाई करती हुई जाग रही थी पर उसकी आँखें उसकी माँ के कमरे की ओर लगी हुई थी।
मेहरू की नींद गायब हो चुकी थी। उसे आश्चर्य हुआ : क्या उसके परिवार में उसकी लड़ाई कुछ आसान थी? उसकी इनायत के साथ शादी उसके बी.कॉम. के दूसरे वर्ष की परीक्षा के एक माह पूर्व थी। वह रोई थी, परीक्षा में बैठने देने के लिए गिड़गिड़ाई थी, लेकिन हर कोई उसके अनुरोध के प्रति बहरा हो गया था। विवाह के एक हफ़्ते या कुछ और समय पश्चात्, उसने हिचकिचाहट के साथ अपने शौहर से इस सम्बन्ध में बात की। वह हँसा, उसने उसे मेरा प्यार,’ ‘प्यारी,’ ‘मेरा दिल’ कहा। ‘यदि तुम यहाँ न होगी’, उसने कहा था, ‘तो क्या मेरी साँस नहीं बंद हो जाएगी?’ मेहरू ने विश्वास कर लिया था कि यदि वह उसके साथ न होती तो संभवतः ऐसा हो जाता। वह खुश थी। उसने उस व्यक्ति की हर इच्छा का अनुगमन किया, और वह वो दीप था जिसने उसके ह्रदय को प्रदीप्त किया था।
लेकिन पिछले वर्ष उसके सास-ससुर के गुजर जाने के पश्चात् ही मेहरु अपने शौहर को पूरी तरह अपने लिए पा सकी। उसकी ननदें अपने ससुराल जा चुकी थी और उसके देवर अपने अपने रस्ते चले गए थे। उसका अपना एक घर होने का सपना पूरा हो चुका था। लेकिन यह सब होने तक, उसके चहरे पर झुर्रियां पड़ चुकी थी, और उसके हाथों पर नसें उभर आयी थी, आँखों के नीचे हल्के पड़ गए थे, उसकी एड़ियों में बिवाइयां पड़ गयीं थी और उसके टूटे नाखूनों में गन्दगी स्थायी रूप से जम चुकी थी, उसके बाल कम हो गए थे – और उसने इन में से किसी बात को नोटिस नहीं किया था। और हो सकता है इनायत ने भी नोटिस न किया होता, यदि उसका अपेंडिक्स का ऑपरेशन न हुआ होता और वह नर्स उससे न मिली होती जो उस प्राइवेट अस्पताल में थोड़ी सी तनख्वाह पर बहुत सा काम करती थी, जिसकी आँखों में हजारों सपने थे, जो हवा में चलती, संभवतः तैरती थी – कोई ठीक ठीक कह नहीं सकता – उसकी चमकती त्वचा और शहद के रंग वाली आँखें जो किसी के मन में तूफान उठा सकती थी, जो अपने तीस के दशक में थी और कुछ भी, अपना भविष्य सुरक्षित करने और अपने सपने पूरे करने को कुछ भी करने को तैयार थी।
इनायत ने नर्स को ‘सिस्टर’ कहकर सम्बोधित नहीं किया था। पहले दिन से उन तमाम दिनों तक जब तक वह अस्पताल में रहा, उसने उसे उसके नाम से पुकारा।
और फिर उसने उस कोख को अपमानित कर दिया जिसने उसे कई संतानें दी थी। उसने मेहरू की उसके ढीले पेट के लिए आलोचना की, और उसकी ढीली छातियों के लिए भी जिन्होंने उसके बच्चों की भूख मिटाई थी। उसने उसकी आत्मा तक को नग्न महसूस करा दिया। एक दिन उसने कहा था, “तुम मेरी माँ की तरह हो गई हो,” और उन शब्दों के साथ उसने उसे जिन्दा ही नर्क में धकेल दिया। उन कुछ महीनों में जब उसने ये शब्द कहे थे, उस मकान में खाया गया एक एक टुकड़ा उसे गुनाह जैसा लगता था। अपने ही घर में अजनबी होने की अनुभूति उस पर छा गयी थी, और अपमान की आग ने उसे धराशायी सा कर दिया था और इसीलिए उसने अपने परिवार की मदद चाही थी।
रात्रि और गहरी होती जा रही थी, और उसी के साथ मेहरू के हृदय में उद्वेलन और कठोर होता जा रहा था। उसने कभी इतना एकाकी नहीं महसूस किया था। उसकी कोई कामना नहीं थी। वह बिस्तर पर उठ बैठी। उसका हाल पूछने वाला कोई न था। उसे छेड़ने वाला, आलिंगन करने वाला, चुम्बन लेने वाला कोई न था। वह व्यक्ति जिसने यह सब किया था अब किसी और का हो चला था। जीवन का कोई अंत नहीं महसूस हो रहा था। पार्श्व से आती तेज ध्वनि भी उसमें कोई हलचल न उत्पन्न कर सकी। वह जानती थी कि फ्रेम में जड़ी एक तस्वीर गिर गयी थी और उसका शीशा टूट कर बिखर गया था, लेकिन एक तरह की दुश्चिंता ने उसके भीतर घर कर लिया था और उसके भीतर इस गड़बड़ को ठीक करने की कोई इच्छा शेष न थी। वह धीरे से बिस्तर से उठी। अपने बच्चे को देर तक ताकती रही, और फिर कमरे से बाहर चली गयी। उसके छोटे बच्चे शांति से सो रहे थे।
जब वह धीरे से बैठकखाने से गुजरी, उसने देखा कि सलमा को, जो वहां बैठी पढ़ रही थी, नींद आ गयी थी। वह कुछ देर वहां, अपनी सोती हुई बेटी के पास, खड़ी रही और कांपने लगी। उसने सोचा था कि उसकी समस्त भावनाएं मर चुकी थीं, लेकिन सलमा को देख कर उनकी उमड़ती हुई बाढ़ उसे ध्वस्त सा करने लगी थी। उसने अपनी बेटी का स्पर्श करने की तीव्र इच्छा पर काबू पाया और अपने ह्रदय में उससे कहा, “तुम इन बच्चों की माँ होना, मेरी प्यारी।”
उसके पाँव उसे धीरे धीरे आगे ले जाने लगे। उसने द्वार खोला और सामने वाले अहाते में चली आई। कुछ थोड़े से पौधे जो उसने रोपे थे, ऐसे दिख रहे थे मानों वे रो रहे थे। वे उसके द्वारा लिए गए निर्णय की सहमति में सिर हिलाते लग रहे थे। वह वापस भीतर आई, अपने पीछे दरवाज़े को ताला लगाया, किचन में गई, कैरोसिन का कैन उठाया और मकान में इधर उधर फिरती रही, यह निर्णय कर पाने में अक्षम कि उसे कहाँ होना चाहिए। उसने कैरोसिन उठा लिया। बैठकखाने में पुनः वापस आने से पूर्व, एक बार पुनः अपने सो रहे बच्चों को देखने के लिए वह रुकी।
उसने सलमा की ओर नहीं देखा।
वह तेज़ी से किचन की ओर गई, माचिस उठाई और उसे अपने दायें हाथ में कस कर पकड़े, वह चुपचाप सामने के दरवाज़े का लॉक खोल कर पुनः बाहरी अहाते में आ गई। उसने अँधेरे में आँखें गड़ाई, और सुनिश्चित किया कि जैसा उसने सोचा था, उसका कोई नहीं था, कोई उसे नहीं चाहता था। फिर उसने कैरोसिन अपने ऊपर उड़ेल लिया। वह अपने नियंत्रण से परे की किसी शक्ति की जकड़ में थी। उसने अपने चारों ओर देखा, कोई आवाज उस तक नहीं आ रही थी, और वह कोई स्पर्श नहीं महसूस कर पा रही थी, कोई स्मृति नहीं बची थी, कोई रिश्ता उसे नहीं भेद सकता था। वह अपनी चेतना से परे थी।
किंतु हर बात मकान के भीतर घटित हो रही थी, जहाँ बच्चे की भूख की चीखों ने सलमा को जगा दिया था, और वह दौड़कर गई और उसे उठा कर सीने से लगा लिया, और उस कमरे को पार करती हुई जहाँ उसके भाई बहन सो रहे थे, अपनी माँ को चारों ओर खोजती हुई “अम्मी, अम्मी,” पुकारने लगी। यह देखकर कि मुख्य द्वार खुला हुआ था, वह दौड़ती हुई बाहर अहाते में आई। बाहर के धुंधले अँधेरे में भी उसने अपनी माँ के आकार को देख लिया और कैरोसिन की गंध महसूस की। बिना कुछ सोचे वह बच्चे को अपनी गोद में लिये आगे की ओर भागी और अपनी माँ को कसकर आलिंगन में जकड़ लिया। उसकी माँ, हाथ में माचिस लिये, ख़ुद से लिपटी लड़की को अत्यंत प्यार से देखती रही, मानो वह किसी और की अपेक्षा कर रही हो। सलमा ने बच्चे को जमीन पर रखा और चिल्लाई, “अम्मी ! अम्मी !” हमें छोड़कर मत जाओ!” उसने अपनी माँ के पांव पकड़ लिये।
सलमा सुबक रही थी और छोटा बच्चा जमीन पर पड़ा रो रहा था। मेहरू ने उनको देखा और उसने उस विचित्र शक्ति से स्वतंत्र होने हेतु संघर्ष किया जिसने उसे घेर रखा था, माचिस उसके हाथ से गिर गई। सलमा अब भी अपनी माँ के पाँव पकड़े हुए थी। “अम्मी,” वह कह रही थी, “केवल इसलिए कि आपने एक व्यक्ति को खो दिया, आप हम सब को उस औरत की दया पर छोड़ देंगी? आप अब्बा के लिए मरने को तैयार हैं, लेकिन क्या यह आपके लिए संभव नहीं है कि आप हमारे लिए जियें? आप हम सबको यतीम कैसे बना सकती हैं, अम्मी? हम सब आपको चाहते हैं।” किंतु उसके शब्दों से अधिक, यह सलमा का स्पर्श था जिसने उसे प्रभावित किया।

उसने रोते हुए बच्चे को उठा लिया और सलमा को सीने से लगा लिया। यह महसूस करते हुए कि मानो किसी मित्र द्वारा उसे सांत्वना दी जा रही है, स्पर्श किया जा रहा है और समझा जा रहा है, मेहरू की आँखें भारी हो गईं और वह बस इतना ही कह सकी, “मुझे माफ कर दो, मेरी बच्ची।” रात्रि का अन्धकार विगलित होने लगा था।

श्रीविलास सिंह
अनेक वर्षों से लेखन। दो कविता संग्रह, तीन संग्रह अनूदित कविताओं के, एक कहानी संग्रह, तीन संग्रह अनूदित कहानियों के, कविताएँ, कहानियाँ और देशी विदेशी साहित्य के अनुवाद और लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित, साहित्य और संस्कृति की पत्रिका “परिंदे” का अवैतनिक संपादन।
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सशक्त कहानी है। कहीं से यह नहीं लग रहा कि अनुवाद पढा है। अद्भुत लय है कहानी में। असंख्य दर्द की लहरें हृदय को आंदोलित कर देती हैं। समाज मे स्त्रियों की दशा को हु ब हु लिख दिया है। बहुत बधाई।
शुक्रिया आबो हवा।
बेहतरीन अनुवाद। सशक्त नारी संघर्ष की अभिव्यक्ति। प्रवाहपूर्ण, मर्मस्पर्शी