
- January 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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प्रतिरोध पंकज निनाद की कलम से....
समर शेष है... और चुप्पी विशेष?
विगत 7 जनवरी को बिलासपुर में गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में ‘समकालीन हिंदी कहानी: बदलते संदर्भ’ विषय पर एक संवाद आयोजित किया गया, जिसे राष्ट्रीय स्तर का प्रचारित किया गया। इस आयोजन में विश्वविद्यालय और साहित्य अकादमी द्वारा देश के प्रमुख कहानीकारों- मोहनलाल छीपा, जया जादवानी, जयनंदन, मीना गुप्त, मुन्ना तिवारी, महेश कटारे को आमंत्रित किया गया था।
पहले सत्र में कुलपति आलोक चक्रवाल अपना उद्बोधन दे रहे थे। उनके उद्बोधन की गाड़ी मुद्दे की सड़क से उतरकर अपनी यादों की गलियों में विचरते हुए यहां-वहां के लतीफ़े सुनाने लग गयी थी। मुखिया के लतीफ़ों पर हँसना मातहतों की मज़बूरी है और शायद शिष्टाचार भी। लिहाज़ा वहां बैठे छात्र और प्राध्यापक मजबूरन हँस रहे थे। पर सामने सोफ़े पर बैठे आमंत्रित साहित्यकार संवाद के विषय विशेषज्ञ थे। इस तुच्छ शिष्टाचार की उन पर कोई बाध्यता नहीं थी। लिहाज़ा वह बोर हो रहे थे।
बोर आदमी की ख़ासियत है कि उसके पास बोलने को कुछ नहीं होता फिर भी बोलता है। कुछ लोग इतने विद्वान होते हैं कि किसी भी मुद्दे पर धाराप्रवाह बोल सकते हैं। कुछ इतने वाचाल होते हैं कि उनको बोलने के लिए मुद्दे की आवश्यकता ही नहीं होती। “वक्ता जब बिना तैयारी के किसी सभा में जाता है, तो वह बोलता नहीं बकता है।”
एक पत्रकार वार्ता में नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त अमेरिका के 28वें राष्ट्रपति वुडरो विल्सन से एक पत्रकार ने पूछा- “राष्ट्रपति महोदय, आप अपने भाषणों की तैयारी कैसे करते हैं?” विल्सन ने मुस्कुराते हुए कहा- “यह भाषण की लंबाई पर निर्भर करता है। यदि मुझे दस मिनट बोलना हो, तो मुझे एक सप्ताह की तैयारी चाहिए। पंद्रह मिनट बोलना हो, तो तीन दिन और यदि एक घंटे का भाषण देना हो, तो मैं अभी तैयार हूँ।”
वो ज़माना और था तब भाषणों में मुद्दे होते थे जुमले नहीं। जिस मुल्क में शीर्ष पदों पर नेताओं की जगह दोनों हाथों डमरू बजाते मदारियों ने ले ली हो, वहाँ आयोजनों के नाम पर सिर्फ़ तमाशे होते हैं। मुद्दे तो यहाँ एक अर्से से गायब हैं इसलिए अब वक्ताओं की जगह मजमेबाज़ों ने ले रखी है।
असल विद्वान व्यक्ति बहुत विनम्र और अहंकारहीन होता है। विद्वत्ता गहरे पानी की तरह शांत होती है। पर उथले पानी में जल्दी उफान आ जाता है। आलोक चक्रवाल जैसे सतही व्यक्ति से विनम्रता की उम्मीद ही क्या करना? जिस व्यक्ति के मुँह खुलते ही उसका दिमाग़ भी खुल जाये, उसकी विद्वत्ता पर क्या ही कहना? चूँकि वह विषय-विशेषज्ञ नहीं थे, तो मुद्दे से कोसों दूर थे। बोलते हुए उनकी निगाह बार-बार सामने सोफ़े पर बैठे विद्वानों पर जा रही थी।
किसी संगीतकार के सामने कोई ग़लत तार छेड़ दे तो जो इरिटेशन संगीतकार को होती है वही वहां बैठे वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा भी महसूस कर रहे थे। कुलपति ने बोलना बीच में छोड़ उनसे पूछ लिया- “आप बोर तो नहीं हो रहे कहीं?” कुलपति ने सोचा होगा, सवाल सुनकर मनोज रूपड़ा दांत निपोरते हुए हैं-हैं करेंगे, लेकिन उन्होंने कह दिया- “आप मुद्दे पर आइए।” यह तो बड़ा अप्रत्याशित जवाब था। जीवन भर उन्होंने सिर्फ़ चरण चुंबन ही किया था इसलिए दूसरों से भी उनकी यही उम्मीद थी लेकिन यहां तो उल्टा ही हो गया। हमारी ही सल्तनत में आकर यह अदना-सा लेखक हमको ही आँख दिखा रहा! उनके अहंकार का उथला नाला तुरंत उफान मार गया।
मेज़बान की मर्यादा को तार-तार करते हुए उन्होंने मनोज रूपड़ा को भरी सभा में अपमानित कर सभा से चले जाने को कह दिया। मनोज रूपड़ा अपने स्वाभिमान को बचाते हुए चुपचाप उस सभा से चले गये। और मुंह ताकती रह गयी ‘अतिथि देवो भव:’ की वह ‘सनातनता’, जिसे कुलपति ने तार-तार कर डाला।

यह पूरा दृश्य अत्यंत विचलित कर देने वाला था। उससे भी ज़्यादा विचलित करने वाला दृश्य था कि वहां उपस्थित तमाम बुद्धिजीवियों का विचलित न होना। जो अपनी बिरादरी के साथ खड़े नहीं होते वो समाज के लिए क्या खड़े होंगे? उनके रीढ़विहीन, लिजलिजे व्यक्तित्व ने पूरी लेखक बिरादरी को कलंकित किया। जैसे घोंघा अपनी चिपक नहीं छोड़ता यह भी कुर्सी से चिपके रहे। इनको ज़रा बाद में गरियाता हूँ पर ज़रा मैं भी मुद्दे की बात कर लूँ।
विश्वविद्यालय कोई भवन नहीं, समाज की बुद्धि, संवेदना और दर्शन का गर्भस्थान है, जहाँ संवाद, असहमति और स्वतंत्र चिंतन से देश का भविष्य आकार लेता है। यहाँ छात्र केवल नौकरी नहीं, नागरिकता और नैतिक साहस सीखते हैं; और शिक्षक अध्यापक भर नहीं, बौद्धिक उत्प्रेरक होते हैं। विश्वविद्यालय की आत्मा तभी जीवित रहती है जब सवालों का स्वागत हो और असहमति को विद्रोह नहीं समझा जाये। इसी आत्मा को अर्थ और ऊँचाई देता है साहित्य… क्योंकि इतिहास तारीख़ें दर्ज़ करता है, पर साहित्य उन तारीख़ों के भीतर धड़कती मानवीय पीड़ा, करुणा, संघर्ष और चेतना को शब्द देता है। साहित्य राजनीति को नैतिकता से, समाजशास्त्र को मनुष्य की वास्तविकता से और दर्शन को धरातल से जोड़ता है। यही साहित्यिक आयोजन छात्रों को सिखाते हैं कि ज्ञान केवल सूचना नहीं, बल्कि संवेदना, विवेक और आत्ममंथन का समन्वय है। इन मूल्यों के कारण ही विश्वविद्यालय की सार्थकता है- वरना ग्रैजुएट तो इंसान पत्राचार से भी हो सकता है। और इन्हीं मूल्यों के बग़ैर हुई शिक्षा का अंजाम यही होता है कि चतुर्थ श्रेणी के एक पद की भर्ती के लिए पीएच.डी. डिग्रीधारियों के आवेदन सैकड़ों या हज़ारों की संख्या में आते हैं।
एक स्वस्थ लोकतंत्र बिना विपक्ष के संभव नहीं। यदि हालत आज जैसी हो जाये कि विपक्ष बिल्कुल नगण्य हो जाये तब विपक्ष की भूमिका साहित्य की होती है। पर जब साहित्यकार सम्मान, पद और पैसों की ख़ातिर सत्ता के सामने अपनी रीढ़ गिरवी रख देता है, तो समाज का विश्वास खो देता है। उसके साहित्य की सत्यता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। उस दिन उन तमाम बुद्धिजीवियों की कलई खुल गयी, जो इस अपमानजनक घटना के बाद भी कुर्सी से चिपके बैठे रहे। उस दिन सबने मिलकर एक साथ थूक भी दिया होता, तो बह जाता उस कुलपति का सारा अहंकार।
उस आयोजन में शामिल एक वरिष्ठ कथाकार की तस्वीर इन दिनों बड़ी वायरल है, जिसमें वे मूँछों पर ताव देते हुए दुनाली की नली साफ़ कर रहे हैं। पता नहीं उस दिन उनकी उस मर्दानगी को क्या हो गया? उनसे सिर्फ़ इतना कहूँगा — उस दिन दुनाली में गोली की जगह आप अपने मुँह में थूक ही भर लेते तो आज संसार आप पर नहीं थूक रहा होता।
किसी ने सही कहा है चंबल में सिर्फ बाग़ी ही नहीं होते, लुटेरे भी होते हैं।
“समर शेष है/नहीं पाप का भागी केवल व्याध/जो तटस्थ हैं/समय लिखेगा उनके भी अपराध”, दिनकर की कविता की ये पंक्तियां इस पूरे परिदृश्य के लिए कितनी मौज़ूं हैं। दिनकर की इन्हीं पंक्तियों पर आधारित एक कहानी का भी शीर्षक (समर शेष है) है, क्या विडंबना है कि उसके लेखक हैं एक अधिकारी के सामने चुप रह गये वही वरिष्ठ कथाकार!

पंकज निनाद
पेशे से लेखक और अभिनेता पंकज निनाद मूलतः नाटककार हैं। आपके लिखे अनेक नाटक सफलतापूर्वक देश भर में मंचित हो चुके हैं। दो नाटक 'ज़हर' और 'तितली' एम.ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में भी शुमार हैं। स्टूडेंट बुलेटिन पाक्षिक अख़बार का संपादन कर पंकज निनाद ने लेखन/पत्रकारिता की शुरूआत छात्र जीवन से ही की थी।
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