मोहिनी माथुर, राजेंद्र माथुर, mohini mathur, rajendra mathur, rajesh badal
7 जनवरी 2026 को श्रीमती मोहिनी माथुर को देहावसान हो गया। ख्यातिनाम पत्रकार, लेखक राजेंद्र माथुर की जीवनसंगिनी श्रीमती माथुर अध्यापक एवं साहित्यसेवी के रूप में अपनी यादें छोड़ गयी हैं...
स्मरण राजेश बादल की कलम से....

आंटी का जाना

            कुछ समय पहले ही उनसे बात हुई थी। राजेंद्र माथुर जी का बचपन अपने मामाजी के जिस घर में बीता था, वहाँ हज़ारों किताबें थीं। पंद्रह सोलह बरस की उम्र में उन्होंने सारी किताबें घोंटकर पी ली थीं। आंटी यानी श्रीमती माथुर की बड़ी इच्छा थी कि यह सारी किताबें भोपाल के सप्रे संग्रहालय को भेंट कर दी जाएँ और वहाँ राजेंद्र माथुर दीर्घा बनायी जाये। सप्रे संग्रहालय के संस्थापक संयोजक विजय दत्त श्रीधर इसके लिए तैयार भी थे। एक बार उन्होंने इस सिलसिले में बात की थी। फिर आंटी ने मुंबई में रह रहे माथुर जी के मामाजी के परिवार वालों से मेरी बात करवायी। सब कुछ ठीक चल रहा था कि वे अपने आख़िरी सफ़र पर चली गयीं। उनकी इच्छा अधूरी रह गयी।

बीते दिनों जब मैं उनसे मिलने गया था तो उन्होंने बताया था कि माथुर जी और वे 1955 के आसपास पुणे के यरवदा जेल गये थे, जहाँ गांधी जी ने अंतिम कारावास काटा था लौटकर माथुर जी ने एक छोटी किताब लिखी थी: महात्मा गांधी का आख़िरी कारावास। आंटी चाहती थीं अगर कहीं यह किताब मिले तो उसका पुनः प्रकाशन किया जाये। मैंने उनसे वादा किया कि शीघ्र ही मैं उस किताब को खोज निकालूंगा। इसके बाद मैं जिन जिन शहरों में जाता, वहां के पुस्तकालयों और गांधी भवनों में किताब को खोजता। दो साल भटकता रहा। आख़िरकार मुझे एक पुस्तकालय में मिल गयी। मैंने उनको व्हाट्सऐप पर इसके मुखपृष्ठ की फ़ोटो भेजी। वे एकदम बच्चों की तरह प्रसन्न हो गयीं। हम लोगों ने तय किया कि माथुर जी ने महात्मा गांधी पर जितने आलेख लिखे हैं, उनको शामिल करके एक बड़ी किताब प्रकाशित की जाये। मैंने प्रवासी प्रेम पब्लिकेशंस के मालिक और लेखक पंकज चतुर्वेदी से बात की। पंकज भी तुरंत तैयार हो गये। इरादा था इस बरस चार छह महीने में यह किताब ले आएंगे। पर, उनकी यह इच्छा भी अधूरी रह गयी।

अलबत्ता उनकी एक इच्छा मैं पूरी कर सका था। नईदुनिया के 1965 के दीवाली अंक में माथुर जी ने कश्मीर पर एक विस्तृत खोजी आलेख लिखा था। यह लगभग पूरे टैबलॉयड आकार के क़रीब पंद्रह पन्नों में था। यह कहीं उपलब्ध नहीं था। नई दुनिया की लाइब्रेरी तो पहले ही स्वर्गवासी हो चुकी थी। मैं उस अंक की खोज में जुट गया। लगभग छह महीने बाद मैंने उसे सप्रे संग्रहालय में डॉक्टर मंगला अनुजा के सहयोग से खोज लिया। संग्रहालय का नियम है ऐसे आलेख दिये नहीं जाते इसलिए मैंने मोबाइल पर उसके फोटो खींचे और एक टाइपिस्ट से अनुरोध किया कि वह इस फोटो से टाइप कर दे। इस तरह मेरी पुस्तक ‘सदी का संपादक राजेंद्र माथुर’ में कोई 30 पन्नों में यह दुर्लभ दस्तावेज़ शामिल हो गया।आंटी बहुत प्रसन्न थीं। इससे पहले मेरी एक अन्य पुस्तक शब्द सितारे में भी माथुर जी पर एक लंबा आलेख भी उन्हें पसंद आया था। पिछली बार बात हुई तो मैंने उन्हें बताया कि 45 साल पहले के बहुचर्चित छतरपुर पत्रकार उत्पीड़न मामले पर मेरी किताब आने ही वाली है। इसमें माथुर जी का अनेक बार उल्लेख है। उनके लिखे संपादकीय भी हैं। यह किताब छप गयी। मैंने उन्हें सूचित किया तो बोलीं कि अब आओ तो लेते आना। किताब तो आ गयी, लेकिन मैं मिलने नहीं जा पाया। मैंने सोचा कि मेरी एक और किताब साहिर लुधियानवी के ज़िंदगीनामे पर आ रही है, तो वह भी छप कर आ जाये तब दोनों किताबें एक साथ भेंट कर दूंगा। साहिर के बहुत सारे गीत उन्हें याद थे। अमृता प्रीतम उनकी प्रिय लेखिकाओं में से एक थीं। अफ़सोस! मैं उन्हें दिया गया यह वादा पूरा नहीं कर सका।

आज जब वे ख़ामोशी की नींद में हैं तो मेरे सामने यादों की फ़िल्म चल रही है। पैंतालीस बरस पहले निपट देहाती और गवार लड़के राजेश बादल को नई दुनिया में सह संपादक के लिए माथुर जी ने चुन लिया था। पहले दूसरे दिन ही मुझे कुलदीप नैयर का एक आलेख उन्होंने हिंदी अनुवाद करने के लिए दिया था। मेरी अंग्रेज़ी कमज़ोर थी। माथुर जी ने कहा कि रोज़ मेरे घर आओ तो मैं तुम्हें अंग्रेज़ी पढ़ाऊंगा। मैं सुदामानगर के कमल किराना स्टोर से रोज़ सुबह किराये की साइकल लेता और ब्रुक बॉन्ड कॉलोनी तक जाता। वहाँ माथुर जी मुझे अंग्रेज़ी पढ़ाते। तब मैं आंटी से डरता था। वे गंभीर और कुछ कुछ रिज़र्व रहती थीं। वे भी अंग्रेज़ी की अच्छी प्राध्यापिका रह चुकी थीं। कभी माथुर जी व्यस्त होते तो वे मुझे पढ़ाया करती थीं। क्या आज के ज़माने में कोई भरोसा करेगा कि किसी सहयोगी को उसके प्रधान संपादक और उनकी पत्नी अंग्रेज़ी पढ़ाया करते थे।

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जब 9 अप्रैल 1991 को माथुर जी अचानक अपनी अनंत यात्रा पर चले गये तो आंटी गुमसुम रहने लगी थीं। वे गांधी के सिद्धांतों को बहुत मानती थीं इसलिए गांधी स्मृति जाकर कमज़ोर वर्ग के बच्चों को पढ़ाया करती थीं। लेकिन कुछ समय से यह बंद करना पड़ा था। उसकी कहानी फिर कभी लिखूंगा। जब 1992 में हमने राजेंद्र माथुर जी के निधन के बाद भोपाल के पत्रकार भवन में स्मृति कार्यक्रम किया तो उसमें वे आयी थीं। उस कार्यकम में वे काफी भावुक हो गयी थीं। उन्होंने कहा था, “राजेश मुझे अब ऐसे कार्यक्रमों में मत बुलाया करो”। मैंने फिर कभी उनसे आग्रह नहीं किया लेकिन 2009 में जब मैंने माथुर जी पर एक डॉक्यूमेंट्री बनायी तो इसका पहला प्रदर्शन इंदौर के प्रेस क्लब में हुआ था। इसमें भी वे आ गई थीं। उन्हें फ़िल्म बहुत पसंद आयी थी। इस कार्यक्रम में भी उन्होंने कहा था कि माथुर जी की स्मृति में होने वाले आयोजनों में मत बुलाया करो। मैं ख़ुद को संभाल नहीं पाती। इसके बाद मैंने उनसे कभी अनुरोध नहीं किया। दिल्ली प्रवास में वर्षों तक उनसे मुलाक़ातें होती रहीं।

दुःख की घड़ी है। क्या कहूं। शाम को जब बिटिया मेहा का फ़ोन आया तो एकबारगी यक़ीन नहीं हुआ। लेकिन सच तो सच है। मैं उनमें राजेंद्र माथुर जी की छवि देखता था।अब कौन मुझे राजेंद्र माथुर जी से जोड़कर रखेगा? आंटी अलविदा! माथुर जी भी आपके आसपास कहीं होंगे। मेरा अंतिम प्रणाम।

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राजेश बादल

राज्यसभा टीवी के पूर्व कार्यकारी निदेशक के रूप में ख्यातिप्राप्त। चार दशक से अधिक समय से रेडियो, टीवी, प्रिंट व डिजिटल पत्रकारिता में चर्चित हस्ताक्षर। सौ से अधिक वृत्तचित्रों के निर्माण, टीवी पत्रकारिता में व्यवस्थित बायोपिक एवं पत्रकारिता की अनेक पुस्तकों के लिए प्रशंसित। पत्रकारिता के लिए महत्वपूर्ण सम्मानों से सम्मानित।

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