
- February 16, 2026
- आब-ओ-हवा
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पुस्तक चर्चा डॉ. दीपक रुहानी की कलम से....
उर्दू-शायरी की ‘डेवलपमेण्ट टाइमलाइन’
समकालीन विमर्शों पर चर्चा के क्रम में जब उत्तर आधुनिकता पर चर्चा होती है, तो बात अक्सर सिर्फ़ सैद्धान्तिकी तक ही सीमित रह जाती है। ज़ाहिर है कि कोई भी साहित्य-सिद्धान्त अपने सार्वभौमिक होने के क्रम में प्रत्येक स्थान पर समान रूप से तो लागू होता है, लेकिन उसके उदाहरण बदलते जाते हैं। उर्दू-शायरी से यदि इस समय कोई ऐसा शायर प्रस्तुत करना हो, जो कि सही मायनों में उत्तर आधुनिकता की कसौटी पर खरा उतरता हो तो बेशक फ़रहत एहसास साहब का नाम लिया जा सकता है। यहाँ यह साफ़ कर देना मुनासिब होगा कि ‘उत्तर आधुनिक’ शब्द समय से सम्बद्ध अवधारणा नहीं है। यह एक प्रवृत्तिगत विशेषता है। आज के इस मौजूदा दौर में भी कई शायर ऐसे हो सकते हैं, जो ‘उत्तर आधुनिक तत्त्वों’ से ख़ाली हो सकते हैं।
जिस किताब की चर्चा में यहाँ करने चल रहा हूँ वो है– फ़रहत एहसास का नया कारनामा ‘मुझको मेरी याद आ रही है’। इस किताब के मुखपृष्ठ पर सबसे ऊपर लिखा है– ‘उर्दू ग़ज़ल और भारतीय काव्य-परम्परा का नया संवाद’। साथ ही शीर्षक के नीचे लिखा है– ‘1973 से 2023 तक की शाइरी’। यानी ये किताब न सिर्फ़ एक शायर की 50 साला शायराना काविशो-कोशिश का ख़ुलासा है, बल्कि हमारे लिए एक सदी के अन्तिम चतुर्थांश और दूसरी सदी के प्रथम चतुर्थांश तक फैला हुआ शायराना दस्तावेज़ है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह बीसवीं सदी से इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करती हुई उर्दू-शायरी की ‘डेवलपमेण्ट टाइमलाइन’ है। यह किताब इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि ये उर्दू के एक शायर को प्रस्तुत करने के साथ-साथ उर्दू-शायरी को भी प्रस्तुत करती है।
लगभग सभी जानते हैं फ़रहत एहसास साहब लम्बे समय तक एक उर्दू-अख़बार ‘क़ौमी आवाज़’ से जुड़े रहने के बाद जब रिटायर हुए तो अब कुछ वर्षों से ‘रेख़्ता’ संस्था में मुख्य सम्पादक के रूप में कार्यरत हैं। यह निहायत ही बिन्दास तबीअत और दिलआवेज़ शख़्सियत के मालिक हैं।
‘मुझको मेरी याद आ रही है’ 1066 पृष्ठों में फैला एक शायराना शीराज़ा है। इसमें 1083 ग़ज़लें हैं और 101 नज़्में। समय-समय पर प्रकाशित अलग ग़ज़ल-संग्रहों की ग़ज़लों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है। ‘आख़िरकार’ उन्वान से दस पृष्ठों की एक भूमिका भी फ़रहत साहब की तरफ़ से लिखी गयी, जो कि इनकी शायरी को समग्र रूप से समझने के लिए एक दृष्टि प्रदान प्रदान करती है। इस किताब में ख़ास बात ये भी है कि ग़ज़लों और नज़्मों के साथ उनके लिखे जाने की तारीख़ भी दर्ज है। जहाँ उपलब्ध है वहाँ दिन, महीना और वर्ष दर्ज हैं और जहाँ मात्र वर्ष उपलब्ध है, वहाँ सिर्फ़ वर्ष ही लिख दिया गया है। इसीलिए मैंने ऊपर ही कहा कि ये किताब एक दस्तावेज़ी हैसियत रखती है। उर्दू और हिन्दी के रचनाकारों में ये प्रवृत्ति कम पायी जाती है कि वो अपनी रचनाओं को समय से उस तरह सम्बद्ध करके महफ़ूज़ रखें जैसे इतिहास की वस्तुएँ रखी जाती हैं। ऐसी प्रवृत्ति ख़ासकर अंग्रेज़ी के कवियों में पायी जाती है।

यदि इसमें संग्रहीत ग़ज़लों को पढ़ें तो ऐसा लगता है एक साथ कई शायर यहाँ मौजूद हैं। ऐसा इसलिए भी होता है कि उत्तर आधुनिकता में किसी भी रचनाकार के भीतर अतीत, वर्तमान और भविष्य एक साथ उपस्थित होते हैं। वर्तमान में भी उसके पास ऐसा वर्तमान होता है जो कई-कई ख़ानों में बनता होता है। इसलिए कभी आपको इनकी शायरी में क्लासिकल रंग दिखायी देगा तो कभी जदीदियत की जद्दोजहद, कभी महबूब से बेतकल्लुफ़ गुफ़्तगू सुनायी देगी तो कभी अकेले में बैठकर दुनिया से ऊबे एक इंसान का एकालाप सुनायी देगा, कभी आधुनिक युग की समस्याओं से घिरा एक शहरी आदमी नज़र आएगा तो कभी आध्यात्मिक और धार्मिक समस्याओं और मुद्दों पर बहस करता एक बाग़ी। इन सबके अलावा फ़रहत साहब ने ग़ज़ल में कई तरह के नये-नये प्रयोग किये हैं जिन्हें ग़ज़ल पर बारीकी से नज़र रखनेवाले समझकर अतिरिक्त आनन्द की प्राप्ति कर सकते हैं।
संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि शायरी के चाहनेवालों के लिए यह किताब एक अहम सौग़ात है जिसके ज़रीये उन्हें विषय-वस्तु और कला के स्तर पर ज़ौक़-ओ-शौक़ की संतुष्टि से भी बढ़कर और भी बहुत-कुछ प्राप्त हो सकता है।

डॉ. दीपक रूहानी
शायर, अनुवादक और लेखक के रूप में चर्चित। 'ग़ज़लकार' पत्रिका के संपादन के साथ ही कुछ पुस्तकों का संपादन भी। राहत इंदौरी पर चर्चित किताब के लेखन के लिए भी चर्चित। मधुबनी में हिन्दी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर। संपर्क: 9415142314
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