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स्मरण निशांत कौशिक की कलम से....

ज्ञानरंजन - उम्र भर सफ़र

           ज्ञानरंजन (21 नवंबर 1936-7 जनवरी 2025) का 90 वर्ष की आयु में जबलपुर में निधन हो गया। इतने बड़े व्यक्तित्व के आसपास अधिकतम बातें और स्मृतियाँ अक्सर मिली-जुली आवाज़ें लिए रहती हैं। एक पूरी पीढ़ी या पीढ़ियाँ, “पहल” पढ़ती हुई और उसमें प्रकाशित होते हुए बड़ी हुईं; कवि-लेखक मित्रगण जो इसमें छपे, पहचाने गए, चर्चित हुए- बहुत सारे प्रिय कवि-लेखक इसी के रास्ते हम तक पहुँचे।

“पहल” का प्रकाशन और ज्ञानरंजन जी का इलाहाबाद से जबलपुर तक का सफ़र, पढ़ने-पढ़ाने से लेकर कॉफ़ी हाउस में उनकी बैठकों तक- यह सब ख़ाका न जाने कितने लोगों के पास, देश-परदेस में, कितने क़िस्सों में बिखरा होगा। अनुभवों का यह कोलाज, जिसे कोई बुनता है, न पूरी तरह सबका ही होता है, न पूरा ख़ुद का। ज्ञान जी मुझे यूँ ही याद आते हैं। वे “पहल” के संपादक रहे, साठोत्तरी कहानी के नायकों में प्रमुख, प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव और एक शानदार गद्यकार।

संपादक सिर्फ़ वह नहीं होता जो चुनता है; वह भी होता है जो बहुत कुछ रद्द करता है। और इन दोनों ही प्रक्रियाओं में वह लेखन के बहुत बड़े स्पेक्ट्रम और रुजहानों से परिचित होता है। जहाँ वह हाथ रखता है, वहाँ नब्ज़ होती है। ज्ञानरंजन की ट्रेनिंग जिन पत्रिकाओं, लोगों, पुस्तकों और मानकों के बीच हुई, “पहल” के प्रति उनका अनुशासन भी उसी की देन था। वे ख़ुद को “संस्कृतिकर्मी” भी कहा करते थे। मैं कई लिहाज़ से “पहल” के सामने इतना नया हूँ कि मेरी उम्र में कुल पढ़े गए अंक भी पहले छप चुके अंकों से कम होंगे, इसलिए “पहल” पर टिप्पणी या आकलन मेरा विषय नहीं।

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सन 2008 में मैं महज़ 18 साल का था। मैंने कॉफ़ी हाउस, जबलपुर में ज्ञानरंजन जी से पूछा- “आपने तो फ़िराक़ को देखा होगा?” वे बोले- “देखा है? हमारी उनसे झड़पें और बहसें हुई हैं, घंटों।” जिस उम्र में मैंने उनसे यह पूछा था, उस समय मैं वही पढ़ रहा था जिसे काफ़ी हद तक ‘गेटवे लिटरेचर’ कहा जाता है- राग दरबारी, सुधा-चंदर और दिनकर। ज्ञान जी ने बताया कि धर्मवीर भारती उनके शिक्षक थे।

फिर वर्षों गुज़रे और मेरी पढ़ाई तथा ‘एक्सपोज़र’ में भी बदलाव आया। मैं उनका लिखा और उपलब्ध लगभग सब कुछ पढ़ चुका था और “पहल” का नियमित पाठक रहा। फिर भी हर मुलाक़ात में हैरतअंगेज़ जानकारियाँ रिसती रहती थीं। जिन चीज़ों के बारे में मुझे लगता था कि मुझे सौ फ़ीसदी जानकारी है, उनमें भी वे ऐसा कोई पैबंद जोड़ देते थे जो उन्हें मेरे लिए पहले से भी ज़्यादा रहस्यमय बना देता था। उनकी यह थाह मेरे लिए प्राथमिक आकर्षण थी।

उनकी कहानी “अनुभव” में किरदार वापस अपने शहर आता है और वह जगह या वे स्थितियाँ ढूँढता है, जहाँ से वो शहर में घुसना शुरू करे। मैं ज्ञान जी की कहानियों, बातों और चर्चाओं में वही सिरा ढूँढता रहता था, जहाँ से उनके समय और उस मेधा से अधिकतम साबक़ा हो और मैं कुछ हासिल कर सकूँ। जैसे यह क़िस्सा कि पलाश कृष्ण मेहरोत्रा के एक अंग्रेज़ी कथा-संग्रह, जो मैंने नया-नया उन दिनों पढ़ा था, उसके बारे में मैंने उन्हें मिलते ही उत्साह से बताया। उसे प्रेम से सुनकर उन्होंने जोड़ा कि पलाश के पिता अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा उनके मित्र हैं और “तारामंडल के नीचे एक आवारागर्द” का अंग्रेज़ी अनुवाद उन्होंने इलाहाबाद पर केंद्रित कुछ निबंधों की एक पुस्तक The Last Bungalow: Writings on Allahabad में संकलित किया है। मेरे लिए यह जानकारी बहुत मायने रखती थी और इसने बहुत दिलचस्प पहलू मेरे सामने खोल दिये थे।

वे वॉल्टर बेंजामिन और बर्गसाँ पर जितनी संजीदगी से बात करते थे, उतनी ही दिलचस्पी से उन्होंने मुझे पाउलो कोएल्हो के उपन्यास By the River Piedra I Sat Down के बारे में बातें बतायीं। एक साक्षात्कार में, जब किसी ने क्लीशे-सा सवाल पूछा कि साहित्य समाज का आईना होता है, तो उन्होंने टोककर कहा कि अब समाज के बहुत-से आईने हैं। यह इशारा था कि वे नये माध्यमों के प्रति खंडित या उपेक्षित दृष्टि नहीं रखते थे। इसी बीच याद आया कि “पहल” पत्रिका में “बाज़ार में एक दार्शनिक” नाम से वॉल्टर बेंजामिन पर निबंध-अनुवाद उन्होंने प्रकाशित किये।

ज्ञान जी सावधान लेखक थे। फ़िलिप रॉथ ने कहा था जब तक मैं उन्हें लिख न लूँ, ख़ुद के विचारों को देख और अपना नहीं पाता हूँ। जबलपुर में एक थियेटर फ़ेस्टिवल में पाँच कवियों की जन्मशती पर उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्होंने पाँचों दिन लिखकर बोला और कमाल लिखा। वे जितने सावधान पाठक थे, उतनी ही सावधानी से लिखते थे। उनकी भाषा चाक-चौबंद थी। कविता के संजीदा पाठक होने के बावजूद उनके गद्य का उत्स कविता से नहीं आता और न उसमें कोई भाषाई पांडित्य है। लेकिन उसका प्रवाह ऐसा है जैसे वहाँ कोई और वाक्य संभव ही नहीं था, कोई और शब्द नहीं हो सकता था। उनकी कहानियों में, ख़ासकर “अनुभव” और “रचना प्रक्रिया” में, यह सबसे ज़्यादा दिखायी देता है।

ज्ञान जी ब्रेख़्त के मुरीद पाठक थे; वे ब्रेख़्त के जीवन और वाक्यों को बार-बार दोहराते थे। जीवन का शायद इससे कोई सख़्त या ऊँचा आदर्श पैदा कर सकने का यह उनका ढंग होगा। कुछ दस बरस पहले का उनका एक वाक्य मुझे याद है- वे हेमिंग्वे के उपन्यासों के पात्रों की तरह जीना चाहते हैं, ख़ासकर ओल्ड मैन एंड द सी के सैंटियागो की तरह, जिसकी आँखों में समंदर जैसा नीलापन है। आख़िरी दिनों में उनकी आवाज़ में कम्पन उतर चुका था, जीभ सूखती थी, लेकिन कोई आग हमेशा जलती दिखती थी आँखों में, जिसका नीलापन आख़िर तक दिखायी देता रहा।

अलविदा ज्ञानरंजन जी।

nishant

निशांत कौशिक

1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।

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