जल-जंगल-ज़मीन-हवा और हम
पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से...

जल-जंगल-ज़मीन-हवा और हम

       जल, जंगल, ज़मीन और हवा के सवाल आज जीवन और अर्थव्यवस्था की धमनियों के प्रश्न बन गये हैं। पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज ने स्पष्ट किया है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण मौसमी चक्र बदल रहे हैं, अतिवृष्टि और सूखा दोनों की तीव्रता बढ़ रही है और यह बदलाव सीधे तौर पर नदियों के प्रवाह, जल भंडारण और खेतों की सिंचाई क्षमता को प्रभावित कर रहा है।

हमारे देश में इस बदलाव को स्पष्ट देखा जा सकता है। नदियों की सफ़ाई के कई प्रयासों के बावजूद 645 नदियों में से सैकड़ों हिस्सों में प्रदूषण चिंताजनक स्तर पर है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि 271 नदियों के 296 हिस्सों में पानी ऐसे स्तर पर पहुँचा है जहाँ स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी और दैनिक उपयोग पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। गंगा, यमुना जैसी प्रमुख नदियाँ जहाँ धार्मिक और आर्थिक जीवन की रीढ़ हैं, वहीं इनकी जल गुणवत्ता की गिरावट पारंपरिक उपयोग और जैव विविधता दोनों के लिए ख़तरनाक संकेत है।

ज़मीन की उपजता पर ख़तरा नये-नये रूप ले रहा है। औपचारिक शोध और सर्वे बताते हैं कि भारत के बड़े हिस्से में मिट्टी का कटाव तेज़ी से बढ़ा है। कुछ अध्ययनों का अनुमान है कि प्रति हेक्टेयर औसत मिट्टी क्षरण दर कई टन प्रतिवर्ष है और देश का एक बड़ा हिस्सा गंभीर कटाव के प्रभाव में है। खेती के तरीक़ों में परिवर्तन, नदियों की घाटियों में निर्माण, पहाड़ी कटाव और अत्यधिक वर्षा की घटनाओं का संयोजन मिट्टी की ऊपरी सतह को क्षरित कर रहा है, जिससे जैविक कार्बन और खेतों की दीर्घकालिक उपजाऊ शक्ति प्रभावित हो रही है। उपजाऊ मिट्टी ही खेत की ताक़त होती है।

कृषि में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित प्रयोग से तात्कालिक उत्पादन बढ़ा पर दूसरी तरफ़ ज़मीन और भूजल दोनों को रासायनिक प्रदूषण का मुफ़्त उपहार दिया है। रिपोर्टों और आँकड़ों के अनुसार उर्वरक की खपत में वृद्धि जारी है और 2023-24 में कुल खपत के आँकड़े लाखों टन में दर्ज हैं, जिसके प्रभाव मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की कमी, नाइट्रेट और फ़ॉस्फ़ेट के घुलाव द्वारा भूजल में प्रदूषण और जल तंत्रों में पोषक तत्व के संकट के रूप में सामने आ रहे हैं। यही पोषक तत्व नदियों और जलाशयों में जाकर अल्गल ब्लूम का कारण बनते हैं, जिससे डाइऑक्सीजनीकरण और जलीय जीवन का विनाश होता है। उर्वरक की खपत और वितरण नीति पर तत्काल पुनर्विचार न हुआ तो अगली पीढ़ियों को खेती की मिट्टी नहीं बल्कि रसायनों के अवशेष की भू सतह का सामना करना होगा।

भूजल का स्तर गिरना, कथा नहीं, वास्तविकता है जो आँकड़ों में दर्ज है। भूमि के भीतर छिपा वह पानी जो पीने, पीने योग्य बनाने और खेतों की सिंचाई के लिए दशकों तक भरोसे का स्रोत रहा, अंधाधुंध दोहन से कई हिस्सों में तेज़ी से घट रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड और समकक्ष आकलनों से पता चलता है कि कुछ क्षेत्रों में वार्षिक क्षरण और निकासी की दर पुनः रिचार्ज से अधिक है। हालांकि हाल के वर्षों में कुछ चैनल और प्रोजेक्टों से पुनर्भरण में आंशिक सुधार के संकेत मिल रहे हैं, पर व्यापक स्तर पर भूजल संकट अभी भी व्यापक है। औद्योगिक नीतियाँ पानी की मांग को कम करने और सतत प्रबंधन की दिशा में नहीं बदलीं तो शहरों और गांवों दोनों में पानी की उपलब्धता सामाजिक और आर्थिक तनाव की वजह बनेगी।

औद्योगिक विकास ने देश को तेज़ आर्थिक उछाल दिये, पर उसका पर्यावरणीय बिल भी अद्यतन होकर आया है। कच्चे तेल, कोल और रसायनों पर आधारित खपत और उत्पादन केंद्रों के पास वायु गुणवत्ता की बॉर्डर लाइन गिरना, जल निकासी में भारी धातुओं का मिश्रण और ठोस कचरे का असुरक्षित निपटान आसपास की ज़मीन और पानी को संक्रमित कर देता है।

समस्याएं और समाधान

औद्योगिक विकास के मॉडल को हरित प्रौद्योगिकी और सर्कुलर अर्थव्यवस्था की शर्तों पर न बांधा गया तो विकास सिर्फ़ एक संख्यात्मक उपलब्धि रहेगी पर जीवन की गुणवत्ता घटती जाएगी।

हम, यानी मनुष्य, इन समस्याओं के केंद्र में हैं और समाधान भी हमसे ही जुड़े हैं। मिट्टी की रक्षा के लिए खेती के नए तरीक़े, जैसे मूल रक्षा, मिल-जुल कर कवर क्रॉप्स, सीमांत वनरोपण और कटाव नियंत्रक संरचनाएँ आवश्यक हैं। उर्वरकों का बुद्धिमानी से उपयोग, जैविक खाद के विकल्पों को प्रोत्साहन और पोषक तत्वों के संतुलन की मॉनिटरिंग, भूजल और नदियों पर दबाव कम कर सकती है। औद्योगिक क्षेत्र में उत्सर्जन नियंत्रण, ट्रीटमेंट प्लांट की समयबद्ध क्षमता विकास और सत्यापन, तथा कचरा प्रबंधन की कठोर व्यवस्था शहरी हवा और जमीन की दशा सुधार सकती है। हम बड़े-बड़े सेमिनार या आधे-अधूरे उपायों से संतोष नहीं कर सकते, परिवर्तन चाहिए जिसमें कृषि, उद्योग, शहरी नियोजन और जल प्रबंधन एक दूसरे से जुड़े रणनीतियों के हिस्से हों।

नीति निर्माताओं के साथ-साथ स्थानीय समाज, किसान, उद्योगपति और नीति प्रवर्तक मिलकर तब तक भी स्थिति नहीं बदल पाएँगे जब तक जल, जंगल, ज़मीन और हवा को केवल संसाधन मानकर उपभोग मात्र करने का समाज का मनोवैज्ञानिक रुजहान नहीं बदलेगा। यह परिवर्तन आर्थिक प्रोत्साहनों, सामुदायिक शिक्षा और पारदर्शी आँकड़ों के माध्यम से लाया जा सकता है। उदाहरण के लिए जल पुनर्भरण और सीमा आधारित जल उपयोग नीतियों से भूजल में सुधार दिखा है, और नदियों के नज़दीकी बायो रेमिडिएशन तथा छोटे पैमाने पर सीवरेज निवारण से जल गुणवत्ता में स्थानीय सुधार हुए हैं। पर यह पर्याप्त नहीं है; राष्ट्रीय स्तर पर एक समन्वित, विज्ञान संचालित और जनता से जुड़े सतत अभियानों की आवश्यकता है।

प्रश्न विज्ञान और संस्कृति के

अंततः जल-जंगल-ज़मीन-हवा और हम का सवाल नैतिकता का भी है, यह मात्र तकनीकी समस्या नहीं है। यदि हम आज अपनी प्रकृति को छेड़ने लगातार अवांछित दोहन की अर्थनीति को जारी रखते हैं तो आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन के बुनियादी हवा, पानी और उपजाऊ ज़मीन के अधिकार सीमित कर देंगे। विज्ञान और नीति के आँकड़े स्पष्ट बता रहे हैं कि सुधार का समय सीमित है पर विकल्प मौजूद हैं। हमें अर्थात समाज, सरकार, तथा संयत्र को समन्वित स्वरूप में उन स्थाई सुधार के विकल्पों को अपनाने के लिए सामूहिक साहस और दीर्घकालिक दृष्टि की आवश्यकता है।

जिस तरह एक पेड़ की कटाई से हम उस स्थान पर ठंडी छाया और जीवों का आश्रय खो देते हैं, उसी तरह हर कुप्रबंधन की प्रक्रिया हमारी हवा, हमारे जल और हमारी ज़मीन से विकास के नाम पर कुछ न कुछ ले जाती है। यदि हम वापस देना सीख लें, यदि हम नीतियों में ज़िम्मेदारी और व्यवहार में संयम लाएँ, तो यह सब फिर से संतुलन की ओर लौट सकता है। समस्या केवल स्थानीय या अस्थाई नहीं, यह प्रणालीगत है और समाधान भी बहुस्तरीय होंगे। नीति निर्माताओं को चाहिए कि वैश्विक समरी, केंद्रीय संस्थाओं जैसे सीपीसीबी और सीजीडब्ल्यूबी के राष्ट्रीय आँकड़े, तथा कृषि और उद्योग के आचरण के वास्तविक आँकड़ों के आधार पर योजनाएँ बनाएं। साथ ही हर नागरिक को अपने स्तर पर समझना होगा कि जल, जंगल, ज़मीन और हवा के साथ हमारा रिश्ता केवल उपभोग का नहीं, पर संरक्षण और पुनरुत्पादन का भी है।

जैसा हमारी संस्कृति हमें सिखाती है, जिसमें वृक्ष, पहाड़, नदियां, पशु-पक्षी, प्रकृति सबको महत्व दिया गया है। उनके पूजन-अर्चन के माध्यम से पीढी दर पीढ़ी उनका महत्व समझाने की परंपरा डाली गयी है। यही संस्कार यदि आज हम सबमें निखर पाये तो हम अगली पीढ़ी को एक जीवंत, सांस लेने योग्य और उपजाऊ भारत दे पाएँगे।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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