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व्यंग्य विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

कॉकरोच पार्टी और बेसुरे दौर में 'मेलोडी' राग

            दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सियासी अखाड़े में खलबली है। एक बयान भी कॉकरोचों को पार्टी बनाने की प्रेरणा दे सकता है। इस अनूठी पार्टी का जन्म किसी बंद कमरे की गुफ़्तगू, साज़िश या भव्य रैलियों से नहीं, बल्कि व्यवस्था के उस तीखे बयान से हुआ है, जिसने देश के बेरोज़गार और सोशल मीडिया पर दिन-रात आंखें फोड़ने वाले युवाओं की तुलना इस जुझारू जीव से कर दी। कॉकरोच आत्ममुग्ध और स्वधन्य हो गये हैं।

दिन में ग्यारह घंटे ऑनलाइन रहकर, डेटा के सौदागरों की जेब भरने में लगे मोबाइल-जीवी, निरंतर शेख़ चिल्ली के ख़याली पुलाव पकाते रहते हैं। वास्तविक शारीरिक श्रम अब मशीनी बटन की भेंट चढ़ चुका है।

इस नये राजनीतिक विमर्श का एजेंडा आस्तीन चढ़ाकर बात करने जैसा सीधा है, जब देश में असली मुद्दों पर बात करने के बजाय सिर्फ़ ढोल-नगाड़े बजाये जा रहे हों, तो फिर ‘कॉकरोच शैली’ की उत्तरजीविता ही एकमात्र संजीवनी बूटी बची दिखती है।

जब समसामयिक वैश्विक घटनाओं की बात आती है, तो कॉकरोच अपने बड़े-बड़े एंटीना से दुनिया देखता है। दुनिया के तमाम शक्तिशाली देश अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और युद्ध के मैदान में मिसाइलें टेस्ट करने में व्यस्त हैं। लेकिन ‘कॉकरोच पार्टी’ का मानना है कि परमाणु हमले के बाद भी अगर कोई जीव सीना तानकर जीवित बच सकता है, तो वह केवल कॉकरोच ही है। इसलिए वैश्विक संकटों के इस दौर में, जब छोटे-बड़े सूरमा परमाणु हथियारों की गीदड़ भभकी दे रहे हों, तब भी कॉकरोच बिना किसी टेंशन अपने सूराख़ में सुरक्षित होता है।

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कूटनीतिक मंच पर जब डॉलर के मुकाबले रुपये के गिरते स्तर पर चर्चा होती है, तो आम जनता के पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है। लेकिन कॉकरोच समूह के पास इसका एक अद्भुत दार्शनिक समाधान है। पार्टी का दर्शन कहता है देश की मुद्रा ख़ुद को ज़मीन के जितना क़रीब ले जाएगी, वह उतनी ही सुरक्षित रहेगी, क्योंकि ‘आसमान से गिरे तो खजूर पर अटके’ वाली नौबत से तो बचना ही होगा! वैसे भी, जब रसोई में ‘कंगाली में आटा गीला’ चल रहा हो, तो एक बेरोज़गार का मुद्रा के मज़बूत या कमज़ोर होने से ज़्यादा लेना-देना नहीं होता, देश की भारी भीड़ को राशन मुफ़्त है ही, आधी आबादी को महीने के बंधे रुपये डायरेक्ट बैंक ट्रांसफ़र से मिल ही रहे हैं।

इस परिदृश्य में मज़ेदार तड़का तब लगता है, जब अंतरराष्ट्रीय संबंधों की गरमागरम जलेबी में मेलोनी और मोदी के नामों को मिलाकर बनाये गये सोशल मीडिया ट्रेंड्स की एंट्री होती है। संयोगवश ‘मेलोडी’ चॉकलेट केवल इंटरनेट का मनोरंजन नहीं है। यह पारले के शेयर्स में अप ट्रेंड की आधुनिक कूटनीति सिद्ध हो रही है। ऐसा ‘राग दरबारी’ है, जिसे गाकर युद्व की कड़वाहट पर मिश्री घोलने का प्रयास हुआ है।

‘मेलोडी’ असल में उस कड़वाहट को छिपाने का मीठा हथकंडा है, जो आम नागरिक अपनी जेब ख़ाली होने पर महसूस करता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेताओं की 32 दांत दिखाती मुस्कुराती हुई तस्वीरें देखकर ऐसा लगता है मानो चिराग़ तले का अंधेरा ग़ायब हो चुका है। पूरी दुनिया की समस्याओं का अंत इसी रील, री-ट्वीट और हैशटैग की जादुई दुनिया में सिमट गया है।

जब रुपया पाताल लोक की यात्रा पर हो और घरेलू बाज़ार में महंगाई डायन जनता को खाये जा रही हो, तब ‘मेलोडी’ का मैजिक कॉकरोच-सी आम जनता के कानों में अफ़ीम की तरह काम करता है, ताकि वे कड़वे सच से आंखें मूंदकर चुपचाप सो सकें।

जब तक व्यवस्था युवाओं को केवल एक कॉकरोच समझकर नज़रअंदाज़ करती रहेगी, तब तक यह कॉकरोच पार्टी अपने व्यंग्य के तीखे बाणों से सत्ता के इस भव्य महल की चूलें हिलाती रहेगी। कॉकरोच को मारना आसान हो सकता है, लेकिन उसके भीतर छिपे आक्रोश और व्यंग्य की उत्तरजीविता को मिटाना है, तो सिस्टम को क्लीन करना होगा!

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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