
- January 30, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
पाक्षिक ब्लॉग विवेक सावरीकर मृदुल की कलम से....
राम गांगुली: 'आग' की शोहरत का पल भर में धुआं होना
दोस्तो, विगत एक वर्ष से “उड़ जाएगा हंस अकेला” के निमित्त से फ़िल्म संगीत के अनमोल ख़ज़ाने से कुछ गीतों, गीतकारों, गायकों और संगीतकारों को याद करने का ये उपक्रम चलते-चलते अब ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है, जहाँ आप सबसे इजाज़त लेने की बेला है। आपसे राम-राम कहते हुए यकबयक राजकपूर की फ़िल्म “आग” के संगीतकार राम गांगुली की याद ताज़ा हो आयी है। तो आइए इन्हीं से जुड़े गीतों और चंद वाक़यों पर ग़ौर फ़रमाइए।
यह तो सभी जानते हैं वर्ष 1948 में आर.के. फ़िल्म्स के झंडे तले फ़िल्म ‘आग’ ने अपने समय में ख़ासी धूम मचायी थी। राज कपूर और नरगिस की प्रमुख भूमिका वाली इस फ़िल्म का गीत-संगीत बेहद पसंद किया गया। ख़ासकर बेहजाद लखनवी का लिखा गीत-“जिंदा हूँ इस तरह कि ग़मे-जिंदगी नहीं” (मुकेश) और “काहे कोयल शोर मचाये रे” (शमशाद बेगम)। इनके अलावा कुल पांच गाने या दोगाने भी थे, जो बेहद मक़बूल हुए।इस फ़िल्म के संगीतकार थे, श्री राम गांगुली, जो पृथ्वी थिएटर के लिए बनने वाले नाटकों में संगीतकार का काम संभाला करते थे। लेकिन अफ़सोस कि तब के युवा तुर्क राज कपूर ने अपनी अगली फ़िल्म बरसात के लिए राम दादा की जगह उन्हीं के सहायक शंकर सिंह रघुवंशी और जयकिशन दयाभाई पांचाल को ले लिया। घटना छोटी-सी हुई पर उस अनबन ने राम दादा गांगुली को फ़िल्म की मुख्यधारा से सदा के लिए महरूम कर दिया।
यह तो आप सब जानते हैं राज कपूर साहब संगीत से कितना प्रेम करते थे। लिहाज़ा अपने फ़िल्म के संगीतकारों के और साज़िंदों के साथ बैठकर कुछ सुनना-गुनना उनका प्रिय शगल था। ऐसे ही किसी रोज़ राम गांगुली की ग़ैर-मौजूदगी में उनके सहायक शंकर ने एक गाना सुनाया। उसके बोल कुछ ऐसे थे- “अंबुवा का पेड़ है, वो ही मुंडेर है, आजा मेरे बालमा, अब काहे की देर है”।
राज कपूर को वो धुन बहुत मधुर लगी। इतनी कि मन ही मन उन्होंने इस धुन का उपयोग अपनी निर्माणाधीन फ़िल्म “बरसात” के लिए करने का निश्चय कर लिया। तुरंत वहां मौजूद सब मूसीक़ारों के बीच यह इरादा भी ज़ाहिर कर दिया। यह बात संगीतकार राम गांगुली को बड़ी नागवार गुज़री कि उनकी वरिष्ठता को दरकिनार कर उनके एक शागिर्द से राज बाबू धुन ले रहे हैं। राज और राम दादा के बीच यह अनबन जल्द ही सार्वजनिक हो गयी। जब राज कपूर ने किसी को बताया कि गांगुली जी चोरी-छिपे किसी अन्य फ़िल्म के लिए उनकी फ़िल्म “बरसात” के लिए बनायी धुन की पेशकश कर रहे हैं।

इन सब बातों का जो नतीजा हुआ, वो शंकर-जयकिशन के लिए तो आल्हादकारी रहा। “अंबुवा का पेड़ है” की धुन वही रही और लता मंगेशकर का गाया कालजयी गीत आ गया- “जिया बेक़रार है, छाई बहार है, आजा मोरे बालमा तेरा इंतज़ार है” (हसरत जयपुरी)। लेकिन इधर राम गांगुली की क़िस्मत का सितारा डूबने लगा। फ़िल्म “बरसात” के हाथ से जाने के बाद आपने कुछ और फ़िल्मों में संगीत ज़रूर दिया पर वो गाने लोकप्रिय नहीं हो सके और “आग” के गानों जैसा जादू न जगा सके।
यहां कहना चाहता हूं कि लोकप्रिय होने के लिए केवल प्रतिभा काम नहीं आती। देखा जाये तो राम गांगुली बहुत जानकार संगीतकार और मैहर घराने के मशहूर बाबा अलाउद्दीन ख़ां साहब के गंडाबंध शिष्य भी थे। मगर अपने मिज़ाज की तल्ख़ी और राजकपूर की बेदिली ने उन्हें कुछ इस क़दर मायूस कर दिया कि वे फिर मुख्यधारा में आ न सके। वर्ष 1965 के आसपास राम दादा ने मायानगरी को राम-राम कह दिया और कोलकाता लौट आये, जहाँ 1983 में अंतिम साँस ली… चलिए अब हंस के उड़ने का समय हो चला। तो विदा। पुनः किसी नये स्तंभ के साथ जल्द आपसे अपनी बात साझा करने आता हूं। तब तक जय आब -ओ-हवा।

विवेक सावरीकर मृदुल
सांस्कृतिक और कला पत्रकारिता से अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले विवेक मृदुल यूं तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववियालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं,पर दिल से एक ऐसे सृजनधर्मी हैं, जिनका मन अभिनय, लेखन, कविता, गीत, संगीत और एंकरिंग में बसता है। दो कविता संग्रह सृजनपथ और समकालीन सप्तक में इनकी कविता के ताप को महसूसा जा सकता है।मराठी में लयवलये काव्य संग्रह में कुछ अन्य कवियों के साथ इन्हें भी स्थान मिला है। दर्जनों नाटकों में अभिनय और निर्देशन के लिए सराहना मिली तो कुछ के लिए पुरस्कृत भी हुए। प्रमुख नाटक पुरूष, तिकड़म तिकड़म धा, सूखे दरख्त, सविता दामोदर परांजपे, डॉ आप भी! आदि। अनेक फिल्मों, वेबसीरीज, दूरदर्शन के नाटकों में काम। लापता लेडीज़ में स्टेशन मास्टर के अपने किरदार के लिए काफी सराहे गये।
Share this:
- Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Click to share on X (Opens in new window) X
- Click to share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Click to share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Click to share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Click to share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
