
- March 31, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....
HPV वैक्सीन और फर्टिलिटी: रिपोर्ट्स व दावे
इधर जिस तरह सरकारी प्रचार तंत्र एचपीवी वैक्सीन के प्रचार में लगा है, वो लगभग कोविड टाइम की याद दिला रहा है। मैंने भी इसके तथ्यपरक विश्लेषण का प्रयास किया। यद्यपि इस पर पहले भी कई बार लिख चुका हूं लेकिन हर बार एक नया मुद्दा मिल जाता है।
अभी तक हम क्या जानते हैं? इस प्रश्न पर विचार किया तो HPV वैक्सीन और प्रजनन क्षमता (fertility) के बीच संभावित संबंध पर कुछ स्वतंत्र केस रिपोर्ट्स सामने आयी हैं। इनमें ओवेरियन फेल्योर (ovarian failure), प्राइमरी ओवेरियन इंसफिशिएंसी (POI), समय से पहले मेनोपॉज़ यानी मासिक धर्म का रुक जाना (amenorrhea) और हार्मोनल बदलाव जैसे प्रभाव शामिल हैं। ये केस कम संख्या में हैं, लेकिन लगातार सामने आते रहे हैं।
उपलब्ध डेटा के अनुसार, HPV4 (Gardasil) से जुड़े 389 ओवेरियन फेल्योर/POI की रिपोर्ट (जो कि अभी भारत में लगायी जा रही है) HPV9 (Gardasil-9) से जुड़े 27 मामले, HPV2 (Cervarix) से जुड़े 2 मामले, जिसमें से 18 मामले ऐसे जो क्लिनिकल मानदंडों को पूरा करते हैं। इनमें से 11 मरीज़ों की केस रिपोर्ट प्रकाशित साहित्य में दर्ज हैं।
इसके अलावा सैकड़ों संकेत मासिक धर्म अनियमितता, अमेनोरिया और हार्मोनल बदलाव से जुड़े हैं।
अब तक के अध्ययनों से
नेचर (Nature) में प्रकाशित एक अध्ययन ने अमेरिका के VAERS (Vaccine Adverse Event Reporting System) के 2006 से 2018 तक के डेटा का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि HPV वैक्सीन से जुड़े प्रजनन संबंधी बीमारियों की कुल 34,812 रिपोर्ट्स दर्ज की गयीं थीं।
एक अन्य विश्लेषण में यह भी सामने आया कि वैक्सीन लेने वाली महिलाओं में प्रति मासिक चक्र गर्भधारण की संभावना कम पायी गयी। इसी विषय पर एक पेपर “Lower Probability of Pregnancy among Vaccinated Women” जर्नल से हटा दिया गया, जबकि वह अभी भी PubMed पर सूचीबद्ध है।
कुछ समीक्षा अध्ययनों में HPV4 और प्राइमरी ओवेरियन इंसफिशिएंसी के बीच संभावित संबंध को स्वीकार किया गया है। दूसरी ओर, कुछ अध्ययन ऐसे भी हैं जिन्हें इस तरह के संबंध के लिए “पर्याप्त प्रमाण नहीं” मिला। लेकिन इनमें से कई अध्ययन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से फ़ार्मा फ़ंडिंग से जुड़े हुए हैं। अतः इनकी विश्वसनीयता विवादास्पद है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण पहलू ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया का भी है। HPV वैक्सीन के साथ ऑटोइम्यून इवेंट्स की चर्चा होती रही है और यह स्थापित तथ्य है कि ऑटोइम्यून स्थितियां बांझपन के जोखिम को 11% तक बढ़ा सकती हैं।
आज भी लगभग 37% बांझपन के मामलों को “idiopathic” यानी अज्ञात कारणों वाला माना जाता है- यानी कारण स्पष्ट नहीं है।
वैश्विक डेटा यह भी दिखाता है कि 1990 से 2021 के बीच महिला बांझपन के मामलों में वृद्धि हुई है, और 2010 के आसपास इसमें एक स्पष्ट उछाल दिखायी देता है। यह उछाल किस कारण से है, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
इसी के साथ, infertility treatment का वैश्विक बाज़ार भी तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसमें 2026 से 2033 के बीच लगभग 8.8-10% CAGR की वृद्धि का अनुमान है।
जब भी कोई सरकारी महकमा अति उल्लास के साथ काम करता है, तो मन में शंका उठना स्वाभाविक है।
हाल के समय में HPV वैक्सीन को लेकर एक आक्रामक प्रचार देखा जा रहा है, विशेषकर स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा। सोशल मीडिया पर लगातार संदेश दिये जा रहे हैं, जिनमें वैक्सीन को पूरी तरह सुरक्षित और आवश्यक बताया जा रहा है।
जब उपलब्ध वैज्ञानिक डेटा को एक साथ देखा जाता है, तो तस्वीर उतनी सीधी नहीं दिखती। यहीं एक स्पष्ट विरोधाभास सामने आता है। वैक्सीन निर्माता कंपनी Merck के आधिकारिक दस्तावेज़ (Gardasil 9 product insert) में कंपनी यह स्पष्ट रूप से लिखती है कि यह वैक्सीन:
- सभी प्रकार के HPV (लगभग 12 उच्च-जोखिम प्रकार) से सुरक्षा नहीं देती; वर्तमान में दी जा रही वैक्सीन केवल कुछ सीमित प्रकार (जैसे HPV4 में 4 प्रकार) से ही सुरक्षा देती है।
- यह पहले से मौजूद HPV संक्रमण को नहीं रोकती।
- यह हर व्यक्ति में पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं देती और न ही यह नियमित जांच (screening) का विकल्प है।
लेकिन दूसरी तरफ़, उपलब्ध रिपोर्ट्स और डेटा में प्रजनन संबंधी समस्याओं के संकेत लगातार दर्ज होते दिखते हैं। यानी, दावों और रिपोर्टेड डेटा के बीच सीधा मेल नहीं बैठता।
अब सवाल केवल वैज्ञानिक डेटा का नहीं है, बल्कि दावों का है।
एक तरफ़ वैक्सीन निर्माता कंपनियाँ, विशेषकर Merck, अपनी वैक्सीन को सुरक्षित बताती हैं। दूसरी तरफ़, भारत का स्वास्थ्य मंत्रालय उन्हीं दावों को लगभग उसी रूप में दोहराते हुए लगातार प्रचार कर रहा है।
लेकिन इस पूरे विमर्श में एक महत्वपूर्ण कमी है- स्वतंत्र, दीर्घकालिक भारतीय डेटा की अनुपस्थिति।
जब हज़ारों की संख्या में adverse event reports मौजूद हैं, जब केस रिपोर्ट्स और सिग्नल्स सामने आ चुके हैं, तब केवल “सुरक्षित” का दावा करना पर्याप्त नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि HPV वैक्सीन का संभावित प्रभाव तुरंत नहीं, बल्कि 15-20 साल बाद स्पष्ट हो सकता है- ख़ासकर जब वैक्सीन 9 साल की उम्र में दी जाती है।
पूरे विवाद का एक ही सीधा समाधान
2009 में जिन 24,000 से अधिक लड़कियों को HPV वैक्सीन दी गयी थी, उनके दीर्घकालिक प्रजनन डेटा को सार्वजनिक किया जाये। जब तक यह डेटा सामने नहीं आता, तब तक यह बहस जारी रहेगी। और केवल दावों के आधार पर निष्कर्ष निकालना संभव नहीं होगा। जब तक सरकार उन लड़कियों का वास्तविक, दीर्घकालिक डेटा सार्वजनिक नहीं करती जिन्हें यह वैक्सीन दी गयी थी, तब तक वैक्सीनेशन को रोका जा सकता है- कोई जल्दबाज़ी ज़रूरी नहीं है।
हम मानव शरीर जैसे सबसे जटिल तंत्र के साथ काम कर रहे हैं, जहाँ अधूरी जानकारी के आधार पर निर्णय लेना घातक ही है।

डॉ. आलोक त्रिपाठी
2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।
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