हिंदी रंगमंच: संकट का ग्रहण बनाम रोशनी की उम्मीद

हिंदी की ज़मीनें…. एक रंगकर्मी की नज़र से समाज (विशेष रूप से हिंदी पट्टी का जनमानस), सत्ता और रंग-संस्कृति की बेबाक पड़ताल। पंकज निनाद की कलम से…. हिंदी रंगमंच:...

साहित्य जनमत बनाने के सिवा करे भी क्या: असग़र वजाहत

“साथ, यक़ीं, वाबस्तगी, बिकने थे बेदाम/ आज़ादी जो रख दिया, बंटवारे का नाम”… 1947 में विभाजन की क़ीमत पर आज़ादी मिली। आज हम कितने आज़ाद हैं और कितने विभाजित?...

भारतीय रंगमंच: एक अवलोकन

विश्व रंगमंच दिवस पर प्रमोद दीक्षित मलय की कलम से…. भारतीय रंगमंच: एक अवलोकन             नाटक दर्शकों को प्रेम, रहस्य, रोमांच, हर्ष, खुशी, आत्मीयता...

आलोक चटर्जी: सिगरेट जो धुआं हो गयी

रंगकर्मी आलोक चटर्जी को गये एक बरस हो गया। भवेश दिलशाद की यह टिप्पणी आब-ओ-हवा के अंक 19 में प्रकाशित हुई थी, जिसे प्रसंगवश यहां प्रस्तुत किया जा रहा...
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