ह्यूमनकाइंड, आशावाद का इतिहास, humankind, history of optimism, Rutger Bregman book
(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे... मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का भाव। आब-ओ-हवा पर 'शुक्रिया किताब'... इस बार आपके व्यक्तित्व और हौसलों को नया आयाम देने में मददगार किताब पर चर्चा-संपादक)
डॉ. दीपक रूहानी की कलम से....

ह्यूमनकाइंड: आशावाद का व्यवस्थित इतिहास

               मैं इस किताब के सम्बन्ध में सबसे पहला वाक्य यही कहना चाहता हूँ कि– ‘यह सबके लिए पठनीय है’। अब तक के अपने व्यक्तिगत अध्ययन के आधार पर कह रहा हूँ कि यह किताब अपनी तरह की पहली किताब है, जो मेरी नज़र से गुज़री। यह किताब मूल रूप से अँग्रेज़ी में ‘ह्यूमनकाइंड- अ होपफुल हिस्ट्री’ नाम से पोलैंड के युवा लेखक रुत्ख़ेर ब्रेख़्मान (Rutger Bregman) द्वारा सन् 2019 में लिखी गयी थी, जिसका हिन्दी-अनुवाद सन् 2021 में मदन सोनी ने किया।

ह्यूमनकाइंड, आशावाद का इतिहास, humankind, history of optimism, Rutger Bregman book

हम सदैव आशावादी होने पर बल देते हैं। आम तौर से कहे जाने वाला वाक्य ‘जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है और जो होगा वो भी अच्छा ही होगा’, से लेकर आजकल यू-ट्यूब पर उपलब्ध मोटिवेशनल ऑडियो/वीडियो तक में हमें आशावादी होने की सलाह दी जाती है। यहाँ तक कि शरीर-क्रियाविज्ञान के आधार पर भी वैज्ञानिक दृष्टि से सिद्ध किया जाता है कि आशावादी होने से कई प्रकार के हार्मोंस शरीर में निकलते हैं, जिनसे चेहरे पर तेज (ग्लो) आता है, बुढ़ापा नहीं आता, धन-धान्य की प्राप्ति होती है, आदि-आदि।

ये सब बातें अपनी जगह अपनी-अपनी तरह से सही हैं। सहमति-असह‌मति की भी तमाम गुंजाइशें हैं। यहाँ महत्त्वपूर्ण बात है कि इन तमाम आशावादी विचारों और दृष्टियों का समावेश समाज में किस प्रकार स्वतः ही है, इसका कोई डेटा या इसका कोई व्यवस्थित इतिहास हमें पढ़ने-सुनने को नहीं मिलता। आशावाद पर आधारित अलग-अलग क़िस्से-कहानियाँ, दृष्टान्त, उदाहरण आदि तो मिलते ही रहते हैं, जिन्हें हम प्रवचनों, उपदेशों, मोटिवेशनल स्पीच आदि में सुनते हैं, लेकिन पहली बार आशावाद के सिद्धान्त का व्यवस्थित इतिहास इस पुस्तक में देखने को मिलता है।

इतना ही नहीं कि यह किताब हमें तथ्यात्मक रूप से समृद्ध करते हुए आशावाद के ऐसे आँकड़े प्रस्तुत करती है कि हम आश्चर्यचकित हो जाते हैं या हमें सुखद आश्चर्य होता है। बल्कि यह किताब इतिहास बताते-बताते हमें तथ्यात्मक रूप से इतना समृद्ध कर देती है कि हमें वर्तमान तथा भविष्य को देखने की एक आशावादी दृष्टि भी प्राप्त हो जाती है। ये कुछ इस तरह से है जैसे कोई नया वैज्ञानिक किसी पुराने वैज्ञानिक के सिद्धान्त को पढ़ते हुए एक नयी दृष्टि पा जाये और कोई ऐसा नया उपकरण बना दे, जिसे उस पुराने वैज्ञानिक ने कभी सोचा भी न रहा हो।

समकालीन सुप्रसिद्ध इतिहासकार और बुद्धिजीवी युवाल नोआ हरारी कहते हैं इतिहास अतीत की घटनाओं के बारे में जानना नहीं है, बल्कि इतिहास हमें बताता है कि परिवर्तन कैसे होता है या परिवर्तन कैसे-कैसे हुए हैं। संक्षेप में अगर कहूँ तो यह किताब हमें आशावाद का इतिहास ही नहीं बताती, बल्कि आशावादी होने की तरक़ीब भी सिखाती है। कुछ भी अपनी तरफ़ से कहने से पहले इस किताब से ही एक उद्धरण देना उचित होगा–

“यह पुस्तक एक क्रांतिकारी विचार से ताल्लुक़ रखती है। एक ऐसा विचार, जो लंबे समय से हुक्मरानों को घबराहट में डाल देने के लिए जाना जाता रहा है। एक ऐसा विचार, जिससे मज़हब और विचारधाराओं ने इनकार किया है, समाचार माध्यमों ने जिसकी उपेक्षा की है और उसे विश्व इतिहास के पन्नों से मिटाया है।

इसी के साथ-साथ, यह एक ऐसा विचार भी है, जिसे विज्ञान की लगभग हर शाखा ने वैध ठहराया है। एक ऐसा विचार, जिसकी पुष्टि विकास-प्रक्रिया ने की है और जो रोज़मर्रा के जीवन से प्रमाणित होता रहा है। एक ऐसा विचार, जो मनुष्य के स्वभाव में इस क़दर रचा-बसा है कि उसकी ओर ध्यान ही नहीं जाता और उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

अगर हम लोगों में इसे अधिक गंभीरता से स्वीकार करने का साहस हो, तो यह ऐसा विचार है, जो शायद एक क्रांति की शुरूआत कर सकता है। समाज को उसके सिर के बल खड़ा कर सकता है क्योंकि जैसे ही आपको इसका वास्तविक मतलब समझ में आ जाएगा, वैसे ही यह दिमाग़ को नचा देने वाली उस ड्रग से कम नहीं होगा, जो यह सुनिश्चित करेगी कि उसके बाद दुनिया आपको वैसी दिखायी नहीं देगी, जैसी वह अब तक दिखायी देती रही थी।

क्या है यह क्रांतिकारी विचार? …. वह विचार यह है कि ज़्यादातर लोग, अंदर से, बहुत भले होते हैं।” (पृ. 02)

मैं यहाँ इस किताब की कोई विस्तृत समीक्षा या इसका कोई सार-संक्षेप नहीं प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं अपनी पढ़ी हुई हाल की कुछ किताबों में से एक इस किताब का ज़िक्र आदरणीय भवेश दिलशाद जी के आदेश पर कर रहा हूँ। हालांकि उनके इस सि​लसिले में यादों से किसी किताब पर लिखने का इसरार था, लेकिन मैं इस किताब को शुक्रिया कहना चाहता हूं भले ही यह मेरी ताज़ा स्मृति का ही हिस्सा है। यह भी अवश्य स्पष्ट कर दूँ कि इसी किताब का उल्लेख या इसी किताब की चर्चा मैं यहाँ इसलिए कर रहा हूँ कि यह किताब सबके लिए पढ़ने योग्य है। कोई चाहे जिस विषय का हो, चाहे जिस भी कार्यक्षेत्र से सम्बन्धित हो, चाहे जिस भी जीवन-उद्देश्य के लिए प्रयासरत हो या चाहे जिस प्राप्ति के लिए संघर्षरत हो; सभी इसे पढ़ सकते हैं या सभी को इसे पढ़ना चाहिए। मैंने यही बात इस परिचर्चा के प्रथम वाक्य के रूप में कह दी थी, फिर भी यहाँ ज़रा विस्तार।

कुछ किताबों में ऐसी ताक़त होती है कि वो आपको कई बिन्दुओं पर नये सिरे से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। यह एक ऐसी किताब है, जिसने मुझे अन्दर तक प्रभावित किया। ‘अन्दर तक’ को और अधिक स्पष्ट करना हो तो कहना पड़ेगा कि इसने मेरी अन्तःचेतना को गहराई से प्रभावित किया है। यहाँ यह प्रश्न भी उठ सकता है कि ‘मेरी चेतना’ मेरी व्यक्तिगत है या ‘मेरी चेतना’ अन्य से भिन्न है; इसलिए ज़रूरी नहीं कि जो विचार और संवेदनाएँ मेरी चेतना को प्रभावित करें, वो किसी अन्य को भी प्रभावित करें। इसके प्रत्युत्तर में इतना ही स्पष्ट करना चाहूँगा कि इस किताब में ‘व्यक्ति स्तर’ पर प्रभावित होने से बढ़‌कर ‘मनुष्य स्तर’ पर प्रभावित होने के लिए बहुत-कुछ है।

यह किताब बहुत सावधानी से देश, धर्म, जाति तथा वर्ग आदि की सीमाओं का सहारा लिये बिना, मात्र मनुष्य-जाति या मानव-जाति की सार्वभौमिक और सार्वकालिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण-अन्वेषण करती है। जीव विज्ञान की शब्दावली में कहें तो यह किताब मानव-जाति के डी.एन.ए. में ‘इनबिल्ट’ आशावाद के निरीक्षण-परीक्षण का प्रयास करती है। यहाँ ‘इनबिल्ट’ शब्द का प्रयोग मैं ‘अविभाज्य’ के अर्थ में कर रहा हूँ। यह ‘अविभाज्यता’ अदम्य भी है, यानी जिसका दमन न किया जा सके। ऊपर के उद्धरण में आप देख चुके हैं कि “ज़ियादातर लोग अन्दर से बहुत भोले होते हैं”। यह एक ऐसा विचार है “जो मनुष्य के स्वभाव में इस क़दर रचा-बसा है कि उसकी ओर ध्यान ही नहीं जाता और उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।”

यहाँ इस किताब के शीर्षक में ‘इतिहास’ शब्द का प्रयोग हुआ है और साथ ही ‘आशावाद’ शब्द भी जुड़ा है, इसलिए एक विशेष बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि रुत्ख़ेर ब्रेख़्मान ने यहाँ आशावाद को किसी भी प्रकार से प्रवचन या व्यास शैली में नहीं प्रस्तुत किया है। एक-एक बात को सिद्ध करने के लिए कई-कई प्रमाण प्रस्तुत किये हैं। सन्दर्भों की झड़ी लगा दी है। कहीं-कहीं तो सन्दर्भों का अतिरेक भी हो गया है, लेकिन ये सन्दर्भ-अतिरेक हमें ‘बोर’ करने या ‘डिस्टर्ब’ करने के बजाय हमारे शंकालु मन को क़दम-दर-क़दम मुत्मइन करता चलता है।

मेरी आदत है कोई किताब पढ़ने के दौरान पेंसिल से या पेन से कहीं-कहीं अंडरलाइन (हालाँकि किसी से माँगकर पढ़ने वाली किताबों में ऐसा नहीं करता) करता चलता हूँ। यहाँ मैं कुछ ऐसे वाक्य उद्धृत करना चाहता हूँ जिन्हें इस किताब को पढ़ते समय अण्डरलाइन किया था–

  1. अगर आप किसी चीज़ में पर्याप्त यक़ीन करने लगते हैं, तो वह चीज़ वास्तविक हो सकती है। (पृ. 08)
  2. आप‌को वही हासिल होता है, जिसे हासिल करने की आपने उम्मीद की होती है। (पृ. 7)
  3. बुनियादी तौर पर, हमें हर कहीं स्वार्थ देखने के लिए प्रशिक्षित किया गया होता है। (पृ. 7)
  4. अधिकांश मज़हबों में यह आस्था जड़ जमाये हुए है कि मनुष्य पाप के दलदल में डूबा है। (पृ. 11)
  5. दर्जनों अध्ययनों के मुताबिक़ समाचार मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा हैं। (पृ. 11)
  6. हमारे भीतर इतनी तार्किक क्षमता नहीं है कि हम मीडिया का सामना कर सकें। (पृ. 13)
  7. दूसरों पर विश्वास करने की सम्भावना हममें पहले से निहित है। (पृ. 50)
  8. हमारी प्रजाति का विकास (इवोल्यूशन) ‘सर्वाइवल ऑफ़ द फ्रेण्डलिएस्ट’ (वही प्राणी जीवित बचा रह पाता है, जो सबसे अधिक मैत्रीपूर्ण होता है) के सिद्धान्त पर आधारित रहा है। (पृ. 57)
  9. आपके मित्रों की संख्या अधिक होती है, तो इससे आपकी अक़्लमंदी में इज़ाफ़ा होता है। (पृ. 86)
  10. ‘भय के हाथों छले जाने’ के बजाय ‘उम्मीद के हाथों छले जाना’ बेहतर है। (पृ. 224)
  11. अगर अध्यापक बच्चों से अक़्लमंद होने की अपेक्षा करें, तो बच्चों की अक़्लमन्दी में भी इज़ाफ़ा हो सकता है। (पृ. 225)
  12. खेल का विलोम काम नहीं है, खेल का विलोम अवसाद है। (पृ. 258)
  13. क्षमा करके आप विद्वेष और दुश्मनी पाले रखने पर अपनी ऊर्जा ख़र्च करना बन्द कर देते हैं। (पृ. 332)
  14. दूसरों में भरोसा रखना उतना ही विवेकपूर्ण निर्णय है, जितना वह भावनात्मक निर्णय है। (पृ. 335)

आख़िर में, इतना कहना ज़रूरी और पर्याप्त समझ रहा हूँ कि जो लोग पढ़ने के शौक़ीन हैं या कुछ नया पढ़ने के शौक़ीन हैं, वे इसे ज़रूर पढ़ें। इस किताब को आसानी से ऑनलाइन ख़रीदा भी जा सकता है। जो यार-मित्र असुविधा महसूस करें, संपर्क कर सकते हैं किताब संबंधी सभी तकनीकी विवरण के लिए।

(क्या ज़रूरी कि साहित्यकार हों, आप जो भी हैं, बस अगर किसी किताब ने आपको संवारा है तो उसे एक आभार देने का यह मंच आपके ही लिए है। टिप्पणी/समीक्षा/नोट/चिट्ठी .. जब भाषा की सीमा नहीं है तो किताब पर अपने विचार/भाव बयां करने के फ़ॉर्म की भी नहीं है। edit.aabohawa@gmail.com पर लिख भेजिए हमें अपने दिल के क़रीब रही किताब पर अपने महत्वपूर्ण विचार/भाव-संपादक)

डॉ. दीपक रूहानी, deepak roohani

डॉ. दीपक रूहानी

शायर, अनुवादक और लेखक के रूप में चर्चित। 'ग़ज़लकार' पत्रिका के संपादन के साथ ही कुछ पुस्तकों का संपादन भी। राहत इंदौरी पर चर्चित किताब के लेखन के लिए भी चर्चित। मधुबनी में हिन्दी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर। संपर्क: 9415142314

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