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पुस्तक चर्चा तीन समीक्षकों की कलम से…

विश्वास होता है, बच्चे गुनगुनाएंगे ये कविताएं

            मनोज जैन ‘मधुर’ मूल रूप से गीतकार हैं। उनके अनेक सुंदर और मधुर गीत-नवगीत हम सब ने पढ़े हैं। मेरा अपना मानना है कि जो गीतकार है, वह बच्चों के लिए जब लिखेगा तो उस रचना में बोधगम्यता होगी। सहजता-सरलता होगी। बच्चे उन गीतों को आसानी से कंठस्थ कर लेंगे। मधुर के पहले बाल कविता-संग्रह ‘बच्चे होते फूल से’ की तमाम कविताएँ इसी निकष पर खरी उतरती हैं।

संग्रह की तमाम कविताओं को पढ़कर मुझे एक बात बहुत अच्छी लगी कि इसमें कवि ने कुछ सुंदर लोरियाँ भी लिखी हैं। लोरियाँ इस समय भारतीय परिदृश्य से लगभग गायब होती जा रही हैं। कवि ने कुछ सुंदर बाल पहेलियाँ भी लिखी हैं। वैसे तो अनेक पहेलियाँ लोक-जीवन में पसरी हुई हैं। लेकिन अब नये ज़माने का दौर है, इसलिए ‘पाँच बाल पहेलियाँ’ और ‘पूछ रहा हूँ एक पहेली’ भी लिखी जानी चाहिए। इन में नयापन है।

…मनोज मधुर की तमाम बाल कविताएँ तो ठीक हैं, लेकिन कहीं-कहीं बाल मन के हिसाब से कठिन शब्द भी आ गये हैं। …’फॉलोअर’ क्या है, ‘फिल्टर’ क्या है, ‘खाते’, ‘रीच’, ‘पैसठ की हूँ फिर भी हॉट’ में यह हॉट क्या है, बच्चे समझ नहीं पाएँगे। ‘रील’, ‘इंस्टा’, ‘फ़िल्टर’, ‘लाइक’, ‘शेयर’ जैसे शब्द बच्चों के शब्दावली मैं अभी पूरी तरह शामिल नहीं हो पाये हैं। माता-पिता अभी भी छोटे बच्चों को मोबाइल से दूर रखते हैं इसलिए छोटे बच्चे ऊपर दिये गये शब्दों से अनजान हैं। बहुत कम बच्चे होंगे, जो इन शब्दों से परिचित हों। लेकिन मैं समझता हूँ कि मनोज जैन ने यह गीत यह सोचकर ही लिखा है कि आज की दुनिया के’ स्मार्ट’ बच्चे इन शब्दों से भी भली-भांति परिचित होंगे। अभी भी भारतीय समाज में बच्चों का एक बहुत बड़ा वर्ग है, जो गाँव-क़स्बे में रहता है।

कुल मिलाकर यह कहना उचित होगा कि मनोज जैन मधुर ने बाल गीतों में एक तरह से नवाचार भी किया है। बाल कविता के बने-बनाये ढर्रे को कुछ तोड़ा भी है। और आज के दौर के बच्चों की दुनिया में जो चीजें घुली-मिली हैं, उन्हें लेकर सुंदर-सुंदर बाल कविताएँ रची हैं। अनेक बाल कविताएँ बच्चों को कंठस्थ हो जाएँगी। कुछ रचनाओं को बच्चे अपने अभिभावकों से भी समझ लेंगे। लेकिन उसे याद ज़रूर कर लेंगे।

…बाल कविताएँ अगर बच्चों को कंठस्थ नहीं होती, तो यह बाल कविता की बहुत बड़ी विफलता है। लेकिन मुझे विश्वास है कि बेहद मधुर भावनाओं के साथ लिखी गयी पुस्तक ‘बच्चे होते फूल से’ की कविताओं को बच्चे ज़रूर गुनगुनाएँगे।

-गिरीश पंकज
(रायपुर, संपर्क: 94252 12720)

बहुउद्देश्यीय बाल कविता संग्रह

गीत विधा और बाल मनोविज्ञान जब एक साथ मिलते हैं तो बहुत सुंदर गेय बाल गीतों का सृजन होता है, जो बच्चों की ज़ुबान पर आसानी से चढ़ जाते हैं और जब इतने सुंदर गीत पढ़ने में आते हैं तो बच्चे क्या, बड़े भी अपने आप को गुनगुनाने से नहीं रोक पाते। सुप्रसिद्ध गीतकार मनोज जैन मधुर ऐसे ही प्यारे गीतों का गुलदस्ता “बच्चे होते फूल से” के नाम से लेकर आये हैं, जिसमें 43 बाल कविता पुष्प हैं जिनके विभिन्न रंग बड़े सलोने और मोहक हैं।

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‘मातादीन’ कविता दस तक गिनती सिखाती मनोरंजक कविता है, जो मनोरंजक तरीक़े से एक से दस की गिनती तक पहुंचती है। इसी तरह ‘जादूगर’ कविता भी चार का पहाड़ा खेल-खेल में याद करा देती है। कविता ‘दिल्ली पुस्तक मेला’ लाक्षणिक शैली में लिखी अद्भुत कविता है, जिसका प्रत्यक्ष उद्देश्य बच्चों को जानवरों के नामों और गुणों से परिचित कराना है परंतु बड़ी उम्र के साहित्यकार पाठकों को दिल्ली पुस्तक मेले की विषमताओं से परिचित कराना है। ग़ज़ब का व्यंग्य है यह। …आजकल लोरियां बहुत कम लिखी जा रही हैं, परंतु मनोज जी ने पांच लोरी गीत लिखकर इस बाल गीत को संपूर्णता प्रदान करने का प्रयास किया है।

वह बाल कविता संग्रह ही क्या जिसमें चूहे बिल्ली पर कविता न हो। प्रत्येक परिवार के सदस्यों की तरह ही होते हैं ये। बच्चों के आमोद-प्रमोद के केंद्र। “चूहों के सरदार ने” बहुत मनोरम कविता है।

कविताओं का सलौनापन देखिए कहीं भालू जी पॉली क्लीनिक चला रहे हैं, तो कहीं नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को जा रही है। कहीं जिराफ़ अपना परिचय ख़ुद दे रहा है, तो कहीं ठंड से थरथर कांपता बंदर स्वेटर बनवाने के लिए भेड़ से ऊन मांग रहा है…

इस बाल कविता संग्रह में मात्र जानवरों पर ही कविताएं नहीं हैं वरन बच्चों को आत्मीय रिश्तों का महत्व समझाती कविताएं हैं। पापा, दादा, मम्मी, बुआ, नाना आदि के प्रति बच्चों के स्नेह की अभिव्यक्ति हैं ये कविताएं। बोध कथाएं, ईश वंदना, हमारा देश, मोबाइल, पानी अनमोल, होली जैसे कई विषयों को समेटने से संग्रह बहुउद्देशीय बन गया है।

पॉलिक्लिनिक, परिश्रावक, अशेष, सर्वस्व, स्वमेव, अखिल विश्व, आराधक, आलोचक जैसे कठिन शब्द छोटे बच्चों की पुस्तकों में लिखने से बचा जा सके तो अच्छा है।

-गोकुल सोनी
(भोपाल, संपर्क: 7000855409)

इस संग्रह का हासिल क्या है?

गीतकार मनोज जैन ‘मधुर’ के बाल काव्य संग्रह ‘बच्चे होते फूल से’ की कविताओं की रंग बिरंगी फुलवारी से गुज़रते हुए यूं लगा मानो मैं ख़ुद अपना बचपन फिर से जी रहा हूँ। काश ऐसा संभव हो कि हर कोई जब जी चाहे अपने बचपन से गुज़र सके और जब जी चाहे तो वापस अपनी वास्तविक अवस्था में प्रवेश पा सके।

काश! ऐसा करिश्मा कर दे यह ए.आई.! ए.आई. करे न करे, लेकिन एक कवि, एक लेखक, एक कथाकार की साधना में वह ताक़त होती है, और वह चाहे तो ऐसा संभव कर सकता है। वह जब चाहे उस स्तर तक जा पहुंचता है, जहाँ श्रोता कहने को मजबूर हो जाता है कि जहाँ न पहुंचे रवि वहाँ पहुंचे कवि। लेकिन क्या यह परकाया प्रवेश यूं ही संभव हो पाता है! नहीं, इसके लिए लंबी साधना की ज़रूरत होती है।

इस काव्य संग्रह की बाल कविताओं ने यह साबित कर दिया है कि एक साधक, एक समर्पित लेखक जब चाहे तब बचपन में उतर सकता है और जब चाहे तब वापस भी आ सकता है।

बाल मन को गीति काव्य अधिक पसंद आता है और उसमें भी यदि कोई कथा कह दी जाये, तो याद भी रहता है और कोई सीख भी मिल जाती है। चौपाई छंद में मातादीन की ऐसी कथा है कि आनंद-आनंद में बच्चा गाता जाये और एक से दस तक की गिनती भी सीख जाये। यह कविता छोटे बच्चों के लिए अधिक उपयोगी साबित हो सकती है।

…’बड़ी बुआ’, एक भावभूमि के और रिश्ते संभालने के लिहाज़ से एक बेहतरीन कविता है। रिश्तों के कैनवास पर बुआ, बच्चों का सबसे प्रिय पात्र है। इसे एक ज़रूरी कविता कहूँगा। एक-दो बंद देखिए:

घर आई हैं बड़ी बुआ
आज बनेगा मालपुआ।

ओढ़ रखा पश्मीना शॉल
लगती हैं कश्मीरी डॉल
होठों पर बिखरी मुस्कान
चबा रही हैं मीठा पान
चाँदी जैसे खिचड़ी बाल
फूले फूले लटके गाल

सर पर हाथ फिरा पूछा
कैसा है मेरा बबुआ?

ये जो सर पर हाथ रखना है और प्यार से पूछना, कैसा है मेरा बबुआ? ये एक पूरी संस्कृति है। इसी तरह, इस गीत के मुखड़े की पूरक पंक्ति को देखें तो मालपुआ भी गाँव की संस्कृति है। इस गीत के अंतरों के पूरक समांत पर ध्यान दें तो मालपूआ, बबुआ, कछुया, महुआ, अहा! ये समान्त केवल शब्द भर नहीं हैं, संवेदनाओं के भरे-पूरे स्रोत हैं। ऐसे स्रोत जहां से रिश्तों को बचाने के सूत्र निकलते हैं…

हमारे बाल साहित्यकारों ने मुंशी प्रेमचंद की ईदगाह के बाद शायद ही कहीं रिश्तों को बचाने पर ध्यान दिया हो। यही कारण है कि आज प्रगतिवाद के नाम पर हम अपनों से दूर होते चले जा रहे हैं। जब तक हमें पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

विभिन्न शिक्षाओं और मूल्यों को बचाने के साथ-साथ रिश्तों को बचाने और, और अधिक मज़बूत करना इस संग्रह का हासिल कहा जा सकता है।

-अनंत आलोक
(सिरमौर, संपर्क: 9418633772)

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