
- January 19, 2026
- आब-ओ-हवा
- 4
रंगकर्मी आलोक चटर्जी को गये एक बरस हो गया। भवेश दिलशाद की यह टिप्पणी आब-ओ-हवा के अंक 19 में प्रकाशित हुई थी, जिसे प्रसंगवश यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।
आलोक चटर्जी: सिगरेट जो धुआं हो गयी
थोड़ी देर की आग कहानी उसके बाद धुआं और राख
पहले अपनी लौ है लगानी उसके बाद धुआं और राख
एक सुलगन, एक धुआं और धीरे-धीरे राख… सुना था कालजयी नाटकों में अदाकारी का हुनर साबित कर चुके थे, ख़ुद को स्थापित कर चुके थे। क़रीब दशक भर का परिचय रहा तो आलोक भाई के अभिनेता को (सिर्फ़ एक बार) मैंने भोपाल के रवींद्र भवन में ‘नटसम्राट’ में देखा था। श्रीराम लागू और नाना पाटेकर जिस भूमिका को अमर कर चुके, उसे जीना एक जोखम लेना ही था। इस जोखम के लिए आलोक भाई को हमेशा मैं सौ में से सौ दूंगा। नटसम्राट के एक दृश्य में, मंचन के तक़रीबन पौन घंटे बाद उन्होंने जेब से सिगरेट निकालकर सुलगायी। कश लगाते हुए ही सह-अभिनेता के संवाद सुने और अपने अदा किये। उनके शनासाई जानते हैं आलोक भाई को सिगरेट की तलब छूटती थी। अपरिचित दर्शकों को शायद उस दृश्य में उनका सिगरेट फूंकना ग़ैर-ज़रूरी न लगा हो, लेकिन बारीकबीं दर्शक को ज़रूरी भी न लगा होगा।
आलोक भाई को शायद पता नहीं था कि वह ख़ुद को सिगरेट बना चुके थे। किसी के जाने पर रिवायत है सब अच्छा-अच्छा कहा जाये, लेकिन रिवायती तो हमने शायरी भी नहीं की। अब उपयुक्त है या नहीं पर कहना है, उनके हयात रहते भोपाल या आस-पास के लोगों के साथ बातचीत में उनका ज़िक्र आता, पर कलाजगत से जुड़ा शायद ही कोई शख़्स मिला, जिसने ‘सिगरेट के इस धुएं’ के लिए चाव दिखाया, पैसिव स्मोकिंग एंजॉय करने की गवाही दी। आलोक भाई के बर्ताव के क़िस्सों के बरअक्स एक बात यह भी कि उनके कलाकार की अपनी शख़्सियत थी।
थिएटर में जो शख़्स किरदार-दर-किरदार निभाता है, उसी तरह जीवन के रंगमंच पर मुख़्तलिफ़ अदा होता रहता है। मैं जिन आलोक भाई से परिचित हुआ, अब सोचता हूं वह सिगरेट की तरह थे। कभी मन करता था कश लगाये जाएं। उन्होंने मेरी साहित्यिक पत्रिका में लिखने का अनुरोध स्वीकारा था, मेरे आयोजनों में आने को तत्पर थे, मुझसे एक लेख लिखवा रहे थे। ऐसी सिगरेट जिसके लिए होंठ ललचाते हैं।
फिर नाट्य निर्देशक आलोक भाई को कुछ जाना-समझा। अपने नाट्य विद्यालय के छात्रों को लेकर वह प्रसाद रचित ‘चंद्रगुप्त’ खेलने की योजना में थे। उन्हीं दिनों पत्रिका के सिलसिले में मेरा उनसे एक सिलसिला था। बातों-बातों में इस नाटक की बात हुई और फिर कुछ एक रीडिंग सेशन्स के बाद चाणक्य की भूमिका उन्होंने मुझे सौंपी। इस नाटक के दौरान गुज़रे दो-तीन महीनों के इस साथ में उनके अनेक रंग दिखे। फीके भी चमकीले भी। नाटकों के लिए अपनी अध्यापकीय समझ तो ख़ूब साझा करते पर ग्रांट मिलने के बावजूद किसी कलाकार को पाई तक नहीं देते। मंचन के अजीब जोखम उठाते, दादागिरी तक दिखाते। अभिनय की बारीकियों पर दम भरते लेकिन निर्देशकीय समझ पर बस एक धुआं… मैं उनके निर्देशकीय दृष्टिकोण से असहमत रहा।

इसके बाद, संस्था प्रशासक रूप को भी देखा-सुना। जिस मप्र नाट्य विद्यालय के प्रमुख संजय उपाध्याय से शुरूआत में उन्होंने बड़े वत्सल भाव से मुझे परिचित करवाया था, कालांतर में वह ख़ुद उसी कुर्सी पर थे। ‘पॉपुलर राष्ट्रवादी’ रुजहान के आलोक भाई ने एमपीएसडी को कैसे आगे बढ़ाया? कलाजगत गवाह है। शायद कइयों को अब ख़याल आये कि सिगरेट पर चेतावनी होती है (जिसे नज़रअंदाज़ किया जाता है)। मेरा ख़याल है वह अध्यापकीय किरदार के लिए ही फ़िट थे। बहरहाल, उनका कलाकार था बहुत आकर्षक।
एनएसडी के गोल्ड मेडलिस्ट होने, बैचमेट इरफ़ान और मीता वशिष्ठ की यादें बांटने, कारंत जैसे दिग्गजों के साथ काम करने, बेटे के रणजी ट्रॉफ़ी में खेलने, कलाकारों/लेखकों के बारे में बतियाने, भोपाल आने पर इरफ़ान का उनके घर पहुंचने… जैसे कई क़िस्से कहते-सुनते वक़्त उनकी भरी-भरी आंखों और स्मोकरों वाले ट्रेडमार्क सांवले होंठों पर एक हंसी फैल जाती थी। बक़ौल ख़ुद आलोक भाई एनएसडी के बाद, फ़िल्मों के प्रस्ताव के बावजूद उन्होंने थिएटर चुना था, उन्हें नाज़ था कि ज़िंदगी थिएटर के नाम की थी। वाक़ई वह कम नहीं सुलगे थे, उन्होंने ख़ुद को धुआं करने का जोखम उठाया था। हम याद रखेंगे कि बुझने से पहले थिएटर की इस दिलफ़रेब सिगरेट के कश कितने दमदार थे, इसकी बू और धुएं की तासीर क्या थी।
आग के घर की चौकीदारी काग़ज़ के पुतले के सुपुर्द
पल भर का तमाशा हैरानी उसके बाद धुआं और राख

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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कौन समझे मेरी आँखों की नमी का मतलब।
ये नज़्म -ए-गाह , जुंबिशे रूह
काँपती लौ, ये धुँआ
उम्र अपनी इन्हें गीत बनाने में कटी।।
एक बार पांच दिन के रचना शिविर में आलोक जी से मिलना हुआ था …
तभी उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व को देखा समझा था ।दोबारा मिलने की हसरत ही रह गई ।
सादर नमन कलाकार को ।
आलोक दादा पर आपकी कलम ने हर वो बात बेलाग बयाँ कर दी है,जो मेरे मन में थी।आलोक जी के साथ नाटक डैथ ऑफ सैल्समैन में काम करने का अनुभव हमेशा याद रहेगा।इस नाटक में मेरे किरदार का नाम था चार्ली और वो करते थे विली रोमान का केंद्रीय किरदार। नाटक में उनका किरदार कहता है-चार्ली,यू आर माई बेस्ट फ्रेंड। मैं जब भी मिलता,दादा इस पंक्ति को जरूर दोहराते थे।उनके अंदर एक नटखट बच्चा हमेशा बना रहता।नमन।
आपने निहायत ही बेबाकी से अपनी बात रखी है । एक सच्चे कलाकार को सच्ची श्रद्धांजलि दी है ।
मैं भी उनका प्रशंसक रहा हूं ।
श्रद्धापूर्ण स्मरण !!