
- February 14, 2026
- आब-ओ-हवा
- 1
पाक्षिक ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
प्यार के दिन ख़ूनख़राबे की तस्वीर!
हिंदी सिनेमा ने एक दौर देखा जब हिंसा को नायक का पर्याय स्थापित कर दिया गया। इसे समझने के लिए हुए अधिकतर अध्ययनों में यही बात निकलकर आयी कि एक कुंठित, शोषित और मक़सद या ख़्वाबों से ख़ाली समाज के अवचेतन में वह नायक घर कर लेता है, जो बस जीत सकता है। भले ही उस जीत के लिए उसके दामन पर कितने ही धब्बे लगें, उसके मन में कितना ही अंधेरा पसर जाये, बस वह किसी भी क़ीमत पर कामयाब हो जाये तो हारे हुए लोगों को एक ‘दिशा’ मिलती है, पर क्या वाक़ई?
ये दाग़-दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं (Faiz)
सिनेमाई नायक का यह नैरैटिव 70 के दौर में बन रहा था। ‘एंग्री यंग मैन’ वाली प्रवृति के दायरे में बहुत कुछ आ रहा था। इसे सिर्फ़ व्यावसायिक सिनेमा नहीं बल्कि कला या समानांतर सिनेमा कही जाने वाली धारा में भी अपनी तरह से देखा गया। जानकार बतलाते रहे कि उस वक़्त देश की युवा आबादी के सामने चौतरफ़ा अंधकार था। रोज़गार वाले भविष्य के दरवाज़े नहीं लेकिन अपराध वाले खुले हुए थे; ग़रीबी इतनी थी कि रोना आये और हर आंसू की हवस में अमीरी थी; ख़्वाब नींदों वाले तो थे लेकिन जागी आंखों वालों के लिए सारी कायनात इस साज़िश में थी कि किसी की ताबीर न हो जाये… कुल मिलाकर इस युवा आबादी का मन बुरी तरह विक्षत था, हालात के हाथों हर तरह मारे अवाम के हाथ ग़नीमत से जो बचता भी, तो महंगाई मार रही थी…
इन हालात को एंग्री यंग मैन वाले नैरैटिव के न्यायसंगत तर्कों के रूप में समझा और समझाया गया, लेकिन आख़िरश बात यही निकली कि इस नैरैटिव ने हल क्या दिया? क्या इस तरह का नायकत्व कोई रास्ता दे सका? रास्ता न सही, कोई सपना ही दे पाया? सिनेमा ने ऐसे सवालों के लिए ख़ुद को कभी जवाबदेह न तो माना, न बनाया।
ख़ून आंखों में लपट सीने में और पीठ पे नील
देखना सुब्ह इसी तरह दिखायी देगी (Dilshad)
सिनेमाई तस्वीरों में एक बार फिर बढ़ती हिंसा को कई पहलुओं से टटोला जा सकता है। ऐसा साफ़ दिखायी दे रहा है कि क्रूर, वीभत्स और भयावह हिंसक दृश्यों वाले सिनेमा को पूरा उद्योग प्रमोट इस तरह कर रहा है, जैसे यह कोई फ़ॉर्मूला हो या कामयाबी की गारंटी। यहां से यह शंका तो पैदा होती ही है कि क्या यह किसी तरह का कोई एजेंडा तो नहीं। सिनेमा जगत से जुड़े विश्लेषकों के पास वही पुरानी बातें हैं कि ऐसी फ़िल्में अगर बड़ा कारोबार कर रही हैं, तो निर्माता इस तरह के चित्रों को प्रमोट करने में क्यों चूकेंगे। यानी सिनेमा उद्योग गेंद यहां भी समाज के पाले में डालकर कह रहा है सिनेमा तो समाज की ही छाया है। इस दावे से फिर उसी बहस में जाने के रास्ते खुलते हैं कि समाज सिनेमा को प्रभावित कर रहा है या सिनेमा समाज को… पर वह फिर कभी।

सिनेमा में इन दिनों परोसी जा रहे क्रूर हिंसात्मक दृश्यों को लेकर जो बहस चौतरफ़ा चल रही है, उसे किसी के इन शब्दों में समझा जा सकता है:
“सीरीज़/फ़िल्मों में बहुत ज़्यादा हिंसक सीन या न्यूडिटी का इस्तेमाल शॉक वैल्यू बढ़ाने के लिए ही है। यह दर्शकों से साइकोलॉजिकली रिस्पॉन्स पाने के लिए होता है। जहां ज़्यादा शॉक वैल्यू होती है, आप उसे ज़्यादा याद रखते हैं या उस पर बात ज़्यादा करते हैं। ज़ाहिर है, यह सभी पर लागू नहीं लेकिन कमोबेश मास-मैनिपुलेशन टेक्नीक है… स्टैंड-अप कॉमेडियन भी अक्सर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके जोक्स पर जब लोग नहीं हंसते या कम हंसते हैं तो रिस्पॉन्स पाने के लिए शॉक वैल्यू के नाम पर अचानक ऐसा हास्य आ जाता है जिसमें अभद्र, अशालीन भाषा या संदर्भ हों।”
यह टीप भी विषय के कारण को ही ज़्यादा टटोलती है, मक़सद को नहीं। अब यहां से मैं जो कहने वाला हूं, ये मेरी ख़ामख़याली भी हो सकती है और हो सकता है कि इन शंकाओं के साथ आप कुछ रिलेट भी कर सकें:
- — दुनिया को दो ही ताक़तें चला रही हैं, एक हथियारों की लॉबी, दूसरी ड्रग्स यानी फ़ार्मा की।
- — इन दोनों ताक़तों के हाथों में हर सत्ता की डोर है। दुनिया भर में तमाम नीतियों के पीछे कहीं न कहीं ये ताक़तें हैं।
- — इन दो ताक़तों का मक़सद बिल्कुल साफ़ है हर तरफ़ छोटी या बड़ी जंग चलती रहे और लोग सामान्य या गंभीर या नयी-नयी बीमारियों के शिकार होते रहें।
- — ये दोनों ताक़तें चूंकि अपने मक़सद में कई सत्ताओं को भागीदार रखती हैं इसलिए इनका तंत्र बहुत मज़बूत होता है।
- — सत्ताओं को कठपुतली बना देने वाली ये ताक़तें मनोवैज्ञानिक रूप से दुनिया भर को इस तरह हांकना चाहती हैं कि वो सवालों के दायरे से परे बनी रहें।
- — यहां से हमारी, आपकी साइकी के साथ खेल शुरू होता है। जिन कई चीज़ों को हम अनायास समझ रहे हैं, उसका रिमोट अदृश्य ताक़तों के हाथ में है जो हमारे, आपके मन को क़ाबू करने पर आमादा हैं।
शायद मैं यह कहना चाहता हूं कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर, साइकी के स्तर पर हमें हिंसा की तरफ़ धकेला जा रहा है, हिंसा को जायज़ या जस्टिफ़ाइड समझने और समझाने के नैरैटिवों से जोड़ा जा रहा है। शायद नागरिकों के रूप में सनकी, इंपल्सिव, नाराज़ और तरह-तरह से बीमार लोगों की एक भीड़ बनायी जा रही है। और शायद राजनीति ऐसी भीड़ के लिए अनेक कला माध्यमों को भी एक टूल की तरह इस्तेमाल कर रही है…
मैंने सोचा था इस बार का ब्लॉग, एडिशन जारी करने के दिन यानी 14 फरवरी को ही लिखूंगा। यक़ीनन मैं प्रेम पर यह ब्लॉग लिखना चाहता था। इसीलिए तय किया कि अपनी हमसफ़र के साथ एक प्रेम कहानी इसी दिन देखूंगा। ‘ओ रोमियो’ सुबह का शो देखने के बाद ब्लॉग लिखने बैठा तो यह सब लिख गया…
मेरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़्मों से नफ़रत है (Sahir)
‘प्रेमकथाएं और हिंसा’ जैसे विषय पर शायद फिर कभी विस्तार से कुछ लिखूं लेकिन अभी कैफ़ियत कुछ वैसी ही है, जैसा साहिर ने इस नज़्म में कहा था, “जब मैं अपने आसपास तमाम मजबूरियों, दर्दनाक हक़ीक़तों, साज़िशों और अट्टहासों को देखता हूं तो फ़ीलगुड वाली पोएट्री कैसे करूं? बज़्म को हंसाने और दिल बहलाने वाली अदा कहां से लाऊं?
मुझे इन्सानियत का दर्द भी बख़्शा है क़ुदरत ने
मेरा मक़सद फ़क़त शोलानवाई हो नहीं सकता”
मैं इश्क़ की ख़ुशबू और रंगों के बारे में सोचता रहता हूं, ख़ुद से उसकी बातें करता रहता हूं पर… ख़ैर ये बोले बग़ैर इस ब्लॉग को ख़त्म कैसे कर दूं कि बचपने का एक दौर था, नौजवानी का भी एक, जब एक्शन फ़िल्में (कई पर हिंसा के इल्ज़ाम हों) मुझे अपनी जानिब खींचती थीं। मेरी पसंदीदा फ़िल्मों में होती थीं। मैं उस दौर पर शर्मिंदा नहीं हूं, बस इतना कि अब मैं वैसे दौर में नहीं हूं। अब मैं उनके पीछे और बहुत कुछ देख पा रहा हूं। वो दौर भी सच था, यह भी सच है, सही और ग़लत शायद किसी और मुक़ाम पर तय करना चाहूं…

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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प्रेम की भाषा कठिन हो गयी है और क्रोध की भाषा सरल। प्रेम धैर्य मांगता है, संवाद मांगता है, आत्मालोचन मांगता है। हिंसा त्वरित समाधान का भ्रम देती है। बाजार को त्वरित चीज़ें प्रिय हैं।