
- January 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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विजय कुमार स्वर्णकार की कलम से....
हिन्दी ग़ज़ल में दृश्य चित्रण की बानगी-2
पिछले भाग में हमने कुछ ऐसे अशआर की पड़ताल की जिनमें दृश्य चित्रण प्रमुख है और कथ्य भी तग़्ज़्ज़ुल से भरपूर है। आइए कुछ और महत्वपूर्ण शेर देखते हैं:
न तो ऑटो न ही रिक्शे दिखायी दे रहे थे
सड़क पर पांव ही चलते दिखायी दे रहे थे
-कमलेश भट्ट कमल
यह शे’र दृश्य चित्रण का एक भिन्न उदाहरण है। अगर शाइर खड़ा होता या किसी इमारत से यह दृश्य देखता तो शायद वह नरमुंड की बात करता। यह शहर की सड़क का चित्र है अन्यथा ऑटो और रिक्शों की बात नहीं आती। यह घटना भूतकाल की है और शाइर ने स्मृति के कोष से निकालकर दृश्य को बाद में चित्रित किया है। आइए इसके तग़ज़्ज़ुल की पड़ताल करते हैं। शहर में कोई अनहोनी घटना हुई थी। लोग झुंड बनाकर चले जा रहे थे।सड़क पर कोई वाहन नहीं था या उनके लिए जगह नहीं थी। यह भी हो सकता है कि झुंड के लोगों को वाहन उपलब्ध ही नहीं थे। सड़क किनारे शाइर की तरह लोग थके-मांदे या घायल अवस्था मे पड़े थे और लोग फिर भी चले जा रहे थे। यह दृश्य याद करने का कारण क्या है, यहीं तग़ज़्ज़ुल है। व्यवस्था इतनी चरमरा गयी कि निरीह जनता किसी भरे-पूरे शहर से गुज़र रही थी और कोई उनकी मदद को आगे नहीं आ रहा था। शे’र में किसी तत्कालीन त्रासदी की ओर सीधे इशारा न करके शे’र के स्थापित मानक का ध्यान रखा गया है।
पेड़ थे कुछ, थी तेज़ कुल्हाड़ी आरा था
जंगल चुप था और भला क्या चारा था
-नवनीत शर्मा
पिछले कुछ समय से जंगल में मनुष्य की भूमिका किसी आततायी से कम नहीं है। इस दृश्य में उसी ज़ुल्म की दुर्निवार आशंका को चित्रित किया गया है। पेड़, कुल्हाड़ी, आरा और जंगल सभी प्रतीकात्मकता के बग़ैर भी पाठक पर सीधा प्रभाव डालने में सक्षम हैं। यह शे’र भी स्मृति में अंकित दृश्य का चित्रण है। दृश्य में उतना ही दिखाया गया है जितना स्थिति की गंभीरता को दिखाने के लिए आवश्यक है। यहाँ तक कि इस पूरी साज़िश का सरगना जो मनुष्य है वह भी चित्र में नहीं है। शे’र में भी उतना ही कहा जाता है जितने से ध्येय पूरा हो जाये और जितना कहा जाता है उससे कहीं अधिक छुपा रहता है या जानबूझकर छुपाया जाता है। कुल्हाड़ी का तेज होना और जंगल का चुप रहना भी लक्षित प्रभाव डालने में सफल हैं। शे’र में तग़ज़्ज़ुल भी भरपूर है। पेड़ किसी भी निरुपाय का प्रतीक है। कुल्हाड़ी और आरा किसी क्रूर के सहायकों का प्रतीक है। जंगल बेबस समाज और व्यवस्था का प्रतीक है। ‘और भला क्या चारा था’ से गहरी उदासी और क्षुब्धता का बोध होता है। लगता है जैसे किसी असहाय निहत्थे को हथियार बंद बदमाशो ने मौका ताड़कर घेर लिया हो और स्थिति को भांपकर सबका ख़ून ठंडा हो गया है। इस शे’र के संकेत बहुत व्यापक हैं। ‘चारा’ शब्द का उपयोग बड़ी चतुराई से किया गया है। जंगल, पेड़ और चारा, ये शब्द आपस मे मुनासिबत रखते हैं।
ये पत्तियों पे जो शबनम का हार रक्खा है
न जाने किसने गले से उतार रक्खा है
-के.पी. अनमोल
वाह, क्या दृश्य है! कुछ पत्तियाँ और उन पर ओस की बूंदों की लड़ी, बस यही चित्र है लेकिन शाइर ने इसे शेर में जैसे बांधा है वह अविस्मरणीय है। शाइर भी जानता है कि यह ओस की बूंदें ही हैं लेकिन अपनी छेड़ को सूफ़ियाना लहजा देते हुए पूछ रहा है न जाने किसने गले से उतारकर रख दिया है। सच जानते हुए भी अनजान बनकर बात रखने की शैली की बानगी है यह शे’र।
मैं सूटकेस पकड़कर खड़ा रहा यारो
कि बस चली गई सारी सवारियाँ लेकर
-ज्ञानप्रकाश विवेक
ऐसा क्या है इस चित्र में जो इसे विशिष्ट बनाता है। बस आयी और उसकी ओर सारे लोग भागे। ये वे लोग थे जिन्हें केवल अपने गंतव्य पर पहुँचने की चिंता थी। इनमें मज़दूर, कारीगर, चौकीदार, स्कूल के बच्चे आदि होंगे। लेकिन यह व्यक्ति जो सूटकेस के साथ है, इसे अपनी कमीज़ के मोह और दूसरों की तमीज़ से घृणा ने इस भीड़-भाड़ वाली बस में एक आम आदमी की तरह यात्रा करने से रोक लिया। ‘बस में सवारियां चली गईं’ में यह भी छुपा है कि व्यवसायिक या अन्य कारणों से बस वाले के लिए और यहाँ तक कि यात्रियों के लिए भी आदमी आदमी नहीं रह जाता, केवल सवारी बन जाता है। एक आंकड़ा बन जाता है। सूटकेस प्रतीक है उस आभिजात्य का जो हमें आम जन-जीवन का हिस्सा बनने से रोकता है। सूटकेस पकड़ने की अकड़, बस पकड़ने के लिए आवश्यक चपलता और स्ट्रीट स्मार्टनेस का विकल्प नहीं हो सकती।
हिन्दी ग़ज़ल में जनजीवन और प्रकृति के एक से बढ़कर एक चित्र उपस्थित हैं। ये चित्र अपने पीछे गहरे अर्थ लिये हुए हैं। ये अशआर हमें आश्वस्त करते हैं कि हिन्दी ग़ज़ल का यह आयाम भी चित्ताकर्षक और अनूठा है।

विजय कुमार स्वर्णकार
विगत कई वर्षों से ग़ज़ल विधा के प्रसार के लिए ऑनलाइन शिक्षा के क्रम में देश विदेश के 1000 से अधिक नये हिन्दीभाषी ग़ज़लकारों को ग़ज़ल के व्याकरण के प्रशिक्षण में योगदान। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग में कार्यपालक अभियंता की भूमिका के साथ ही शायरी में सक्रिय। एक ग़ज़ल संग्रह "शब्दभेदी" भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित। दो साझा संकलनों का संपादन। कई में रचनाएं संकलित। अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
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