
- May 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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हास्य-व्यंग्य मुकेश असीमित की कलम से....
मृतक वोटर का पुनर्जन्म
वोट क्यों कटे?
सिर्फ़ इसलिए कि आदमी मर गया?
जो चुनाव हार रहे हैं, उनकी आजकल कोई सुन नहीं रहा। वे बेचारे रो रहे हैं कि जबसे सत्ताधीन सरफिरी सरकार ने सर (SIR) नियम लागू किया है, उनके सारे भरोसेमंद वोटर सूची से ऐसे ग़ायब हो गये हैं, जैसे नेता चुनाव जीतने के बाद अपने वादों से ग़ायब हो जाता है।
मैंने एक हारे हुए प्रत्याशी से पूछा, “आपके भरोसेमंद वोटर आख़िर कौन थे?” वे गंभीर होकर बोले, “मृत आत्माएँ!”
मैंने कहा,“मृत आत्माएँ?” वे बोले, “हाँ भाई साहब! ज़िंदा आदमी आख़िरी समय पर बिक सकता है, बहक सकता है, नाराज़ हो सकता है, लेकिन मृत आत्मा स्थिर विचारधारा की होती है। मरा हुआ वोटर आदर्श वोटर होता है। न सड़क मांगता है, न नाली; न अस्पताल, न स्कूल। न बिजली बिल में छूट, न गैस सब्सिडी। बस अपना नाम छोड़ जाता है, ‘लो बेटा, राष्ट्रहित में उपयोग कर लेना।’ मरने के बाद आदमी लोक बदल लेता है, पार्टी नहीं बदलता।”
अब यह भी कोई बात हुई जनाब! आदमी मर गया तो क्या इतना मर गया कि वोट भी न डाल सके? मृत्यु कोई इतनी बड़ी प्रशासनिक घटना नहीं कि आदमी के साथ उसका मतदान-अधिकार भी श्मशान घाट में जला दिया जाये।
देखिए, आत्माएँ वोट देने आती हैं ताकि लोकतंत्र की आत्मा ज़िंदा रहे। असली समस्या तो यह है कि ये जीवित से दिखने वाले नेताओं की आत्माएँ मर चुकी हैं। और मतदाता की आत्मा मरने के बाद भी सक्रिय रहती है। फिर चुनाव आयोग को आपत्ति किस बात की?
सरकार कह रही है मृत आदमी वोट नहीं दे सकता। अरे भाई, ये आत्माएँ कौन-सा नरक से बूथ तक आने का यात्रा-भत्ता मांग रही हैं? कौन-सा भूत ईवीएम पर कब्ज़ा कर रहा है? बेचारा चुपचाप आता है, वोट डालता है और लौट जाता है। न मंच, न माला, न माइक। इतना शांत और संस्कारी वोटर जीवितों में कहाँ मिलेगा?
अब वोटर लिस्ट में उम्र का भी भारी घोटाला बताया जा रहा है। कहीं 65 साल का बाप है और 63 साल का बेटा। लोग पूछ रहे हैं,“यह कैसे संभव है?”
अरे भई, आप पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखते क्या? हो सकता है बेटा पिछले जन्म में बाप रहा हो और बाप इस जन्म में बेटा बनने में थोड़ा लेट हो गया हो। लोकतंत्र में सब संभव है। आत्मा हर पाँच साल में वोट देने के लिए नया घर चुन सकती है।

लेकिन लोग लॉजिक समझते ही नहीं। सरकार जब इलॉजिकल काम करती है तो उसे नीति कहती है, और विपक्ष जब इलॉजिकल बात करता है तो उसे लोकतंत्र की हत्या बताते हैं।
चुनाव आयोग कह रहा है,“भूत वोट नहीं डाल सकते।” प्रत्याशी कह रहे हैं, “भूत नहीं डालेंगे तो हमारा भविष्य कौन बचाएगा?”
मैं तो कहता हूँ, पहले ज़िंदा वोटरों की जीवितता की जांच होनी चाहिए। एक बोतल, कुछ नोट, जाति का जोश और मोहल्ले के ठेकेदार की आँख देखकर वोट देने वाला आदमी लोकतांत्रिक रूप से कितना जीवित है, यह कौन बताएगा? शरीर में धड़कन है, मगर विवेक वेंटिलेटर पर पड़ा है।
हम सनातन परंपरा के आदमी हैं मित्र! हम पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं। बब्बन चाचा की स्वर्गवासी चाची वैसे तो सपने में भी नहीं आतीं, लेकिन चुनाव आते ही बूथ पर ज़रूर आती हैं। लोकतंत्र में चाची का इतना अटूट विश्वास है कि स्वर्ग में रहकर भी उन्हें बूथ का रास्ता याद रहता है।
बब्बन चाचा नहा-धोकर बूथ पहुँचते जाते हैं हर बार। अधिकारी पूछता है, “चाची तो स्वर्गवासी हो गयीं?”
बब्बन चाचा गंभीर होकर कहते हैं, “हाँ बेटा, लेकिन वोट डालने तो हर बार आती हैं। क्या पता, कभी यहीं मुलाक़ात हो जाये।”
यही हमारी सभ्यता की विशेषता है। आदमी मर सकता है, पर वोट नहीं मरता। वोट अमर है, वोटर नश्वर है।
और नेता? वे भी तो जन्म-जन्मांतर से वही कर रहे हैं, बस पार्टी बदलकर पुनर्जन्म ले रहे हैं। अब हारे हुए प्रत्याशी परेशान हैं- “ज़िंदा वोटर वैसे ही अविश्वसनीय निकले, ऊपर से मृत वोटर भी काट दिये। अब चुनाव लड़ें या श्राद्ध कराएँ?”

डॉ. मुकेश असीमित
हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि विधाओं में लेखन। हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे व्यंग्यों के संग्रह प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएं शामिल। देश-विदेश के प्रतिष्ठित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर नियमित प्रकाशन।
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