
- March 27, 2026
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विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
साबरमती के संत का स्वर: 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम'
भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में कुछ धुनें ऐसी हैं जो केवल कानों को सुकून नहीं देतीं, बल्कि एक राष्ट्र के चरित्र का निर्माण करती हैं। उन दिनों प्रभात फेरी की परंपरा थी, जिसमें देशभक्ति के गीतों और भजनों के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम सभी सहजता से जुड़ते थे। इन्हीं कालजयी रचनाओं में से एक है ‘रघुपति राघव राजा राम’। गांधीजी की प्रार्थना सभाओं से निकलकर जन-जन के कंठ का हार बनी यह धुन आज भी उतनी ही जीवन्त है, जितनी दांडी यात्रा के समय थी। मूल भजन के बोल थे:
“रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम॥
सुंदर विग्रह मेघश्याम, गंगा तुलसी शालिग्राम॥
भद्रगिरीश्वर सीताराम, भगत-जनप्रिय सीताराम॥”
यह पूरी तरह से भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम की स्तुति को समर्पित एक पारंपरिक वैष्णव भजन था, जो भक्तिरस में डूबा हुआ था। गांधीजी ने 1930 की ऐतिहासिक दांडी यात्रा के दौरान इसे अपने सत्याग्रहियों के साथ गाया। ईश्वर को एक मानने वाले गांधीजी का विश्वास था कि उसे अलग-अलग नामों से पुकारना मनुष्य की अपनी अभिव्यक्ति है। इसी भावना से उन्होंने इस पारंपरिक भजन में एक क्रांतिकारी बदलाव करते हुए प्रसिद्ध पंक्ति जोड़ी:
“ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको सम्मति दे भगवान।”
यह परिवर्तन केवल संगीत का विषय नहीं, बल्कि भारत की साझी विरासत और ‘सर्वधर्म समभाव’ के दर्शन का जीवंत दस्तावेज़ है।

मूल रूप से यह भजन सत्रहवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध वैष्णव संत श्री लक्ष्मणाचार्य द्वारा रचित ‘श्री नामापराध स्तोत्र’ का एक अंश माना जाता है। भक्ति की यह भजन सरिता सदियों तक मंदिरों और मठों में गूँजती रही, लेकिन बीसवीं शताब्दी में गांधीजी ने इसे एक नया आध्यात्मिक और सामाजिक आयाम प्रदान किया।
गांधीजी की दृष्टि में राम केवल एक ऐतिहासिक पुरुष या मूर्ति नहीं थे, बल्कि सत्य और नैतिकता के उस परम स्वरूप के प्रतीक थे, जिसे हर धर्म अपने ढंग से पुकारता है। यही कारण था कि उन्होंने इस भजन की आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए उसमें वह क्रांतिकारी पंक्ति जोड़ी।
पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर द्वारा तैयार की गई सुमधुर शास्त्रीय धुन ने इसे एक राष्ट्रीय प्रार्थना में बदल दिया। गांधीजी का यह प्रयोग महज शब्दों का हेरफेर नहीं था, बल्कि एक विभाजित समाज को जोड़ने का जादुई मंत्र था। उन्होंने ‘सम्मान’ के स्थान पर ‘सम्मति’ शब्द का चयन किया, क्योंकि उनकी प्रार्थना थी कि ईश्वर सबको वह सद्बुद्धि (सम्मति) प्रदान करे, जिससे लोग एक-दूसरे के धर्म और अस्तित्व को स्वीकार कर सकें।
आज के दौर में, जब वैश्विक स्तर पर वैचारिक कट्टरता और अपनी अलग पहचान स्थापित करने की होड़ का संकट गहरा रहा है, साबरमती के संत का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह भजन हमें याद दिलाता है कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता को स्वीकार करने वाली एकता में है। ‘पतित पावन’ का संबोधन यहाँ केवल धार्मिक अर्थों में नहीं, बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के उत्थान के संकल्प के रूप में उभरता है। गांधीजी ने धर्म को मंदिर की चारदीवारी से निकालकर लोक कल्याण और राष्ट्र निर्माण का साधन बनाया, और यह भजन उसी दर्शन का संगीतमय प्रतिनिधित्व है।
वैचारिक दृष्टि से ‘ईश्वर अल्लाह तेरे नाम’ केवल एक भजन नहीं, बल्कि वह सांगीतिक सेतु है जो प्राचीन भारतीय परंपरा को आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ता है। यह प्रार्थना आज भी हर भारतीय से यही संवाद करती है कि सत्य के मार्ग अलग हो सकते हैं, लेकिन मंजिल एक ही है। जब तक यह धुन गूँजती रहेगी, भारत का वह समावेशी विचार सुरक्षित रहेगा, जिसकी कल्पना बापू ने की थी। यह स्वर कल भी प्रासंगिक था, आज भी है और आने वाले कल की चुनौतियों के समाधान के रूप में भी अटल रहेगा।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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