
- March 20, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
बियॉण्ड द रिव्यू भवेश दिलशाद की कलम से....
ऑस्कर न पा सकी 'फ़िलीस्तीन-36' क्या कहती है?
फ़िलीस्तीनी ग्रामीणों को क़ैदी बनाकर जिस बस में लाया जा रहा होता है, उस बम धमाके से उड़ा देने के लिए ब्रिटिश फ़ौजें सड़क पर माइन्स बिछाती हैं। बस वहां से गुज़रती है और एक धमाके के साथ उसके परखच्चे उड़ जाते हैं… कुछ ही पलों में, इस दृश्य में एक काव्यांश गूंजता है, मेरे शब्दों में अनुवाद यूं:
“हम बड़े हुए
इस नाचीज़ ज़मीन से
हमारी नदी ने जाये
फ़िरक़े और खानदान
बनी रही हमारी धुन
कि मरते रहे
हम खड़े हुए
ये मनहूस चौरस ज़मीनें
हड्डी-पसली तुड़वा चुकी ये ज़िंदगी
बावजूद इसके
हम बचे हुए”
2023 में ग़ज़ा पर हुए इज़राइली हमलों में मार दिये गये शायर सलीम अल-नफ़्फ़ार के शब्दों ‘हम बचे हुए’ के ज़रिये सिनेमाई संदेश है कि यह जंग, यह विद्रोह ख़त्म नहीं हुआ है। लगातार बना हुआ है। बात हो रही है फ़िल्म ‘फ़िलीस्तीन-36’ (Palestine 36) की। इन बातों को आगे बढ़ाने से पहले एक याद और…
1969 में बनी थी मिस्र की तब तक की सबसे बड़ी फ़िल्म ‘अल-अर्द’ (The Land)। इसके क्लाइमेक्स में ऐसा दृश्य था, जैसा उससे पहले किसी मिस्री फ़िल्म में देखा न गया था। त्याग दिये जाने और तमाम धोखे खाये जाने के बाद नायक कपास के खेतों के बीच खड़ा है और सामंतवाद के ख़िलाफ़ डटे रहते हुए, ब्रिटिश साज़िशों के अपनी ज़मीन बचाते हुए मारा जाता है। पर्दे पर इस दृश्य में उस नायक को धीरे-धीरे कटते-फटते-घिसटते हुए दिखाया गया। उसका ख़ून कपास के फूलों को रक्तरंजित करता दिखता है और बैकग्राउंड में एक लोकगीत की तरह स्वर गूंजता है, “जब भी ज़मीन प्यासी होगी, मैं उसे अपना ख़ून पिला दूंगा”…
इस फ़िल्म के इस क्लाइमेक्स को जेरुसलम के शोध अध्येता हुसैन अबूबकर मंसूर अपने लेख में डिकोड करते हुए 1967 के उस वाक़ये पर रोशनी डालते हैं, जब मिस्र के नासिरवाद (मिस्र के नेता नासिर को अरब कम्युनिस्टों का भारी समर्थन मिला था) की शक्ल में इज़राइल के हाथों अरब राष्ट्रवाद की ताक़तों की करारी हार हुई थी। उसके बाद किस तरह समाज का हौसला टूटा था और वह नयी उम्मीद के सिरे खोज रहा था…

यह एक पूरा अलग अफ़साना है, अफ़साना भी क्या एक पूरा अतीत और इतिहास भी है, जिसे कभी फिर कहीं खोला-टटोला जाएगा। अभी लौटते हैं ‘फ़िलीस्तीन-36’ पर, जिसके क्लाइमेक्स का दृश्य देखने वालों के मन में एक ख़याल उठता है कि जो आंदोलन/विद्रोह कुछ बरसों से चल रहा था, 1938—39 में इस तरह के क्रूर दमन से ख़त्म कर दिया गया! फिर एक कविता से उस जंग के लगातार जारी रहने का ऐलान करती है, हालांकि उस तरह नहीं, जिस तरह का प्रतीक वह दृश्य करता है जिसमें नायक के ख़ून से कपास ख़ून से सन रहा है…
‘फ़िलीस्तीन-36’ 2025 में रिलीज़ हुई है और फ़िलीस्तीन की तरफ़ से 2026 के ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भेजी गयी, ‘सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म’ श्रेणी में शॉर्टलिस्ट भी हुई। पश्चिमी मीडिया ने इस फ़िल्म को ख़ास तवज्जो नहीं दी है, लेकिन सिने समीक्षकों और आलोचकों का एक वर्ग है, जिसने इस फ़िल्म को सर आंखों पर बैठाया। इन समीक्षाओं को पढ़कर लगता है इस वर्ग की एक साझा समझ यह भी है कि इस फ़िल्म ने इतिहास के कमसुने या तक़रीबन अनसुने अध्यायों को न सिर्फ़ खोल दिया है बल्कि उस नैरैटिव को ज़िंदा कर दिया है, जो बहस और चिंतनों में अब तक कहीं जगह ही नहीं पा सका।
फ़िलीस्तीन और इज़रायल के बीच जो संघर्ष चल रहा है, पिछले दशकों से चलता चला जा रहा है, उसकी जड़ें कहां हैं? या उसकी जड़ों में जो कुछ है उसका एक अहम सिरा अंग्रेज़ों की साज़िशों से कैसे जुड़ा हुआ है? ऐनेमैरि जासिर निर्देशित ‘फ़िलीस्तीन-36’ इस कहानी को केंद्र में रखती है और उस इतिहास को सामने लाती है, जिसे ब्रिटिश पसंद नहीं करते और प्रकारांतर से जिसे यूरोप के वर्चस्व वाली दुनिया में न तो बांचा जाता है और न ही ठीक से स्वीकार किया जाता है।
दुनिया के इतिहास के अध्ययन में अरब के इतिहास को कितनी तवज्जो दी जाती है? यह सवाल भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी जाएज़ है। कितने भारतीय पाठक, अध्येता जानते होंगे कि फ़िलीस्तीन में 1936-39 का विद्रोह इस क़दर बढ़ गया था कि अंग्रेज़ी हुकूमत को कुल भारत में तैनात सैनिकों से ज़्यादा संख्या में सैनिक इस छोटे से मुल्क में कुछ वक़्त के लिए तैनात करना पड़ गये थे (फ़िलीस्तीनी इतिहासकार राशिद ख़ालिदी के मुताबिक़)।
‘फ़िलीस्तीन-36’ का ताना-बना जेरुसलम या यरूशलेम और फ़िलीस्तीन के अल बासा गांव के बीच बुना गया है। यूसुफ़ इस गांव का बाशिंदा है और जेरुसलम के नामचीन पत्रकार, अमीर के यहां ड्राइवरी करता है। इस फ़िल्म में यूसुफ़ की दोस्त युवा विधवा रबाब है और उसका परिवार भी। एक ईसाई पादरी है और ग्रामीण परिवेश में एक स्वतंत्रता सेनानी ख़ालिद भी। इधर, जेरुसलम में अमीर की बीवी ख़ुलौद है, जो एक पुरुष नाम से लेख लिखती है और फ़िलीस्तीनों की आवाज़ उठाती है। अमीर मुंह पर तो ख़ुद को फ़िलीस्तीनियों का पैरोकार दिखाता है और पीठ पीछे ब्रिटिश अफ़सर विंगेट के साथ फ़िलीस्तीनियों के ख़िलाफ़ साज़िश में शामिल होता है। ये दोनों और ख़ास तौर से विंगेट खलनायक के रूप में उभरता है।
ये दो पात्र दिखाते हैं कैसे अंग्रेज़ी हुकूमत इज़रायलियों को एक ताक़त के केंद्र के रूप में उभारने के लिए फ़िलीस्तीनी ज़मीन पर आधिपत्य देती है और उसके पीछे उसका अपना उपनिवेशवाद का ही एजेंडा है। इसी साम्राज्यवादी सोच और उसके ख़िलाफ़ खड़ी हुई फ़िलीस्तीनी यूसुफ़ के विद्रोह के सोच के बीच तनाव व संघर्ष को फ़िल्म पर्दे पर लाती है और न सिर्फ़ कलाकारों और बल्कि इतिहास के चाहने वालों को भी कई अवसर देती है।
हाल ही, घोषित हुए ऑस्कर पुरस्कारों में ‘वन बैटल आफ़्टर अनदर’ का नाम ज़ोर से भले ही गूंजा लेकिन इसके बरअक्स ‘फ़िलीस्तीन-36’ को देखना किसी शोध से कम नहीं। कुछ समीक्षक तो यह भी बेहिचक कहते रहे कि इन दोनों में से चुनना हो तो ‘फ़िलीस्तीन-36’ का पलड़ा ही भारी है। अंतरराष्ट्रीय पत्रकार जो गिल के लेख का एक हिस्सा कहता है:
हॉलीवुड के फ़िल्मकारों ने समय-समय पर विद्रोह और प्रतिरोध पर्दे पर लाने के लिए अपने कंफ़र्ट ज़ोन से बाहर जाकर कुछ जिगर दिखाया है और इस संदर्भ में भी पॉल एंडरसन की हालिया फ़िल्म ‘वन बैटल आफ़्टर अनदर’ जैसी यथार्थवादी फ़िल्म भी देखी जा रही है। लेकिन हिरासत में लिये गये प्रवासियों को आज़ाद करवाने के रोमांचक विचार से शुरू होने वाली यह यह फ़िल्म भी आख़िर तक आते-आते एक और हॉलीवुडिया मनोरंजन बनकर रह जाती है, जिसमें विचार दम तोड़ बैठता है।
फ़िलीस्तीन की उस कहानी को ऑस्कर न मिलना, जो यूरोप को असहज करती है, कोई अजूबा नहीं है। लेकिन यह फ़िल्म अपने आप में महत्वपूर्ण है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। विधिवत यह फ़िल्म कब रिलीज़ होगी? भारत में किस तरह क़ानूनी ढंग से देखी जा सकेगी? कहना अभी मुश्किल है पर फ़िल्मोत्सवों में यह सराही जा रही है और इसके बारे में जो कुछ चर्चा है, उसे पढ़कर दो बातें मैं इस लेख के अंत में कहना चाहता हूं।
एक तो यह फ़िल्म ‘अरब राष्ट्रवाद’ को समझने के लिए एक जिज्ञासा पैदा करती है, जो तक़रीबन एक अछूता विषय रहा है। इस्लामी व्यवस्थाओं में मार्क्सवाद, प्रगतिशील विचार, वामपंथ और नव वामपंथ के उभरने और उनके पतन के साथ ही, भीतर ही भीतर पनप रहे विद्रोहों को समझने का स्कोप इस विषय के तहत निकलता है। एक नयी दुनिया के दरवाज़े खोलने के लिहाज़ से मुझे इस फ़िल्म को और बेहतर ढंग से जानने की ज़रूरत महसूस होती है।
दूसरे यह कि इस वक़्त दुनिया जाने कितने तरह के ‘राष्ट्रवादों’ के ढकोसलों में फंसी हुई दिख रही है। सिनेमा भी इस लहर से मुनाफ़ा कमाने में पीछे नहीं है। दो कौड़ी की सियासत सिनेमा सहित न जाने कितने क्षेत्रों को करोड़ों, अरबों कमाने का मौक़ा दे रही है। और इस मौक़े की क़ीमत समाज कितने स्तरों पर चुका रहा है। ऐसे में, यह समझना कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी एजेंडा के तहत दो फ़िरक़ों को आपस में लड़ाने की सियासत फ़िलीस्तीन के वर्तमान हालात की जड़ में है, हमारे लिए भारत के माहौल के पीछे इतिहास के संदर्भों से तालमेल भी दिखाता है। तो, ‘फ़िलीस्तीन-36’ के बहाने, यहां से ‘राष्ट्रवाद लहर के साथ सिनेमा की जुगलबंदी’ और ‘मौजूदा सांप्रदायिक कट्टरताओं के इतिहास में ब्रिटिश उपनिवेशवाद’ जैसे दो और अध्ययनों का स्कोप निकलता है।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
