
- January 30, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग (गतांक से आगे) रति सक्सेना की कलम से....
कविता थेरेपी को ज़िन्दगी में देखते हुए
मैं पोइट्री थेरेपी की बात करते हुए लीक से ज़रा-सा भटक जाऊं, तो संभव है, मैं अपनी बात को ज़्यादा स्पष्ट कर सकती हूं। मैं पोइट्री थेरेपी से सम्बन्धित दो अनुभवों को साझा कर रही हूं:
पहली घटना- कविता पहुंचती है
किसी व्हाट्सअप समूह, जो सटीक विषयों पर संवाद करने के लिए बना है, मैंने एक कविता सुनायी, जिसकी अन्तिम पंक्ति थी, “समय मेरे आस-पास पालतू कुत्ते-सा घूम रहा है। “हालांकि यह कविता स्त्री के उस मानसिक द्वन्द्व से संबन्धित थी, जहां वह घरेलू कामों के जंजाल पर से ध्यान न देकर अपने आत्मिक सुख को महत्व देने लगती है।
सामान्य कविता श्रोता के लिए यह कविता अर्थहीन थी, क्योंकि वे उस अन्तर्निहित अर्थ को नहीं समझ पाये, जो स्वाभाविक था। लेकिन श्रोताओं में एक युवक था, जो सुनारी का काम करता है, छोटे क़स्बे में रहता है (मैं उसकी सुविधा के लिए, उसका नाम नहीं बताना चाहती हूँ)। इस युवक के लिए यह पंक्ति अपनी मां की समस्या से जुड़ी महसूस हुई। बाद में हुए संवाद से पता चला कि जब वह बच्चा ही था, उसके पिता की मृत्यु के बाद मां की मानसिक हालत बेहद बिगड़ गयी। छोटे क़स्बे के ऐसे समुदाय में, जहां एक-दूसरे के घर में ताक-झांक नहीं, बल्कि हक़ से हस्तक्षेप किया जाता है। एक पिताहीन बालक के लिए कष्टकारक रहा होगा। मां कभी सामान्य तो कभी आक्रामक होने लगी थीं। क़स्बे की मानसिकता के अनुरूप इसे अनेक बातों से जोड़ लिया, यहां तक कि भूत-प्रेत, झाड़ा-झाड़ी, बाबा-पीर आदि। जब उस युवक की शादी अपने समुदाय में हुई तो पता चला कि उस युवती का रुजहान मनोविज्ञान की तरफ़ ज़्यादा था, वह स्वयं पढ़ा-लिखा करती थी। उस समझदार युवती ने पहली बार यह महसूस किया कि यह मनोवैज्ञानिक समस्या हो सकती है, और इस तरह से पता चला कि मां बाईपोलर समस्या से ग्रसित हैं।
जब उस युवक और उसकी पत्नी ने मेरी कविता सुनी तो उन्हें महसूस हुआ कि मां के लिए वक्त व्यर्थ हो गया है, जिसके कई कारण हो सकते हैं। अर्थात यदि मां को उनके पसन्द के आस-पास रहने दिया जाये, उनके एकान्त में हस्तक्षेप नहीं किया जाये तो संभवतया वे वक़्त से जुड़ने लगेंगी। उस युवक ने मुझे बताया कि अब मां टी.वी. आदि देखने लगी हैं, दवा चल रही है, वे धीरे-धीरे सामान्य हो रही हैं। हो सकता है परिवार के लोग उनसे ज़्यादा सामान्य होने लगे, जिससे वे सहज होने लगी है, हां दवा तो चालू है।
मुझे आश्चर्य हुआ, क्योंकि मेरी कविता में स्त्री के हक़ की बात थी, ख़ास तौर से उसके हिस्से के वक़्त की, लेकिन उस युवक को अपनी मां की बाईपोलर समस्या से जुड़ने का मौक़ा मिला। संभवतया यही कविता की ताक़त है कि उसके कई रंग और अर्थ होते हैं, कभी-कभी कवि स्वयं भी नहीं जानता या समझता है। मैंने अनजाने में आब-ओ-हवा के लिए कविता थेरेपी पर लिखी पिछली टीप उस युवक के शेयर कर ली थी, उसका कहना था कि यह टीप उसे अपनी मां की समस्या को समझने में मदद कर रही है।
नवोदित कवियों का दर्पण कून वून
दूसरी घटना कून वून, जिनके बारे में मैने आब-ओ-हवा के पिछले अंकों में लिखा था, कुछ दिनों पहले उनका मेल आया। कुछ पंक्तियां थीं, मैं पेन्क्रियास के कैंसर से मर रहा हूँ, जाने से पहले अपने मित्रों की कविताएं छापना चाहता हूँ। ये पंक्तियां मेरे लिए विस्फोटक थीं। मैंने तुरन्त उन्हें दो कविताएं भेज दीं। लेकिन दो दिन बाद ही सूचना मिली कि सिएटल के कवियों, ख़ास तौर से लियोपोल्डो सेगुएल ने उनके सम्मान के लिए कविता पाठ रखा है, उसकी सूचना भी मिली।

हालांकि कून वून का इलाज अस्पताल में चल रहा है, लेकिन वे अपनी मौत को सामने देखते हुए भी भाग लेने पहुंचे। यहां उनके नये संकलन का वहां विमोचन हुआ, जिनमें पुरानी कविताओं के साथ नयी कविताएं शामिल हैं। यहां उनके बारे में साथी कवियों ने जो महत्वपूर्ण बात बतायी, वह यह थी कि वे बाईपोलर से जूझते हुए न केवल अपनी कविताएं लिख रहे थे, अपितु युवाओं की कविताओं का बेहतरीन संपादन करके छाप भी रहे थे।
उनकी कविताओं के बारे में अन्य प्रमुख अमेरिकन कवि शी युन पाई ने स्मरण साझा किया, उन्होंने बताया जब उन्होंने समीक्षा के लिए कुन वून के कविता संग्रह को 2016 में पहली बार पढ़ा तो उन्होंने एक बात महसूस की कि कून की कविताएं बोलती हैं, अर्थात् पढ़ते वक़्त लगता है कविता सुन रहे हैं। हालांकि कून अप्रवासी अमेरिकन थे, जिनके पास अपना स्वयं का घर भी नहीं, लेकिन वे अपनी बीमारी से जूझने के अलावा ग़रीबी के होते हुए भी कविता के प्रकाशक, आयोजक और मार्गदर्शक के रूप में सदैव उपस्थित रहे। कून दरअसल अन्य कवियों के लिए दर्पण थे, जो दूसरों की प्रतिभा को समझते हैं। उनका कहना था यदि हम कून की कविताओं को एक तरफ़ रख दें, फिर भी उनका जीवन, उनका दृष्टिकोण, दूसरों की प्रतिभा समझने की शक्ति उन्हें बेहतरीन मनुष्य बनाती है। वे समाज के लिए भी काम करते रहे हैं। उभरते हुए कलाकारों को प्रोत्साहित करते हैं। उनका अस्तित्व ही दूसरों के लिए उनके द्वारा किये गये किसी भी कार्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहा है।
वे बोल रहीं थीं- “उन्होंने मेरे लिए जो किया वह कविता से कहीं अधिक अर्थपूर्ण था। मेरे बेटे टोमो के जन्म के बाद, मैं एक कठिन दौर से गुज़री, जहाँ मैं बेरोज़गार थी। कून ने टोमो के जन्मदिन और moon year पर कई वर्षों तक मुझे लाल लिफ़ाफ़े भेजे। यह वैसा ही था जैसा परिवार करता है। धन अक्सर ऊर्जा, कर्म और उलझनों से भरा होता है। लेकिन कून ने मेरे लिए कुछ नहीं चाहा और शायद इसीलिए उस प्रेम और स्नेह को स्वीकार करना मेरे लिए आसान हो गया।” (ये पंक्तिया मैंने शी युन पाई की फेसबुक पर लिखी उक्तियों से ली हैं)
मैंने इस कार्यक्रम का वीडियो यूट्यूब पर देखा तो कून वून के चेहरे पर मुस्कान थी, वे सटीक लहजे में पढ़ रहे थे। लेकिन जब मैंने उनसे मेल भेज कर पूछा कि क्या मैं उनके बारे में लिखी शी युन पाई की टिप्पणी को ले सकती हूँ, तो उनका जवाब आया कि कीमियों के कारण मेरा दिमाग़ ठीक से काम नहीं कर रहा है, मैं तुम्हारी बात समझ नहीं पा रहा हूँ। इससे मुझे महसूस हुआ कि कून वून जितनी देर कविता के साथ रहते हैं, उनका चित्त स्थिर रहता है।
मुझे इस बात का दुख था कि उन्हें इस तरह का कष्ट सहना पड़ रहा है, अस्पताल में कवि कविता से दूर चला जाता है। लेकिन मैं यह सोच कर अचंभित था कि कविता ने उन्हें न केवल ज़िन्दगी को जीना सिखाया बल्कि अपने अभावों को नकारते हुए दूसरों की मदद करना भी सिखाया।
संभवतया यही कविता की थेरेपी है।

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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