
- February 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....
कसौटी पर कितने खरे माधव कौशिक?
तक़रीबन दर्जन भर ग़ज़ल संग्रह के रचनाकार डॉ. माधव कौशिक मौजूदा दौर में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। ग़ज़ल की दुनिया में आपका आला मुकाम है। पेशे से भाषा अधिकारी हैं, अतः भाषा पर अधिकार से कौन इनकार करे। आपने एकाध टेलीफ़िल्म के लिए गीत और पटकथा भी लिखी है। कई विश्वविद्यालयों में आप पर शोध कार्य हुए हैं। आप साहित्य अकादमियों से भी जुड़े हुए हैं। हरियाणा विश्वविद्यालय के स्नातक और स्नातकोत्तर के पाठ्यक्रम में आप पढ़ाये जाते हैं। इस क़दर सरफ़राज़ कोई भी व्यक्ति डिज़र्व करता है कि उस पर शोध कार्य हों। साहित्य का अदना-सा विद्यार्थी होने के नाते कभी-कभी मुझे भी चुन्ना काटने लगता है, कि मैं भी किसी पर शोधपरक कुछ लिखूँ। वैसे तो मैं रोज़ कुआँ खोदकर पानी पीने वालों में से हूँ, सुबह से शाम तक आलू, आटा, तेल में ही परेशान रहता हूँ मगर दिल है कि मानता नहीं। मन को मारना भी नहीं चाहता अतः कुछ लिखने की क्या बस पढ़ने की गुस्ताख़ी कर रहा हूँ। चलिए आप भी मेरे साथ माधव कौशिक के कुछ शेरों को पढ़िए…
मेरी रेत से गुज़र के देखो
अंदर कुछ बहता है अब भी
कौशिक साहब की मुश्क-बू ग़ज़लों की नाज़ुकी से गुज़रने के दरमियान कभी-कभी ऐसा लगता है, जैसे सर किसी बड़ी चट्टान से टकरा गया हो। कोई-कोई शेर तो इतना उलझाऊ और उबाऊ कि कुछ समझ में ही नहीं आता, क्या करें। अब इस शेर में मेरे लिए यह समझ पाना बड़ा मुश्किल हो गया है कि ‘रेत से गुज़रना’ का क्या अर्थ होता है? मैंने गली से गुज़रना, दौर से गुज़रना, बुरे वक़्त से गुज़रना जैसे शब्दक्रम तो सुने थे मगर ‘रेत से गुज़रना’ जैसा कोई शब्दक्रम ‘मेरा’ या ‘मेरी’ सर्वनाम के साथ नहीं सुना। यह अगर कोई आंचलिक मुहावरा है तो अलग बात है। कौशिक साहब कहीं यह तो नहीं दिखाना चाह रहे हैं कि मैं ऊपर से भले ही रूखा हूँ किंतु मेरे अंदर भावनाओं की एक नदी बहती रहती है। ऐसे है तो क्या आपको ऐसा नहीं लग रहा कि इन शब्दों से इस तरह का कोई मुहावरा नहीं बन पा रहा। इन दोनों वाक्यों पर आप अपनी तरफ़ से भले ही कोई अर्थ लाद दें किंतु स्वयं में यह स्पंदनहीन ही है। एक और शेर देखें:
अब तो फटी-फटी आंखों से देख रहे लाचारी में
मुर्दा हो जाने से पहले मर जाते तो अच्छा था
इस शेर के पहले मिसरे पर मैं कुछ नहीं कहना चाहूँगा किंतु इतना कि दूसरी पंक्ति समझ से परे है। ‘अपना कहा ये आप समझे या ख़ुदा समझे’.. मज़े की बात यह है कि कौशिक साहब जिस गोला में रहते हैं, वहाँ लोग मुर्दा होने के बाद भी मरने के लिए बचे रहते हैं। एक और शेर देखें:
इस तरह से ही तय होगा फैसला इक दिन
चलेंगे पैर तो निकलेगा रास्ता इक दिन
इस शेर के पहले मिसरे में ‘से’ जो ‘ही’ के पहले आया है उसमें भले ही अतिरिक्त पद-दोष आ रहा हो लेकिन हम कुछ नहीं कह सकते क्योंकि कौशिक साहब को भाषा रत्न पुरस्कार मिला है। आपको एक्स्ट्रा प्रिभिलेज तो मिलना ही चाहिए, किंतु ‘तय होगा फ़ैसला’? यह कौन-सा भाषा सौंदर्य है? एक और शेर देखें–
जिसे बुझाने हवा रोज़ झूमकर आये
इसी तरह का कोई इक दिया जला इक दिन
दूसरे मिसरे को पढ़ने के बाद तो कुछ कहते ही नहीं बन रहा। आप पढ़कर देखिए क्या और कैसे इसका अर्थ निकाल सकते हैं आप। शायद कौशिक साहब की ये इच्छा रही हो कि यह दिया हवा से बुझे, पर इसके लिए दो मिसरे और वह भी ऐसे! भाषा रत्न पुरस्कार से सम्मानित शायर के बेहतरीन वाक्य विन्यास का एक और नमूना:
वक्त की आंधी भी जिसको रोक पाएगी नहीं
आंधियों की कोख में वो आँधियाँ रख जाऊंगा
यहाँ आँधियों की कोख में आँधियाँ रखने का आख़िर क्या मतलब है? क्या छोटी परेशानी पर बड़ी परेशानी रखने की बात कर रहे हैं? एक और मिसरा यह है:
धूप की शबनम पे दिल की दास्ताँ लिख जाऊँगा
आख़िर यह ‘धूप की शबनम’ क्या बला है? ज़्यादा विरोधाभास और चमत्कार पैदा करने के चक्कर में सब गुड़-गोबर हो रहा है। यह भी देखें:
हवा ने छीन लिया अब तो धूप का जादू
नहीं तो पेड़ भी पत्तों से प्यार करता था
इन दोनों मिसरों में संबंध क्या है यह तो कौशिक साहब ही बता पाएँगे, मैं तो भाषा रत्न हूँ नहीं जो इसकी व्याख्या कर पाऊँ। यह भी देख लीजिए:
जो शख़्स देर तक उलझा रहेगा काँटो में
उसी के हाथ में तितली के पर भी आएंगे
इस शेर पर मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि तितली का हाथ में आना और तितली के पर का हाथ में आना, दो अलग-अलग बातें हैं। यहाँ ऐसा लग रहा है जैसे कौशिक साहब तितली के पर नोचने की बात कर रहे हैं या उसके नुचे हुए पंख पाने पर तसल्ली जता रहे हैं।
पुरस्कारों के बोझ से दबे कौशिक साहब की भाषा पर पकड़ आपको नानी याद दिला देगी। जहाँ-जहाँ से मुझे शेर नज़र आते जा रहे हैं, मैं दिखाता चल रहा हूँ। एक मिसरा है:
कुछ लोग अभी तक भी अंधेरे में खड़े हैं
‘अभी तक’ के बाद ‘भी’ ऐसा लग रहा है जैसे किसी नवजात शिशु ने बिस्तर पर सूसू कर दिया हो। इस तरह के अतिरिक्त पद दाल के कंकड़ की तरह अचानक आकर पूरा ज़ायक़ा बिगाड़ देते हैं। इस ‘भी’ ने पूरी मिट्टी पलीद करके रख दी है। अतिरिक्त पद दोष का ये इकलौता उदाहरण नहीं है। एक करिश्माई मतला भी है:
करिश्मा यह भी हमने दोस्तों संसार में देखा
बड़ा-सा एक दरवाज़ा हर इक दीवार में देखा
यहाँ करिश्मा यह नहीं कि कौशिक साहब ने दीवार पर बड़ा-सा दरवाज़ा देखा, करिश्मा इस बात में है कि कौशिक साहब ने इस शेर में कोई चित्र भी नहीं बनाया और दोस्तो को संबोधित करके ‘इतना बड़ा’ एनाउन्समेंट भी कर दिया। ज़रूर कौशिक साहब के बेडरूम में चार दरवाज़े होंगे। कौशिक साहब साहित्य के रत्न हैं, चार क्या चालीस दरवाज़े भी लगा सकते हैं। वाणी प्रकाशन ने इस तरह की बकवास को छापा, यह भी बड़ा करिश्मा है। इस तरह की ग़लतियों को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं आप? नतीजे पर पहुंचने से पहले यह भी देखिए:
उसी में लिप्त हैं कुछ शाकाहारी लोग शहरों के
शहर में मांस का इक और कारोबार चलता है
अगर कौशिक साहब मिलते तो मैं उनसे ज़रूर पूछता कि क्या इन दो पंक्तियों को शेर कहा जा सकता है? इसे शेर कहना क्या शेर के साथ अशिष्टता करने जैसा नहीं लग रहा है? कौशिक साहब कहीं देह व्यापार की ओर तो इशारा नहीं कर रहे? अगर ऐसा है तो बेकार की कोशिश कर रहे हैं और बहुत ही बेकार ढंग से भी। हाँ! अगर इदी अमीन की तरह आदमी का मांस खाने जैसा कोई इशारा हो तो आप जानें या कौशिक साहब। ये शेर भी बे-बह्र है, यह बात मैं यहाँ नहीं कहूँगा। यहां और एक शेर:
कहा किसने कि तुमसे हर दफ़ा झुककर निकलना है
तुम्हारे ज़ेह्न से दरबारियों का डर निकलना है
पहले मिसरे में ‘तुमसे’ के पहले आये ‘कि’ की वजह से पूरे मुहावरे की ऐसी-तैसी हो गयी है। वाक्य होना था कि ‘तुमसे किसने कहा कि हर दफ़ा झुककर निकलना है’ लेकिन… भाषा पर अधिकार न रहा और एक ‘कि’ से अर्थ का अनर्थ हो गया है। भाषा पर अधिकार का एक और नमूना:
धरती भी अंगड़ाई लेकर नाच उठी
प्यार भरा इक ख़त जब अंबर लिखता है
इस शेर का मफ़हूम आपके हवाले बस इतना ज़रूर ध्यान दिला दूं कि दोनों मिसरे अगर सामान्य वर्तमान काल में होते या सामान्य भूतकाल में होते तो..। लिजलिजा-सा एक और शेर:
जिसका दुनिया से रिश्ता न जीवन से
क्या जाने क्या आज का शायर लिखता है
चलिए, कौशिक साहब की यह बात मान लेते हैं कि आज के सारे शायर बकवास लिखते हैं, मगर इतना तो कौशिक साहब को भी बताना पड़ेगा कि इस शेर में ‘दुनिया’ और ‘जीवन’ क्या अलग-अलग अर्थ दे रहे हैं? एक मतला ऐसा:
तन्हा चलकर करना होगा ख़त्म सफ़र तन्हाई का
छूने से अंदाज़ लगेगा जख़्मों की गहराई का
भगवान जाने इन दोनों मिसरों में क्या रब्त है? मुझे जायज़ या नाजायज़ किसी तरह का संबंध नज़र नहीं आ रहा। दूसरा अंदाज़ा के लिए अंदाज़ शब्द क्यों? मेरा विनम्र निवेदन है दोनों बाते आप कौशिक साहब से ही पूछ लें। मेरा काम था इसे नोट करवा देना सो मैंने करवा दिया। और आइए:
पहले तो साया मुझ-सा था लेकिन अब मैं साये-सा
परछाई पर भी पड़ता है दोस्त असर परछाई का
परछाई पर परछाई का कितना असर पड़ता है! यह बात तो कौशिक साहब ही जानें। मैं इस पचड़े में क्यों पड़ूँ। किंतु पहले मिसरे पर मैं चुप नहीं रहूँगा। जब साया मेरे जैसा था तो क्या उस समय मैं साया जैसा नहीं था? भला इस वाहियात रिपिटेशन से कौन-सा नाद सौंदर्य पैदा हो गया?
हमारी साख भी मिट्टी में मिलकर हो गयी ज़िंदा
शहर में इस दफ़ा का हादसा कुछ और ही निकला
इन दोनों मिसरों का संबंध भी कौशिक साहब ही बता पाएं शायद। मैं तो बस जहाँ अटकता हूँ उसे दर्ज कर देता हूँ। आप भी अपनी-अपनी तरफ़ से कोई भी अर्थ इस शेर पर ज़बरदस्ती लादने के लिए स्वतंत्र हैं। वैसे इस शेर का कंधा इतना मज़बूत नहीं है कि यह अर्थ का बोझ सह सके।
सबके सब निकले तो फिर वापस कभी लौटे नहीं
घर के बाशिन्दों की ख़ातिर घर अकेला रह गया
कहीं कौशिक साहब यह तो नहीं कहना चाह रहे कि सब एक साथ निकले इसलिए नहीं लौटे! घर, घर के बाशिंदों की ख़ातिर कैसे अकेला हो गया? आपको कुछ समझ आये तो बताएं। मैं तो ‘घर के बाशिंदे’ प्रयोग को भी खोज रहा हूं। अब कुछ शेरों के कुछ और मिसरे झेलिए:
‘मरने वाला भी आख़िर मर गया एक दिन मगर’
‘ज़िंदगी की राह में गहरे शजर आते नहीं’
‘देखिए जिसको उसी का ज़र्द चेहरा है उदास’
‘पुराने वक़्त के सुकरात हों या मीरा हों’
‘खुश्क आंखों से बहते ही रहे आँसू सदा’
‘बेहया घड़ियाल निकला सुर्खियाँ अख़बार की’
कितने दर्ज करूं? किसी शेर में मतलब ढूंढ़ रहा हूं, किसी में कोई बात तो किसी में रब्त… आपको पता चला आख़िर के दो मिसरे एक ही शेर के हैं? रब्त की खोज में एक ग़ज़ल के कई शेर देखिए:
शहरों के झमेले से गाँव को अलग रखना
चिड़िया की उड़ानों को बाज़ों से अलग रखना
रिसते हुए छालों का रिश्ता है तो मंज़िल से
गुमनाम मुसाफ़िर को रस्तों से अलग रखना
इस दौर में चीज़ें भी इंसान को खाती हैं
पैरों की लियाक़त को जूतों से अलग रखना
ऐसा न हो ममता की माया में उलझ जाएँ
बच्चों को सफ़ाई से माँओं से अलग रखना
किसी शेर में रब्त कोई समझाये। इसे कौशिक साहब से ही समझना होगा। ऐसे शेरों को पढ़ना बड़ा ही मज़ेदार भी है। ‘पैरों की लियाक़त’ और ‘जूतों’ पढ़कर तो लगा जैसे छोटा भीम सीरियल देख रहा हूँ। भाषाई चमत्कार पैदा करने के चक्कर में कौशिक साहब ने जाने क्या-क्या न कर दिया। इतने पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका व्यक्ति अगर इस तरह की ग़लतियाँ कर रहा है तो उसे क्या कहेंगे? व्याकरणिक अशुद्धि भी देखिए:
होरी की चीखें टकराईं जाकर चाँद सितारों तक
लेकिन उसकी ख़बर न पहुँची शहरों के अख़बारों तक
इस शेर के दोनों ही मिसरों में मुझे कुछ कहना है। पहले शेर के अंत में आया ‘तक’ जिसे हम व्याकरण की भाषा में परसर्ग या पूर्व सर्ग या शब्द योगी शब्द कहते हैं पूरी तरह से ग़लत है। यह ‘तक’ सिर्फ़ बाद की रदीफ़ों से मेल कराने के लिए लिख दिया गया है। ‘टकराई’ शब्द के लिए सही परसर्ग ‘से’ होना चाहिए था। दूसरे मिसरे में ‘अख़बारों’ पदबंध के पहले आया ‘शहर’ अपनी जाति बताने पर अड़ा हुआ है। इस महान ख्यातिलब्ध शायर को इतना तो जानना ही चाहिए कि अख़बार तो शहर या टाउन में ही निकलते होंगे जंगल में तो निकलते नहीं फिर अलग से शहर लिखने की क्या ज़रूरत आ पड़ी थी। अब यह देखें:
फिर कहाँ पर बरसेंगे, इंसानों
मिट गई गर रही सही दुनिया
इस शेर में पहला कनफ्यूज़न तो यह है कि बरस कौन रहा है ‘इंसान’ या ‘बादल’ दूसरी बात यह कि पहले मिसरे में आया ‘पर’ अतिरिक्त पद दोष है। मुहावरों की ऐसी-तैसी करता एक और शेर:
चंद सपनों को तो मैंने ख़ुद किया घर से बदर
क़त्ल कुछ ख़्वाबों का मुझसे बे-इरादा हो गया
पहले मिसरे में आया शब्द ‘बदर’ मुहावरे की एक टांग पहले ही तोड़ चुका है। ऊपर से दूसरा मिसरा भी कुछ अच्छी ध्वनि पैदा नहीं कर रहा। ऐसा लग रहा है जैसे रोज़ ख़्वाबों का क़त्ल पूरे इरादे के साथ किया जाता रहा है, आज बे-इरादा हो गया है। अब देखिए ऐसा शानदार शेर सुना-पढ़ा है आपने:
फूलों का सख़्त लम्स भी सहना पड़ा मुझे
काँटों के साथ देर तक रहना पड़ा मुझे
इस शेर में डॉक्टर कौशिक के भयंकर चमत्कार से आप ग़श खाकर गिर तो नहीं पड़े? कौशिक साहब की ग़ज़लों में ज़बरदस्त मनोरंजन है। इतना मज़ा या हँसी टॉम एंड जेरी देखने में भी नहीं आती, जितनी कौशिक साहब को पढ़ने में। योजकों के प्रयोग का एक शानदार उदाहरण:
परछाईं का पीछा करते बीत गई यह उम्र मगर
लेकिन हमको रास न आया कभी किसी का अपनापन
पहले मिसरे के अंत में ‘मगर’ और दूसरे मिसरे के शुरू में ‘लेकिन’ कौशिक साहब के वक़ार में जो इजाफ़ा कर रहे हैं, उससे पूरी हिंदी ग़ज़ल शर्म से पानी-पानी होती नज़र आ रही है। यह अनजाने चूक नहीं है, इसकी तसदीक़ करते और भी मिसरे:
‘कल को आने वाली पीढ़ी किसके आँसू पोंछेगी’
‘कभी जो वक़्त ने मोहलत अगर ये दी हमको’

व्याकरण के क्षेत्र में इन्हें क्रांतिकारी परिवर्तन माना जाना चाहिए। ‘कभी जो’ के साथ ‘अगर’ कम था कि कौशिक साहब ने ‘ये’ सर्वनाम को भी रख लिया। चलिए कौशिक साहब के और चमत्कार भी देखते हैं:
दीवारों से रुकने वाली आवाजों से कह देना
दीवारों के पार चलें तो ख़ुशबू का घर आएगा
आप दीवारों के आगे चलकर ख़ुशबू के घर का आनंद लें मैं, ज़रा जल्दी-जल्दी और बातें भी कर लूं। एक और शेर में कौशिक साहब ने पुरवाई के अद्भुत गुणों का ज़िक्र किया है, जिसे हम सब पहले नहीं जानते थे। आज तक आपने सुनहरी धूप सुनी होगी, सुनहरी पुरवाई नहीं सुनी होगी:
बादल ने तो छोड़ दिया है रस्ता अपने आँगन का
कौन सुनहरी पुरवाई को लेकर अब घर आएगा
फिर वे तलवे हो गये छलनी बताओ किस तरह
आप कहते हैं कि काँटा राह में चुभता नहीं
ऐसा लग रहा है जैसे काँटा पैर में न चुभकर रास्ते में चुभ रहा है। ख़ैर:
हो सके तो खोलकर रख ले ज़ेह्न की खिड़कियाँ
बंद पलकों में उजाला देर तक टिकता नहीं
इस शेर का दूसरा मिसरा गौर करने लायक़ है। बंद पलकों में उजाला टिकता है या नहीं टिकता है, देर तक टिकता है या कम देर तक टिकता है? आपको ये सब बचकानी बातें नहीं लग रहीं?
क्या हुआ रद्दो-बदल हालात में
भूख उगती है अगर देहात में
मैं कौशिक साहब से बस इतना ही कहना चाहूँगा कि यह भूख अगर शहर में उगती तो क्या कौशिक साहब इसे रद्दो-बदल मान लेते? कौशिक साहब को निराला की ‘भिक्षुक’ कविता देखना चाहिए। अब चलिए लगे हाथ इस क़द्दावर शायर के यहां तकनीकी मामला भी देख लेते हैं। वैसे तो अब तक कोट किये गये शेरों में से कुछ जगह आपने बह्र की ‘सिद्धियां’ ताड़ ही ली होंगी, यहां कुछ और बातें भी:
हालात बिगड़ने की नई मंज़िलें देखो
सुकरात के हिस्से का ज़हर ढूँढ रहा हूं
इस शेर की रुक़्न है:
मफ़ऊल मफ़ाईल मफ़ाईल फ़ऊलुन
SSI ISSI ISSI ISS
यहां दूसरे मिसरे में कौशिक साहब ने ‘ज़हर’ शब्द को IS के भार पर लिया है। मेरा मानना है कि रचनाकार का एक मानक होना चाहिए।
कौन देगा शहर में राहत तुझे
गाँव भी लिखना नहीं अब ख़त मुझे
इस शेर का वज़्न है:
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
SISS SISS SIS
इस शेर में कौशिक साहब ने ‘शहर’ शब्द को SI के वज़्न में लिया है। ज़हर और शहर के अलग मात्रा भार से आपको ऐतराज़ हो रहा हो तो वह शेर याद कीजिए शाकाहारी लोग और शहर में मांस का कारोबार… उस शेर में शहर शब्द को IS पर बांध दिया गया। कौशिक साहब के यहां क़ाफ़ियों का भी खेल कम मज़ेदार नहीं है:
दिलों की बंद खिड़की खोलना अब जुर्म जैसा है
भरी महफ़िल में भी सच बोलना अब जुर्म जैसा है
मतले के काफ़िये हैं, ‘खोलना’ और ‘बोलना’ जो ठीक हैं। दिक्कत तब खड़ी होती है, जब आगे के शेर ‘तौलना’, ‘झांकना’, ‘सोचना’, ‘देखना’, ‘मांगना’ और ‘चीखना’ जैसे क़ाफ़ियों का रोना, रोने लगते हैं। इसी ग़ज़ल में बह्र के भी कई दोष हैं। एक अन्य ग़ज़ल का एक और शेर:
किसी श्राप की सूरत है जाम सड़कों पर
सड़क भी लेने लगी इंतक़ाम सड़कों पर
इसका वज़्न है:
मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
ISIS IISS ISIS SS
बह्र देखने पर उपर्युक्त शेर महर्षि अष्टावक्र की भंगिमा में नज़र आ रहा है। ‘श्राप’ पदबंध तक पहुंचते-पहुंचते बह्र सारे नेम-धरम छोड़कर दोष रूपी रंभा के मायाजाल में फँस जाती है। एक और शेर:
मिलावट हो भी सकती है ज़हर में
कभी अफ़वाह नहीं उड़ती शहर में
इस ग़ज़ल की मूल बह्र है:
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
ISSS ISSS ISS
इस शेर को देखकर ऐसा लग रहा है जैसे कौशिक साहब ज़हर में मिलावट की बात करते-करते बह्र में मिलावट कर बैठे। दूसरे मिसरे में एक ‘मुफ़ाईलुन’ के बाद दूसरा ‘मुफ़ाईलुन’ गरियार बैल की तरह घस्स से बैठ गया है।
यह कैसी जंगल की आग है जो अभी तलक भी नहीं बुझी है
हज़ारों सालों से मन ही मन में हजारों शेयर सुलग रहे हैं
इस शेर के दूसरे मिसरे में आया ‘हज़ारों सालों’ व्याकरण की दृष्टि से ग़लत है। इसे ‘हज़ारों साल’ होना चाहिए। यह शेर पढ़कर ज्ञानप्रकाश विवेक याद आ रहे हैं। उन्होंने अपने एक शेर में लिखा था, ‘चावलों के कुछ दाने’ उठा लाया हूँ। ख़ैर बह्र के नुक़्स दिखाने के लिए भी जाने कितने शेर दिखाता रहूंगा। अब कुछ बात तक़ाबुले-रदीफ़ की भी।
कोई पता न ठिकाना फ़रार सपनों का
क्यों कर रहे हो यहाँ इन्तज़ार सपनों का
अभी तो आपके चेहरे पे खूब चस्पाँ था
ये किसने फाड़ दिया इश्तिहार सपनों का
तुम्हारी आँख में न जाने ऐसा क्या देखा
पलट के लौट गया घुड़सवार सपनों का
ख़ुदा का शुक्र है मौसम बदल गया दिल का
नहीं तो मार ही देता गुबार सपनों का
हर शेर के हर मिसरे के अंत में ‘आ’ की आवाज़, आख़िरी शेर में तो ‘का’ ही… ऐसे उदाहरण भी ढेरों हैं कौशिक साहब के यहां। पूरा देश न सही चंडीगढ़ में तो आप ग़ज़ल के पुरोधा माने ही जाते होंगे। हरियाणा क्षेत्र में तो ज़रूर। अब आप ही कहें, क्या यह स्वीकार होना चाहिए। कौशिक साहब की ग़ज़लें पढ़ते हुए दो शब्द, बचकानी और नादानी बहुत ध्यान में आते हैं। उन्हें कहना होता है पेड़ के पुराने पत्ते और वह मिसरा बांधते हैं, ‘पुराने पेड़ के पत्तों को ख़ूब झरने दे’ या फिर ऐसे शेर कह बैठते हैं, जिनका सिर पैर समझना ही मुसीबत हो जाता है, जैसे:
भाग रहा हूँ बचपन से
पाँवों में अंगार नहीं
या फिर जगह-जगह तकनीकी ख़ामियां:
बाज़ार बंद ख़ौफ़ज़दा है गली-गली
अफ़वाह उड़ी नगर में सब कुछ बदल गया
यह ग़ज़ल रुक़्न की दृष्टि से अपने आरम्भ से ही बहुगोत्री हो गयी। इस शेर के दोनों मिसरे भी आपस में मेल नहीं खा रहे। हम सब मिलकर यह सब कौशिक साहब से ही पूछें… कुल मिलाकर हम कह सकते हैं हिंदी ग़ज़ल एक अजीब उथल-पुथल की स्थिति से गुज़र रही है। कभी नामकरण संस्कार में उलझकर रह जाती है, तो कभी अपने आदिपुरुष के अन्वेषण में। मुझे लगता है हिंदी ग़ज़ल को अपनी फ़िटनेस पर जितना काम करना चाहिए, उतना कर नहीं रही। सब अपना सोटा ताने घूम रहे हैं। एक और बात कहने में मुझे कतई संकोच नहीं कि किताब छपवाने की जल्दबाज़ी में कौशिक साहब अपनी पड़ताल करना भूल गये। ऐसा प्रायः ओहदे के नशे में लोग कर बैठते हैं। इससे बचने की ज़रूरत है।
ख़ैर अगले अंक में और किसी वज़नदार का वज़न तोलते हैं…

ज्ञानप्रकाश पांडेय
1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।
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