
- May 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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मेरे हिस्से का क़िस्सा... आब-ओ-हवा पर एक विशेष शृंखला। उम्र और सृजन का बेहतरीन सफ़र कर चुके हस्ताक्षरों की कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी। इस सिलसिले की शुरूआत भोपाल के वरिष्ठतम कवि, गीतकार की यादों के लेखे-जोखे से, जो 31 दिसंबर 2026 को शतायु होने जा रहे हैं।
यतींद्रनाथ राही की कलम से....
जो है मेरा है, अपने समय का सच है
‘आप अपना आत्म-कथ्य दे दीजिए।’ संकोच तो होता है, हँसी भी आती है, अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनने की बात है। पर अब मियाँ मिट्ठू बनें या मुर्गा, अपने भोर की बाँग तो हमें ही देनी है- यों है कि अब से 99 साल पहले की बहुत पुरानी बात है, दूर उत्तर प्रदेश के एक बड़े और प्रतिष्ठित गाँव के छोटे-से ज़मींदार परिवार के श्री गुलाब सिंह यादव के घर माँ सत्यवती देवी की कोख से रजपाल सिंह का अवतरण हुआ। जो पाँच वर्ष में स्कूल आते-आते यतीन्द्रनाथ हो गया।
पिता जी और दादा काम-चलाऊ उर्दू पढ़े थे। ‘घर में हिंदी की पुस्तक तो क्या एक काग़ज़ का टुकड़ा भी नहीं मिलता था। ननिहाल जाते थे तो मामा लोगों की पढ़ी रद्दी किताबें बटोर लाते थे। चौथी कक्षा में बीमार पड़ गये, दस-बारह दिन घर में ही रहे, क़िस्मत से लल्लूलाल जी का ‘ब्रज विलास’ मिल गया। पूरा चाट गये। बचपन की कृष्ण लालाएँ गोपियों की प्रेम कहानियाँ, अबोध मन में जैसी भी उतरी हों, शृंगार और प्रेम दर्शन आज तक समझ रहा हूँ। मिडिल में देवकीनंदन खत्री की चन्द्रकान्ता भी पढ़ने मिल गयी। लोग तब उसे हिंदी सीखने को पढ़ते थे। बाद में तो चन्द्रकांता सन्तति और भूतनाथ भी पढ़ डाला।
ब्रिटिश हुकूमत थी स्कूल में प्रार्थना के बाद गाते थे-
यशस्वी रहें और रहें नित सुखारे
चिरंजीव राजा व रानी हमारे।
पर गलियों में प्रभात फेरियों में आज़ादी के उभरते स्वर थे-
विजय विश्व तिरंगा प्यारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा…
आम आदमी तो बस-‘कोऊ नृप होइ, हमें का हानी।’
मन में कुछ-कुछ आने तो लगा था, चौक में आल्हा सुनते थे तो भुजाएँ फड़क उठती थीं। छठवीं में आठ-दस पंक्ति की आल्हा लिख डाली। चाचा ने पढ़ ली तो डाँट पेल दी। झेंप के रह गये। नवीं कक्षा में एक ललित निबंध लिखा ‘आँसू आज तुम्हारा यह उपहास’ इंटर कॉलेज की पत्रिका में छप गया। प्रशंसाएँ भी मिलीं, लिखने के प्रति रुचि जागी। 11वीं में आते प्रेमचंद्र को पढ़ा तो चार कहानियाँ लिख डालीं। दो कहानियाँ ‘मधुकर’ उपनाम से स्थानीय पत्रिका में छप भी गयीं। हम कहानीकार हो गये, पंख लग गये। हिंदी के व्याख्याता महोदय से श्री भगवतीचरण वर्मा का ‘प्रेम संगीत’ पढ़ने को मिला तो काव्य के कितने निर्झर एक साथ फूटे, कहानी पीछे छूटी और ‘मधुकर’ यतीन्द्रनाथ राही हो गया।

इसी बीच एक अभूतपूर्व मांगलिक घटना हुई, महाप्राण निराला के दर्शन। सन् 1953 की बात है, मैनपुरी उ.प्र. में अखिल भारतीय ब्रज साहित्य सम्मेलन का आयोजन था। उसी में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रही थीं महादेवी जी और मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे महाकवि निराला.. इस शर्त पर कि कविता नहीं पढ़ेंगे। संचालक थे श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’। 45 मिनट का रेडियो प्रसारण था।
रंग जी की शिराओं को झंकृत करने वाली रचना को सुनकर निराला जी स्वतः माइक पर आ गये, महाकवि निराला की जय से मंच और पण्डाल गूँज उठा। हम अवाक् सुनकर देख ज़्यादा रहे थे, बादलों के मन्द्रख-सी कविता ‘शिवाजी को पत्र’ निराला जी झूम-झूम कर पढ़ रहे थे। कविता सुमन जी के हाथ में, जिधर निराला उधर माइक, थरथराता मंच और भाव-विभोर उत्तेजित श्रोता। अचानक निराला रुके और चल दिये। साहस नहीं था किसी में रोके उन्हें। उन्हीं के साथ जाना पड़ा महादेवी जी, विद्यावती और सुमित्रा कुमारी को, पर जन समाज को जाने क्या अमरत्व मिल गया था।
कुछ ही क्षणों में काव्य का यह अभूतपूर्व विराट् व्यक्तित्व दर्शन मैं कभी भूल नहीं पाऊँगा। वर्षों तक उसे शब्द देने के लिए आतुर रहा। 2009 में सौभाग्य मिला, मैंने लिखा- ‘महाप्राण’ यह खण्ड काव्य मेरे जीवन की अनूठी काव्य कृति बना। बहुत प्रशंसाएँ और सम्मान मिले मुझे। मैनपुरी में मुझे विशेष रूप से सम्मानित किया गया। भूमिका में देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ ने मुझे सिद्धावस्था का कवि कहा था।
1954 से 56 तक का समय जीवन और काव्य का मनोरम समय था, हम आगरा कॉलेज में एम.ए. के छात्र थे। यहाँ हमारा एक साहित्यिक नक्षत्र मण्डल था। देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ जगत प्रकाश चतुर्वेदी, सुखराम सिंह चौधरी, दीनानाथ श्रीवास्तव और मैं ज्यादा ही घनिष्ठ थे। बाद में सोम ठाकुर भी आ गये थे। 15 दिन में एक बार काव्य गोष्ठी होती थी। हमारे संरक्षक, मार्गदर्शक थे प्रो. पद्म सिंह शर्मा कमलेश और प्रो. घनश्याम अस्थाना चयनित रचनाएँ कॉलेज की षट्मासिक पत्रिका में छपती थीं। दो वर्ष में मेरी तीन रचनाएँ छपी थीं। एक शृंगार गीत ने मुझे बहु-परिचित करा दिया था-
मैं तारे गिन रहा, उन्हें भी नींद न आती होगी
मुझे किसी की याद सताती, उन्हें रुलाती होगी
इन्द्र जी और जगत प्रकाश मेरे बहुत अभिन्न रहे। इन्द्र जी तो हिंदी साहित्य के दृढ़ स्तम्भ और नवगीत के पुरोधाओं में से एक। इस बीच अच्छी छायावादी रचनाएँ हुईं। 1956 के अंत में नौकरी की तलाश में हम भोपाल आ गये। अगस्त 56 में हा. से. स्कूल, बेगमगंज में पहली पोस्टिंग मिली। सघन जंगल-पर्वतों के बीच कल-कल, छल-छल बहती नदियाँ, रिपटा पुलों पर बहते पानी में उतरती बस, मन काँप जाता था। पहली बार राहतगढ़ का जलप्रपात देखा तो जैसे स्वर्ग उतर आया, मैंने पहली कविता लिखी-
ओ राहतगढ़ के जल प्रपात।
यह रचना मेरे प्रकृति काव्य की मील का पत्थर बन गयी। मुझे राहतगढ़ के जलप्रपात वाले कवि का नाम मिल गया। यद्यपि इसके बाद हिमाचल और दुबई के सागर तट की भी सुंदरतम रचनाएँ हुईं, पर राहतगढ़ का स्थान स्मरणीय है।
1961 में स्थानांतर पर खिड़किया, होशंगाबाद आ गये। 62 में चीन के आक्रमण ने देश की ऊर्जा जगा दी। जवानी में आग फूकती रचनाएँ आ रही थीं। प्रकृति और प्रेम का ‘राही’ ऊर्जास्वित रचनाकार हो गया। मंचों से लेकर ख्याति भारत प्रतिरक्षा मंत्रालय तक पहुँचीं। मेरी कई रचनाएँ सचित्र सैनिक समाचार में छपकर विदेश मंत्रालयों तक पहुँचीं।
इन्हीं दिनों परम श्रद्धेय दादा माखनलाल चतुर्वेदी जी के चरणों का सान्निध्य और श्रद्धेय सुमन जी, दादा भवानी मिश्र, सरल जी, श्रीकांत जोशी और श्री रामनारायण जी उपाध्याय भी निकट संपर्क में आये। भाई बालकवि वैरागी और अनुरागी जी के साथ मंचों पर कविताएँ पढ़ीं। ऐसे मंच की अध्यक्षता भी की, जिस पर मंचों की शोभा नीरज जी ने काव्य पाठ किया था, अनुरागी जी और चन्द्रसेन विराट भी थे।
16 जनवरी 66 को खंडवा में दादा माखनलाल जी को प्रदत्त ‘पद्म भूषण’ के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में दादा के अभिनन्दन में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन था, मैंने कविता पढ़ी-
नमन तुमको! राष्ट्र की नव चेतना के अमर गायक
और हे वलि पंथियों के, चिर युवा कर्मण्य नायक!
कविता पढ़कर मंच पर आया तो दादा सोहनलाल द्विवेदी ने छाती से लगा लिया था। सुमन जी ने प्रशंसा की, वे संचालन कर रहे थे। दूसरे दिन सुबह दादा के घर पर हम सब सुमन जी, भवानी मिश्र, भवानी तिवारी, डॉ. रामविलास शर्मा, सरल जी, श्रीकांत जोशी और मैं था, धर्मयुग में इस ग्रुप का फ़ोटो छपा था। मेरी पढ़ी कविता ‘रसवंती’ लखनऊ के माखनलाल जी विशेषांक के मुखपृष्ठ पर छपी थी।
1967 में लोकप्रिय गीतकार श्री महेश सन्तोषी ने एक संग्रह किया। हिंदी के लोकप्रिय पावस गीत, इस संग्रह में माखन लाल चतुर्वेदी से लेकर महेश संतोषी तक देश भर के 81 श्रेष्ठ गीतकारों का एक-एक गीत था। क्र. 75 पर मेरा गीत:
आज सौ-सौ बार मेरी आँख फिर से डबडबाई –
बादलों में फिर घुमड़ती, यह तुम्हारी याद आई
बहुत समय तक यह मेरा प्रिय गीत रहा। गर्मी की छुट्टियों में अवसर मिला तो पूरे एक माह हिल-स्टेशन डलहौज़ी, हिमाचल प्रदेश में सपरिवार घूमने को मिल गया। पहली बार जब स्वर्गिक सौन्दर्य से झूमती हरीतिमा, ऊँची पर्वत मालाओं पर बादलों से अठखेलियाँ करते चीड़ और देवदारू के वृक्ष श्रेणियाँ, कल-कल झरते-झरने, चुल्लू भर पीलिया समझो तृप्ति का एक कल्प जी लिया। गगनचुम्बी देवदारों से घिरी मखमली हरीतिमा के बीच छोटी-सी झील जैसे तश्तरी में धरा पूरा एक स्वर्ग मैंने लिखा था-
कैसे इन छोटी बाँहों में / बाँधूँ रूप तुम्हारा
हे अनन्त यौवने बता दो / किसने तुम्हें सँवारा?
और जब देखी हिमाच्छादित शैल-शिखरों की सुनहली-रुपहली विराट छवि एक दर्पण-सा खुल गया मेरे सामने। कैसा प्रतिक्षण, प्रतिपल वर्णनातीत विराट सौन्दर्य घन्टों देखा कि यह पर क्या बाँध पाया और क्या बाँध पाऊँगा बस लिख लिया-
ज्योति स्नापित प्राणी तम के पटल जैसे खुल गये
एक दर्शन मात्र में / दर्पन नयन के धुल गये
वहाँ रहा तब तक रोज लिखा, बहुत अच्छा लिखा पर ‘हिमाचल की प्रकृति’ और ‘हिमालय एक विराट् दर्शन’ दोनों रचनाएँ मेरी अनमोल धरोहर हैं। बहुत बाद 2005 में प्रकाशित मेरी काव्य कृति-‘बाँहों भर आकाश’ में इन्हें संग्रहीत किया है।
फिर एक लंबे समय तक काव्य की सुप्तावस्था ही रही, कारण हम दोनों ही शिक्षक थे। बच्चे स्कूल के हो गये। फिर घर से दूर कॉलेजों के। अतः घर के दायित्व भी दोनों को बाँटकर ही पूरे करने थे। फिर शादियाँ एक-एक कर दोनों की सेवानिवृत्ति। कविता के लिए मुक्त अवसर कहाँ, लिखा तो छपा भी सम्मान भी, पर राही कवि के रूप में कम, शिक्षक के रूप में ही अधिक था। हम हरसूद में ही घर बना चुके थे। पर हरसूद नर्मदा सागर में डूबने के कगार पर आ गया तो, डूबने से पहले ही हम 1998 के अंत में भोपाल आ गये। 2001 तक घर बनाकर हम भी भोपाली हो गये।
गीत की मन्दाकिनी भी साथ तो चल ही रही थी, भोपाल में सुप्रसिद्ध गीतकार भाई डॉ. महेश संतोषी, श्री मयंक श्रीवास्तव, श्री राजेन्द्र अनुरागी और डॉ. जयजयराम आनंद मेरे पूर्व परिचित मित्र थे। उनके माध्यम से और अनेक ख्यातिनाम मित्र मिले। यहाँ मेरा पहला गीत ‘ओंकार’ भाई कमलकांत सक्सेना ने अपने ‘साहित्य सरोवर’ के अध्यात्म अंक में मुखपृष्ठ पर छापकर मुझे बहु-प्रचारित कर दिया। बाद में यह पत्रिका ‘साहित्य सागर’ हो गयी और मैं कमलकांत सक्सेना का मित्र-भाई और फिर संबंधों की प्रगाढ़ता में उनके परिवार का बुज़ुर्ग। भाई मयंक श्रीवास्तव तो पड़ोसी ही थे। उन्हीं के द्वारा विद्वान कवि भाई जंगबहादुर से प्रगाढ़ता हुई और साहित्यिक अभिरुचियों का आदान-प्रदान। मयंक जी प्रेस मैन के साहित्यिक सम्पादक हो गये और प्रति सप्ताह गीतों के प्रकाशन से गीत को विशेष प्रोत्साहन मिला। मेरे दो गीत-संग्रह प्रकाशित हुए- 1 रेशमी अनुबंध, 2 अंजुरी भर हरसिंगार, रेशमी अनुबंध गीत गजल संग्रह था और ‘अंजुरी भर हरसिंगार’ गीत थे, अधिकांश छायावादी।
नवगीत के पुरोधा भाई देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ ने मुझे नवगीत की ओर प्रेरित किया और फिर नवगीत शृंखला में रेत पर प्यासे हिरने, चुप्पियाँ फिर गुनगुनायीं, काँधों लदे तुमुल कोलाहल, जिंदगी ठहरी नहीं है, सान्ध्य के ये गीत लो, अभी दूर चलना है, महाशोर के सन्नाटों से, खुशबुओं के गाँव, पत्थर सच बोले, अस्तमित सुर्ख़ियां, मौन की अभिव्यक्तियां हैं, पांव थके सांकल खटकी है… कुल 13 गीत कृतियाँ हो गयीं।
गीतों के साथ चार काव्य कृतियाँ, दो बाल गीत, एक दोहा संग्रह और एक खण्ड काव्य हुआ। यह सब भोपाल की देन है। मुझे यहाँ आकर एक साहित्यिक कुटुम्ब मिला, सभी ने भरपूर स्नेह दिया। भाई मयंक श्रीवास्तव, अनुज रामवल्लभ आचार्य, अशोक निर्मल, गौरीश जी, आदरणीय दीपक जी, भाई महेश अग्रवाल, किशन तिवारी, भाई मोहन तिवारी, किसको कितना याद करूँ। आदरणीय कैलाशचन्द्र पंत तो प्रेरणादायक रहे। हमेशा उन्हें शायद मेरे गीतों में छायावादी झलक ज़्यादा प्रिय रही।
वे मुझे गीत का पितृपुरुष कहते हैं। कविता पाठ में उनकी उपस्थिति मुझे प्रोत्साहन देती रही है। आदरणीय मनोज श्रीवास्तव जी तो मेरे कई संग्रहों का विमोचन करा चुके हैं। उनकी स्वीकृति, कृति की सफलता है। हिंदी भवन तो मेरा देवालय है। यहाँ बैठकर बहुत कुछ और, जाने क्या पाया है। यहाँ से भाई महेश सक्सेना, भाई जवाहर कर्नावट की प्रियता विशिष्ट रही।
2003 में बड़ा बेटा दिल्ली से भारतीय सेवाएँ छोड़कर अबूधाबी चला गया तो प्रतिवर्ष तीन माह के लिए विदेश जाना होने लगा। विन्ध्य और हिमाचल के प्रकृति काव्य के साथ गगन यान और सागर सतरंगा, लहरों की अनन्त बांहों में घंटों झूलना, तट की बालू पर कविता के पृष्ठ लिखना-
यह अपनी बांहें फैलाये / बुलाता है
धरती के बेटों को / जो सब जात और मज़हब से ऊपर
उसके अपने हैं/ कुछ हक़ीक़त हैं/ कुछ सपने हैं।
और भी रचनाएँ थीं जो मेरे काव्य संग्रह ‘बाँहों भर आकाश’ में संग्रहीत हैं। वहाँ हिंदी के व्याख्याता श्रेष्ठ कहानीकार उपन्यासकार और निकट के सम्पादक भाई कृष्ण बिहारी त्रिपाठी से मैत्री हुई। उन्होंने मेरे दस गीत ‘अनुभूति’ जाल पत्रिका में देकर श्रीमती पूर्णिमा बर्मन, शारजाह और दुबई के कई साहित्य स्रेहियों से परिचय कराया। सम्मान मिले, मेरी बच्चों की कुछ कविताएँ छठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम हेतु चयनित हुईं। इस सबसे ऊपर आज मेरी छवि एक गीतकार के रूप में ही है। मेरे लिए-
गीत, अन्तः से उठी / निर्लिप्त रस की धार है।
इससे भी आगे-
गीत ब्रह्मानन्द का पहला सहोदर है
गीत स्वर की साधना में
लाय-विलय का सार है। (रेत पर प्यासे हिरन)
कवि के रूप में मैं रसवादी ही रहा हूँ। छायावादी काव्य की मार्मिक गहराई शिल्प-सौंदर्य के बहुरंगी अनूठे अवदानों की इन्द्रधनुषी छवियाँ, मानस के क्षितिजों पर रंग तो आज भी बिखेरती हैं, किंतु यह पथरीला कठोर वर्तमान भी तो है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। संस्कारों का अपसंस्करण, एकल परिवार जनित संबंधों का विघटन, कुंठाएं जीवन-संघर्ष, वर्ग-भेद, मज़हबी नफ़रतें और सियासत की बेइंतहा गिरावट से आचरण का क्षरण, विश्व बाज़ार का रसोई तक प्रवेश और ये आभासी ज़िंदगी, बच्चों से बूढ़ों तक पसरी जड़ें तो गाँव की मुक्त प्राणवायु को तरसती हैं। परंतु टहनियाँ, चमकदार रोशनी को मुट्ठियों में बाँधने को आतुर हैं। कवि के लिए न तो सम्मोहन सहज है न उच्चाटन। हर क्षेत्र में ख़ेमे हैं, दल हैं, झुंड हैं, पण्डे हैं। गीत, प्रगीत, नवगीत, जनगीत, समकालीन गीत और अब तो एक अभिनव गीत भी पर किसी अखाड़े से मेरा कभी संबंध नहीं रहा। मैं सबका हूँ और सब मेरे हैं।
इन्द्र जी कहते थे- ‘हर नवगीत, गीत होता है परंतु हर गीत नवगीत नहीं होता।’ गीत का नाम कुछ भी धर लो, उसमें गीतात्मकता (रस-लय) तो आवश्यक है। नवता भी कोई स्थिर जड़ता नहीं है, प्रतिक्षण नवीनता ही तो नवता है। निराला जी नव पर नव ही तो कहते थे। नव-गीत के पुरोधाओं ने जो नवगीत के लक्षण निर्धारित किये, वे अपने समय के स्वर थे आज की नवता या आज की समकालीनता कल न ही रहेगी। देखना यह है कि गीत अपने समय को कितना स्वर दे पा रहा है। मैंने रेत पर प्यासे हिरन के साथ आज तक के प्रकाशित प्रत्येक गीत के अंत में दिनांक दिया है, जो उसकी समकालीनता बता सकता है। यह भी कि किसी भी गीत में मैंने पुनरावृत्ति नहीं होने दी, जो कुछ भी है मेरा है, अपने समय का सच है।

31 दिसंबर को उम्र के 100 वर्ष पूरे हो जाएँगे, कलम है कि थकती ही नहीं, इस वर्ष का गीत-संग्रह भी मिल ही जाएगा, और शायद यही मेरी आख़िरी कृति हो। आगे की राम जाने। कितनी बार तो सुदीर्घ-साधना सम्मान ले चुका पर न आप हारे न मैं। अब तो एक याचना है स्वीकारें-
मुझे खुलते गवाक्षों से, निमंत्रण धर रहा कोई
शिलाएँ तोड़कर अमृत कलश-सा झर रहा कोई
शिथिल कुछ तो करो बंधन, तनिक अभिसार के पथ पर
उनींदे आसमानों में प्रतीक्षा कर रहा कोई
पिया मिलन की डगर पर हूँ,
कुछ तो ढीले करो ये प्यार के बंधन।
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