
- March 31, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग विवेक मेहता की कलम से....
नामचीन साहित्यकारों के रोचक कटाक्ष-3
पिछली दो कड़ियों में हिंदी साहित्य जगत के स्वनामधन्य लेखकों/कलमकारों के बीच के चुटकुले/कटाक्ष/हास्य लहरियों को यहां प्रस्तुत किया गया। इस बार रस-परिवर्तन के लिहाज़ से हिंदी पट्टी से बाहर का रुख़ करते हैं और भारत के विभिन्न कोनों के कुछ लेखकों के ऐसे रोचक एवं चुटीले प्रसंगों का जाएज़ा लेते हैं। उन रंग-बिरंगी यादों के माध्यम से हास्य-व्यंग्य की बात करते हुए गुदगुदाने का काम यह प्रस्तुति कर रही है, ऐसी आशा है। अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत करवाते रहिए…

ख़ूब ख़बर ली!
बंगाल की हर पत्र-पत्रिका के संपादक को मालूम था कि कथाकार मानिक बंद्योपाध्याय से प्रेस-कॉपी निकालना बड़ा कठिन काम है। ईमानदारी से ही वह कह देते थे कि “कल दे दूंगा” लेकिन फिर भी अपना वादा पूरा नहीं कर पाते थे।
उन दिनों ‘परिचय’ मासिक में उनका ‘जीयन्त’ नामक उपन्यास धारावाहिक रूप से निकल रहा था। ‘परिचय’ की ओर से तीन बार आदमी जाकर जब बिना किस्त लिये लौट आया तो चिन्मोहन सेहानबीश ने उन्हें एक ख़त यों भेजा: “जीयन्त की अगली किस्त अगर कल बारह बजे तक प्रेस नहीं पहुंची तो मैं ख़ुद ही उसे लिखने को मजबूर हो जाऊंगा। उसमें शायद आपको मिलेगा कि आपके नायक को शेर ने धर दबोचा है, नायिका पागल हो गयी है, उप नायक और उप नायिकाएं आत्महत्या या वैसा ही कोई कांड कर बैठी हैं। लुब्बेलुबाब यह कि ऐसी गड़बड़ी मैं उसमें कर दूंगा कि स्वयं गोर्की, टालस्टाय और चेखव भी उस उपन्यास को दुरुस्त नहीं कर सकेंगे। आप ही का नाम उपन्यास के लेखक के रूप में जाएगा अतः आख़िरी बार आप से इस मामले पर ग़ौर करने को कहता हूं कि क्या ऐसा करना सही होगा?”
अगले दिन बारह बजे के अंदर ही उपन्यास की किस्त मिल गयी थी। साथ में छोटा-सा रुक्का भी था, “भई, ख़ूब ख़बर ली!”
***
मौत की ज़िम्मेदारी
गुजराती के प्रसिद्ध गांधीवादी कथाकार बेटाई एक महिला विश्वविद्यालय में काम करते। वहां उन्हें प्रायः अध्यापिकाओं और छात्राओं से ही काम पड़ता था। एक दिन एक छात्रा उनके पास हिचकती हुई आयी और बोली, “मैं बड़े धर्मसंकट में हूं। एक युवक मेरे पीछे पागल है। कहता है कि मेरे बिना वह रह नहीं सकता और अगर मैंने उससे शादी न की, तो वह आत्महत्या कर लेगा!”
बेटाई ने पूछा, “तो तुम उससे विवाह क्यों नहीं कर लेतीं?”
लड़की बोली, “लड़का है तो अच्छा, किंतु इतना अच्छा नहीं कि में उससे शादी कर लूं… मैंने जो तस्वीर सोची है, वह वैसा नहीं। बताइए, उससे छुटकारा पाने का कोई उपाय है?”
बेटाई ने कहा, “हां, है और बड़ा सरल। उससे साफ़-साफ़ कह दो कि जिस तरह उसके जन्म के लिए तुम ज़िम्मेदार नहीं, उसी तरह उसकी मृत्यु के लिए भी तुम ज़िम्मेवार नहीं रहोगी”।
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सबके सामने
वर्षों पूर्व बंबई के एक होटल में चंद्रकांत बक्षी के एक मित्र ने बीस-पच्चीस साहित्यिकों को निमंत्रण दिया था। निमंत्रितों में पुरानी-नयी पीढ़ी के कहानी-उपन्यासकार तथा आलोचक भी थे। दावत शुरू होने से पहले मित्र ने सुझाव दिया कि आरंभ में परिचय हो जाये। चूंकि चंद्रकांत बक्षी क़रीब-क़रीब सभी को पहचानते थे, तो यह काम उन्हें सौंपा गया। वातावरण को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सभी का अनौपचारिक परिचय देना शुरू किया।
गुजराती उपन्यासकार तथा फ़िल्म-डाइरेक्टर सारंग बारोट की बारी आने पर उन्होंने कहा, “बारोट साहब के बारे में एक बात कहने लायक़ है। वह बहुत अच्छी गालियां देते हैं!”
कुछ लोग मुसकराये। एक नये उत्साही आलोचक से रहा न गया, उन्होंने सारंग बारोट की ओर देखते हुए व्यंग्य में पूछा, “सच..?”
दो-तीन सेकेंड आलोचक के चेहरे को ताक कर सारंग बारोट ने ठंडक से कहा, “क्यों, आपको इन सबके सामने सुनने की इच्छा हुई है? सुनाऊं?”
***
जिसे छुआ वह सोना हो गया
उर्दू के नवयुवक आलोचक महमूद हाशमी हिंदी आलोचक नामवर सिंह के एक व्याख्यान ‘अक्तूबर क्रांति का हिंदी लेखन पर प्रभाव’ की चर्चा काफ़ी रस ले-लेकर कर रहे थे। नामवर सिंह ने उसमें कहा था कि अक्तूबर क्रांति एक ऐसा पारस पत्थर है, जिसने उसे छुआ वह सोना हो गया। हाशमी पूरा व्याख्यान दुहराने की चेष्टा में थे कि रामकिशोर द्विवेदी ने बीच में ही टोककर कहा, “हाशमी साहब! आप सिर्फ़ उन लेखकों के नाम बतला दें, जिनका नामवर जी ने स्मरण किया था। भाषण सार हम अपनी ओर से समझ लेंगे।”

विवेक मेहता
पॉलिटेक्निक के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से प्रसारित भी। कुछ समाचार-पत्रों के कॉलम 'किस्से बदरंग कोरोना के संग, 'वेताल कथाएँ', 'बेमतलब की' चर्चित रहे। संपर्क: 94272 67470
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