
- January 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
उर्दू के शेक्सपियर का सिल्वर किंग
सिल्वर किंग आग़ा हश्र कश्मीरी का एक बहुत मशहूर सुधारवादी और एजुकेशनल ड्रामा है। यह वेस्टर्न ड्रामा “सिल्वर किंग” (हेनरी आर्थर जोन्स) से प्रेरित है, लेकिन इसे आग़ा हश्र कश्मीरी ने पूरी तरह से भारतीय माहौल, संस्कृति और भाषा में पेश किया है।
इस ड्रामा का मुख्य विचार बुराई को ख़त्म करने और अच्छाई की विजय पर आधारित है। समाज को सुधारने की कोशिश है। और यह अच्छे और बुरे किरदारों के ज़रिये स्थापित किया गया है। इसमें बातचीत की भाषा और आम जनता की समझ को ध्यान में रखा गया है, वरना ज़्यादातर ड्रामों में तब बातचीत भी शायरी में भी होती थी। इसमें शायरी भी है लेकिन मौक़े के हिसाब से शेर हैं।
मुख्य पात्र अफ़ज़ल मिर्ज़ा है, जिसे जुए और शराब की लत है। इन बुरी आदतों के जाल में फँसकर वह अपने परिवार को बर्बाद कर देता है, लेकिन जब उसे अपनी ग़लतियों का एहसास होता है, तो वह ख़ुद को सुधारता है और समाज का एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश करता है। दूसरे ज़रूरी किरदारों में परवीन, मुनीर, मिर्ज़ा चुन्गा, तहसीन, असद वग़ैरह शामिल हैं।
अफ़ज़ल और असद के बीच की बातचीत बहुत दिलचस्प है। अफ़ज़ल इस ड्रामे का हीरो है जबकि असद विलेन है। परवीन को एक बहुत ही नेक औरत के तौर पर दिखाया गया है, जो किसी भी हालत में सही रास्ते से नहीं भटकती। और वह एक ऐसी नेक औरत की इमेज पेश करती है जो मुश्किल समय में भी अपना चरित्र संभाले रहती है और किसी लालच में नहीं आती।
घटनाओं को इतने नैचुरल तरीक़े से दिखाया गया है कि पब्लिक उससे जुड़ जाती है, जो उसकी पॉपुलैरिटी की वजह भी थी। इस तरह इस नाटक में बिगड़ते माहौल, बिगड़ते रिश्ते, बिगड़ते नैतिक मूल्यों को और उनसे पैदा हुई बुराइयों को बहुत सच्चाई से पेश किया गया है। उन पर सुधार और अच्छाई की जीत बतायी गयी है। आग़ा हश्र के सभी नाटकों में डायलॉग, माहौल, सीन और बैकग्राउंड पूरी तरह से भारतीय हैं। इन्हीं वजहों से उन्हें बहुत लोकप्रियता मिली।

इस नाटक को कई दूसरे नामों से भी जाना जाता है, जैसे “नेक परवीन” और “अछूता दामन”, “ना आक़बत अंदेश”, “दो चोर”, “जुर्म-ए-वफ़ा”, “पाक दामन” आदि। अपनी लोकप्रियता के कारण यह नाटक उर्दू क्लासिक्स में शुमार किया जाता रहा है।
एक नज़र: आग़ा हश्र कश्मीरी
असली नाम आग़ा मुहम्मद शाह था। उनके पिता ग़नी शाह व्यापार के सिलसिले में कश्मीर से बनारस आकर बस गये थे। आग़ा हश्र का जन्म 1 अप्रैल, 1879 को गोविंद कलां, नरील बाज़ार, बनारस में हुआ था। उनकी शुरूआती पढ़ाई अरबी और फ़ारसी में हुई। उन्होंने कई मिशनरी स्कूलों में एडमिशन लिया, लेकिन किताबों में दिलचस्पी न होने की वजह से उनकी पढ़ाई अधूरी रह गयी। उन्हें शुरू से ही ड्रामा और शायरी में दिलचस्पी थी। 18 साल की उम्र में उन्होंने ‘आफ़ताब-ए-मोहब्बत’ नाम का एक ड्रामा लिखा, लेकिन बड़े-बड़े नाटककारों ने उनका उपहास उड़ाया। आग़ा हश्र ने इस उपहास को एक चुनौती की तरह लिया और फिर कई बेहतरीन नाटक लिखे और ड्रामा विधा के लिए ख़ुद को इतना समर्पित कर दिया कि उन्हें उर्दू का शेक्सपियर कहा जाने लगा।
उन्होंने भीष्म प्रतिज्ञा नाम की एक फ़िल्म भी बनानी शुरू की, लेकिन शुरूआती दौर में ही 28 अप्रैल, 1935 को उनका निधन हो गया। उन्होंने उर्दू ड्रामा को एक नया मोड़ दिया और कुल 38 नाटक लिखे, जिनमें हिंदी फ़िल्मों की कहानियाँ भी शामिल हैं। द ज्यूज़ गर्ल, रुस्तम सोहराब, असीर-ए-हर्स, मीठी छुरी, सफ़ेद ख़ून, शाम-ए-जवानी आदि उनके कुछ मशहूर नाटक हैं। ज़्यादातर वे समाज में फैली बुराइयों को दिखाते थे और उन्हें सुधारने की तरक़ीबें पेश करते थे। अपने नाटकों में वे तुकबंदी और मुश्किल शब्दों का इस्तेमाल करते थे लेकिन बाद में उन्होंने आसान और आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। द ज्यूज़ डॉटर पर एक फ़िल्म भी बनी थी जो डब्ल्यू. टी. माइक्रोफ़ की “द ज्यूज़” पर आधारित है। उन्होंने उर्दू, हिंदी और बंगाली में नाटक लिखे। उन्होंने रामायण और महाभारत के कुछ हिस्सों पर भी नाटक लिखे, जो उस समय बहुत लोकप्रिय थे।

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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