हिंदी की ज़मीनें…. एक रंगकर्मी की नज़र से समाज (विशेष रूप से हिंदी पट्टी का जनमानस), सत्ता और रंग-संस्कृति की बेबाक पड़ताल। पंकज निनाद की कलम से…. हिंदी रंगमंच:...
“साथ, यक़ीं, वाबस्तगी, बिकने थे बेदाम/ आज़ादी जो रख दिया, बंटवारे का नाम”… 1947 में विभाजन की क़ीमत पर आज़ादी मिली। आज हम कितने आज़ाद हैं और कितने विभाजित?...
रंगकर्मी आलोक चटर्जी को गये एक बरस हो गया। भवेश दिलशाद की यह टिप्पणी आब-ओ-हवा के अंक 19 में प्रकाशित हुई थी, जिसे प्रसंगवश यहां प्रस्तुत किया जा रहा...