
- May 22, 2026
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कॉकरोच जनता पार्टी युवाओं के बीच एक सनसनी की तरह उभरी और सोशल मीडिया पर उसके फ़ॉलोअरों की संख्या दो करोड़ तक जा पहुंची तो केंद्र की भाजपा सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा पर ख़तरा बताते हुए इसके सोशल मीडिया हैंडल प्रतिबंधित कर दिये। ऐसी पार्टी की परंपरा क्या रही है, इसके कारण क्या रहे और इसका भविष्य क्या हो सकता है? यहां बिंदुवार जानें...
विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
सीजेपी: व्यंग्य परंपरा और सत्ता का सफ़र
जब व्यवस्था बहरी हो जाती है, तब व्यंग्य ही समाज का लाउडस्पीकर बनता है। सुप्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने एक बार कहा था कि हर व्यंग्य अपने आप में एक तरह का सच होता है। आज के दौर में जब समाज को मुफ़्त की रेवड़ियों के बदले नेता व्यवस्था के आसन ख़रीद लेना चाहते हैं; जब जनता को सम्मान और रोज़गार की दरकार है, लेकिन मुख्यधारा के राजनेता जनता को सिर्फ़ एक मत संख्या समझने की भूल कर रहे लगते हैं; तब व्यंग्य ही राजनेताओं, सत्ता के अहंकार को चोट पहुंचा सकता है।
आज की युवा पीढ़ी यानी जेन ज़ी इस मामले में समझदार है। वह राजनेताओं के लंबे-चौड़े और उबाऊ भाषणों से दूर हो चुकी है। यह पीढ़ी मीम्स, रील्स और धारदार चुटकुलों के ज़रिये सीधे उस नस पर हाथ रख रही है, जहां समाज को असल दर्द हो रहा है। भारत में हाल ही में उभरी कॉकरोच जनता पार्टी ने ख़ुद को आलसी और बेरोज़गारों का मोर्चा कहकर व्यवस्था के उस पूरे नैरेटिव को ही ध्वस्त कर दिया, जो युवाओं के ज़मीनी संघर्ष को कमतर आंकता था।
ख़ुद को ख़ुदा मान बैठे अदालती टिप्पणी के विरोध और नीट जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक के खिलवाड़ तथा बेरोज़गारी जैसे गंभीर मुद्दों से उपजी इस व्यंग्यात्मक डिजिटल पार्टी ने सोशल स्पेस में स्थापित राजनीतिक दलों को अपनी सामूहिक ताक़त का अहसास करा दिया है।
दुनिया के कुछ प्रसिद्ध सियासी कटाक्ष
भारत की यह कॉकरोच जनता पार्टी कोई पहली ऐसी कोशिश नहीं है। दुनिया के इतिहास में जब-जब राजनीतिक व्यवस्था सड़ी-गली और संवेदनहीन हुई है, तब-तब आम जनता ने मज़ाक़िया और व्यंग्यात्मक राजनीतिक दल बनाकर शासकों को आईना दिखाया है।
1990, पोलैंड
वैश्विक परिदृश्य पर नज़र डालें तो पोलैंड में साल 1990 में बनी पोलिश बीयर-लवर्स पार्टी इसका एक बड़ा उदाहरण है। इस पार्टी ने नारा दिया था कि लोग वोदका छोड़कर अच्छी बीयर पिएं ताकि संसद को भी बीयर बार की तरह शांति से चलाया जा सके। मज़ाक़ से शुरू हुए इस सिलसिले को जनता ने इस क़दर हाथो-हाथ लिया कि साल 1990 के चुनाव में इस दल ने संसद की सोलह सीटें जीत ली थीं।
2009, आइसलैंड
इसी तरह साल दो हज़ार नौ में आर्थिक मंदी से जूझ रहे आइसलैंड में द बेस्ट पार्टी अस्तित्व में आयी। इसके संस्थापक एक कॉमेडियन थे और उनका मुख्य वादा यह था कि वे सत्ता में आकर अपने सारे वादे तोड़ देंगे क्योंकि बाक़ी पारंपरिक नेता भी यही करते हैं। व्यवस्था से नाराज़ जनता ने इसके संस्थापक को देश की राजधानी रेकजाविक का मेयर चुन लिया था।
1963, कनाडा
कनाडा की राइनोसेरोस पार्टी भी इतिहास का एक दिलचस्प हिस्सा है, जिसकी स्थापना साल उन्नीस सौ तिरेसठ में हुई थी। इस पार्टी ने कनाडाई चुनावी संस्कृति के खोखले वादों को बेनक़ाब करने के लिए अजीबो-ग़रीब घोषणा की थी कि वे देश से गुरुत्वाकर्षण का क़ानून ही ख़त्म कर देंगे ताकि लोगों को भारी वज़न न उठाना पड़े। इस दल ने दशकों तक वहां की राजनीति को झकझोरा।
2006, हंगरी
हंगेरियन टू-टेल्ड डॉग पार्टी ने सरकार के तानाशाही रवैये और प्रोपेगैंडा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला। उन्होंने जनता से वादा किया कि वे हर नागरिक को अमरता देंगे और दिन में दो बार सूर्यास्त करवाएंगे। यह दल आज भी वहां के युवाओं के विरोध का सबसे बड़ा चेहरा है।
1982, यूके
वहीं यूनाइटेड किंगडम की मॉन्स्टर रेविंग लूनी पार्टी ब्रिटिश राजनीति के पाखंड को उजागर करने के लिए हर चुनाव में उतरती है और उनका सुझाव रहता है कि बेरोज़गारी के आंकड़े छुपाने के लिए सरकारी फ़ॉर्म छोटे अक्षरों में छापे जाने चाहिए।
ये सभी वैश्विक उदाहरण बताते हैं व्यंग्य हमेशा से एक वैश्विक लोकतांत्रिक ढाल रहा है।
आज के दौर में मुफ़्तख़ोरी बनाम आत्मसम्मान समाज की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है। कल्याणकारी राज्य की आड़ में नेताओं ने जनता को एक तरह से याचक बना दिया है। कभी मुफ़्त बिजली, कभी मुफ़्त राशन तो कभी बैंक खातों में कुछ हज़ार रुपये ट्रांसफ़र करके बुनियादी और असल मुद्दों को दबा दिया जाता है।
आत्मसम्मान बनाम मुफ़्तख़ोरी
मुफ्त़ख़ोरी की यह राजनीति देश को आर्थिक रूप से खोखला तो करती ही है, साथ ही एक नागरिक के आत्मसम्मान को भी मार देती है। समाज की वास्तविक ज़रूरत मुफ़्त की चीज़ें नहीं बल्कि एक पारदर्शी व्यवस्था, सुरक्षित परीक्षाएं, बेहतर अस्पताल और सम्मानजनक रोज़गार के अवसर हैं। जब देश के पढ़े-लिखे युवाओं को कॉकरोच या परजीवी जैसे शब्दों से नवाज़ा जाता है, तो उनका आत्मसम्मान बुरी तरह आहत होता है और यहीं से एक मौन विद्रोह पनपता है। यह विद्रोह आज डिजिटल स्वरूप में अभिव्यक्त हो रहा है। पकड़ो किसे कहां पकड़ोगे!

इस समस्या का एक आशाजनक समाधान मीम से मुख्यधारा की राजनीति की ओर बढ़ने में छिपा है। व्यंग्य और मीम्स किसी भी वैचारिक क्रांति की शुरूआत तो कर सकते हैं, लेकिन वे अंतिम समाधान नहीं हो सकते।
- लोकतंत्र को वास्तव में संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप चलाने के लिए इस डिजिटल आक्रोश को एक सकारात्मक दिशा देने की दरकार है।
- इसके लिए सबसे पहले व्यंग्य को एक नीतिगत सजग प्रहरी की भूमिका में आना होगा। जैसे कभी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था, वैसे ही अब व्यंग्य को पांचवें स्तंभ के रूप में स्थापित होना पड़ेगा।
- कॉकरोच जनता पार्टी जैसी पहलों को केवल एक ट्रेंड बनकर नहीं रुकना चाहिए बल्कि युवाओं को इन मंचों का उपयोग सूचना के अधिकार का प्रयोग करने, सरकारी नीतियों का ज़मीनी विश्लेषण करने और सरकार से सीधे डेटा आधारित सवाल पूछने के लिए करना चाहिए।
- इसके साथ ही इस आलोचनात्मक सोच को वास्तविक राजनीतिक भागीदारी में बदलना बेहद ज़रूरी है।
आगे का रास्ता
आज के युवाओं की सबसे बड़ी ताक़त यह है कि वे किसी बंधी-बंधाई विचारधारा के बंधक नहीं हैं। वे आज की सरकार की ग़लती पर मीम बना सकते हैं, तो कल विपक्ष की नाकामी पर भी खुलकर हंस सकते हैं। समाधान यही है कि युवाओं की यह वैचारिक तटस्थता वोटिंग बूथ तक पहुंचे। युवा सही उम्मीदवारों का चयन करें या फिर पारंपरिक पार्टियों के भीतर दबाव समूह बनाकर उनके एजेंडे को मुफ़्तख़ोरी से बदलकर विकास और रोज़गार पर लाने के लिए मजबूर करें।
अंततः एक सम्मान आधारित व्यवस्था का निर्माण ही एकमात्र रास्ता है। राजनेताओं को यह समझना होगा कि देश का युवा अब अंधभक्त नहीं रह गया है। असली समाधान इस बात में छिपा है कि देश में जवाबदेही के क़ानून कड़े हों। अगर कोई पेपर लीक होता है, तो केवल छोटे अपराधियों पर कार्रवाई न हो, बल्कि ज़िम्मेदार मंत्रियों और शीर्ष अधिकारियों को तुरंत अपना पद छोड़ना पड़े। जब व्यवस्था के भीतर जनता के प्रति डर होगा, तभी आम नागरिक को उसका वास्तविक सम्मान मिलेगा।
कॉकरोच की सबसे बड़ी खासियत यह मानी जाती है कि वह हर विषम परिस्थिति में खुद को जीवित रख सकता है, चाहे कोई बड़ी आपदा ही क्यों न आ जाये। आज का युवा ख़ुद को इस रूप में इसलिए देख रहा है क्योंकि वह इस भ्रष्ट और सुस्त सिस्टम की मार झेलकर भी अपनी उम्मीदों के साथ ज़िंदा है। लेकिन जब यही युवा हंसते-हंसते व्यवस्था की कमियों पर तंज़ कसता है, तो बड़े-बड़े राजनेताओं के सिंहासन हिलने लगते हैं। यह रचनात्मक व्यंग्य ही आने वाले समय में लोकतंत्र को स्वच्छ और जवाबदेह बनाने का सबसे प्रभावी ज़रिया साबित होगा।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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