
- March 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 1
पाक्षिक ब्लॉग आशीष दशोत्तर की कलम से....
आंखें छीनकर तो रोशनी न दिखायी जाये
हिंदुस्तानी परिप्रेक्ष्य में मज़हबी जलसे इस तरह होते हैं जैसे हम हर दिन उठते हैं और सोते हैं। यानी साल का शायद ही कोई ऐसा दिन रहता हो जब किसी धर्म का कोई उत्सव न हो। तरह-तरह के उत्सव, तरह-तरह की अवधारणाएं, तरह-तरह की मान्यताएं और तरह-तरह के विचार, यही हिंदुस्तानी तहज़ीब है। इस दौर में जबकि ईश्वर की नयी-नयी सत्ताएं खड़ी की जा रही हैं, ईश्वर के नये-नये अवतार पैदा हो रहे हैं और एक अनोखे ईश्वर की आराधना की बातें की जा रही हैं, ऐसे में अदबी दयारों में मज़हब और इबादत की अवधारणाओं को समझना ज़रूरी महसूस होता है।
हिंदी साहित्य में भक्तिकाल को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। उसमें सगुण और निर्गुण भक्ति धारा है। ईश्वर के मूर्त और अमूर्त रूप, अद्वैतवाद और कई तरह की व्याख्याएं कवियों ने की हैं। विदेशी पृष्ठभूमि पर नज़र डालें तो इमैनुएल कान्ट अपनी पुस्तक ‘क्रिटिक ऑफ़ प्योर रीज़न’ में ईश्वर के अस्तित्व के पारंपरिक तर्कों की कड़ी आलोचना करते हैं। सोरेन कीर्केगार्ड मानते हैं कि ईश्वर को तार्किक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता, और न ही किया जाना चाहिए। ईश्वर में विश्वास केवल एक “विश्वास की छलांग” है। सूफ़ी दार्शनिक इब्न अल-अरबी ने माना कि ईश्वर की अवधारणा व्यक्तिपरक है, और हर व्यक्ति अपने विश्वास के अनुसार ईश्वर का निर्माण करता है।
ये सब विचार हमारी शाइरी में भी अलग-अलग ज़ाविये से नज़र आते हैं। अकबर इलाहाबादी कहते हैं-
तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता
मैं जानता हूं बस तेरी पहचान यही है
यहां ईश्वर जैसी किसी ताक़त के होने को शाइर स्वीकार करता है मगर उसे समझने में असमर्थता ज़ाहिर करता है। यह भी अजीब बात है जिसे समझा ही न जाये, उसे माना कैसे जाये या कि जिसे मान लिया जाये उसे समझने की कोशिश कैसे की जाये? बड़ी उलझन यहां भी दिखायी देती है। सलीम कौसर अपने दो मिसरों में इस बात को यूं समेटते हैं-
मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सरे-आईना मेरा अक्स है पसे-आईना कोई और है
यह बहुत महत्वपूर्ण है कि किसी और को तलाशने से पहले ख़ुद की तलाश करना होती है। जब तक इंसान ख़ुद को न समझ पाये, वह दूसरों को किस तरह समझ सकता है? दौरे-हाज़िर में हो यही रहा है कि जो लोग ख़ुद को नहीं समझ पा रहे हैं, वे अपने-अपने ईश्वर गढ़कर किसी न किसी मज़हब के परचम को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। जैसे निदा फ़ाज़ली का यह मिसरा बार-बार सुनायी दे रहा है, ‘जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है’।
जबकि ईश्वर को समझने के लिए किसी आंख की रोशनी छीनने की ज़रूरत नहीं है। किसी आंख में आंख डालकर डराने-धमकाने की भी ज़रूरत नहीं है। किसी को आंखें दिखाकर किसी धर्म को मानने के लिए बाध्य भी नहीं किया जा सकता है। इसी बात को अगर शाइरी के लहजे में समझें तो कृष्ण बिहारी ‘नूर’ के इस शेर से ताक़त मिलती है-
कैसी अजीब शर्त है दीदार के लिए
आँखें जो बन्द हों तो वो जलवा दिखायी दे
मगर हालाते-हाज़रा का रंग कुछ अलग ही है। यहां आंखें छीनकर रोशनी दिखाने की बात की जा रही है। जबरन किसी न किसी परचम को उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। फ़र्क सिर्फ़ इस बात को समझने का है कि हमारी आस्था हमारा व्यक्तिगत विषय है। किसी की आस्था को न तो बदला जा सकता है न किसी बात के लिए मजबूर किया जा सकता है। किसी की आस्था को चोट भी नहीं पहुंचायी जा सकती। जैसे हर किसी की इबादत की अपनी एक अलग शैली है, अलग परंपरा है। उसे उसी तरह अपनी इबादत करने दीजिए। एक शाइर अगर अपनी इबादत अपने अशआर लिखकर कर रहा है तो उसे उसी तरह अपनी इबादत करने दीजिए। उसके हाथों से क़लम छीनकर उसके हाथों में कोई परचम थमाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
शाइर अपने अहसासों से अपनी एक अलग ही दुनिया रचता है, जिसमें वह अपनी आस्थाओं के रंग भी डालता है और अपनी इबादत के ढंग भी। वह दो मिसरों में कुछ ऐसी बात कह जाता है जिससे किसी के होने या न होने के बारे में सब अपनी-अपनी तरह से व्याख्या कर सकते हैं। अहमद सलमान कहते हैं-
मैं हूँ भी तो लगता है कि जैसे मैं नहीं हूँ
तुम हो भी नहीं और ये लगता है कि तुम हो
किसी के होने या न होने को उन्हीं पर छोड़ देना बेहतर है जो अपने दृष्टिकोण से उसके होने या न होने को महसूस करें। इस दौर में इन कोशिशों में मुब्तिला तंगदिल लोगों से हमारी तहज़ीबें भी शायद यही इल्तिजा कर रही हैं कि नये ईश्वर रचने और ज़ेह्न में नयी दरारें डालने के बजाए आस्था के अपने पैमाने इंसान को ही तय करने दीजिए। ख़ुद भगवान बनने की कोशिश मत कीजिए।

आशीष दशोत्तर
ख़ुद को तालिबे-इल्म कहते हैं। ये भी कहते हैं कि अभी लफ़्ज़ों को सलीक़े से रखने, संवारने और समझने की कोशिश में मुब्तला हैं और अपने अग्रजों को पढ़ने की कोशिश में कहीं कुछ लिखना भी जारी है। आशीष दशोत्तर पत्र पत्रिकाओं में लगातार छपते हैं और आपकी क़रीब आधा दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हैं।
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1 comment on “आंखें छीनकर तो रोशनी न दिखायी जाये”